Homeलेखबीती बातें क्यों नहीं भूल पाते...!!!

बीती बातें क्यों नहीं भूल पाते…!!!

जिस मनुष्य के जीवन में कड़वाहट ज्य़ादा भर गई हो किसी बात को लेकर, तो वो बातें ज्य़ादा ही पकड़ के रखते हैं कि नहीं इसका बदला लेंगे हम, ये करेंगे, दिखा देंगे, उसी पर झूल रहे होते हैं और सारा संसार हँस रहा है। पुरानी बातें पकड़ के चल रहा है। तब हमको लगता है कि हमको चेंज करना चाहिए।

कई बार ऐसा होता है कि हम पास्ट में इतना ज्य़ादा जीने लग जाते हैं जिससे हमारी एनर्जी पूरी तरह से खत्म हो जाती है। ऐसे में पुरानी बातों को भूलने में मेडिटेशन मदद करता है। क्योंकि जो पुरानी बातें हमने पकड़ के रखी हैं वो इसीलिए पकड़ के रखी हैं क्योंकि हमारे पास कुछ नया नहीं है। जिस तरह दुनिया के अन्दर कोई व्यक्ति अगर सारा दिन काम करता हो, इतना व्यस्त रहता हो तो वो सुबह क्या नाश्ता किया था वो अगर उससे पूछा जाये कि आज तुमने नाश्ता क्या किया था? तो कहेंगे याद नहीं, भूल गया। क्योंकि इतना व्यस्त था। लेकिन जो व्यक्ति व्यस्त नहीं है उसको पूछो तो कहेगा कि आज मैंने ये खाया उसमें नमक भी कम था। माना उसका इतना चिंतन चला कि आज ये-ये चीज़ ऐसी थी, ये चीज़ ठीक नहीं थी। माना हर चीज़ में उसको कमी दिखेगी क्योंकि उसके पास टाइम है, फ्री है। ठीक इसी तरह पुरानी बातें हम इसीलिए पकड़ के रखते हैं क्योंकि हमारे पास नई बातें कुछ है नहीं, जिसके ऊपर हम क्लेम करें।
रोजमर्रा की जि़ंदगी से, उस रूटीन से बाहर जाने के लिए कुछ नवीनता हमारे जीवन में हो। इसीलिए तो लोग बाहर जाते हैं। दो दिन भी हॉलिडे(छुट्टी) मिली तो सोचेेंगे कि किसी हिल स्टेशन पर ही चले जायें। मौसम का परिवर्तन या कोई अलग दृश्य का परिवर्तन, बातों का परिवर्तन इसीलिए वो चाहता है। ठीक इसी तरह जीवन में भी पुरानी बातों को हमने इतना पकड़ के रखा है क्योंकि हमारे पास नवीनता है ही नहीं। अगर हर रोज़ नवीन बातें हों तो पुरानी बातें क्यों पकड़ेेंगे! एक बहुत सुन्दर उदाहरण याद आता है सर्कस में जब हम जाते हैं ना ट्रपेज़र्स(करतब दिखाने वाले) देखे होंगे हमने सर्कस में। जो एक रॉड को पकड़ते हैं और स्विंग(झूलना) करते हैं सामने से दूसरी रॉड आती है तो उसको पकड़ लेते हैं और पहली रॉड छोड़ देते हैं। वहाँ से फिर और दिशा में जाते हैं तीसरी रॉड आती है तो उस पर जम्प कर लेते हैं। और उसको छोड़ देते हैं। इस तरह से वो लोगों का मनोरंजन करते हैं। उन्हीं को देखकर सर्कस में जो जोकर होता है, वो भी ऊपर चढ़ता है, वो भी उस रॉड को पकड़ता है उसको होता है कि मैं भी करूँ। वो स्विंग करता है सामने से जब नई रॉड आती है लेकिन उसके पास ये आर्ट नहीं है चेंज करने की, तो वो क्या करता है इसको छोड़ देता है और उसको भी पकड़ नहीं पाता तो नीचे बिछाये जाल पर गिरता है तो बच जाता है। सब हँसते हैं उसके ऊपर, लेकिन फिर चढ़ता है। अब जब वो स्विंग करता है तो वो एक हाथ से उस रॉड को और दूसरे हाथ से सामने वाला रॉड पकड़ लेता है तो अब वो न ये छोड़ पाता है और न दूसरा रॉड छोड़ पाता है। सारे लोग हँसते हैं। तीसरी बार वो फिर चढ़ता है और उसको होता है कि अब तो मैं करूँगा। और अब तीसरी बार जब चढक़र करने का प्रयत्न करता है तो डर लगता है कि ये छोड़ दूँगा और दूसरा पकड़ नहीं पाया तो क्या करूँगा? तो सोचता है कि इसी पर स्विंग करो। इसी पर स्विंग करता है तो भी लोग हँसते हैं। हम लोगों के जीवन में भी कुछ ऐसी ही बातें हैं। पुरानी बातें जिसमें हम उस स्विंग पर स्विंग कर रहे हैं। क्यों, क्योंकि हमें नया पकडऩे का डर है। ये आर्ट नहीं है हमारे पास। जैसे वो ट्रपेज़र्स के पास एक आर्ट है, आर्ट इतना ही है चेंजिंग ऑफ रॉड्स। तो जीवन भी कुछ ऐसा ही है कि पुरानी बातों के रॉड को पकडक़र उसको झूल रहे हैं। नई बातें, नये अवसर, नई विचारधारा अगर हमारे सामने आती भी है उसको पकडऩे का एक डर है कहीं न कहीं मनुष्य में। ये डर है कि मैं उस नई विचारधारा को नहीं अपना पाया तो क्या होगा! इसीलिए सोचता है कि इसी पर स्विंग करो। हमारी पुरानी बातों में कुछ कड़वी बातें होती हैं तो कुछ मीठी बातें होती हैं। लेकिन हमें कड़वी बातें ज्य़ादा याद रहती हैं और मीठी कम रहती हैं।
जिस मनुष्य के जीवन में कड़वाहट ज्य़ादा भर गई हो किसी बात को लेकर, तो वो बातें ज्य़ादा ही पकड़ के रखते हैं कि नहीं इसका बदला लेंगे हम, ये करेंगे, दिखा देंगे, उसी पर झूल रहे होते हैं और सारा संसार हँस रहा है। पुरानी बातें पकड़ के चल रहा है। तब हमको लगता है कि हमको चेंज करना चाहिए। और इसीलिए हम फिर से कोशिश करते हैं लेकिन एक हाथ से पुरानी बातों को भी पकड़ के रखते हैं। नई विचारधारा को भी पकडऩा चाहते हैं न इसको छोड़ते हैं और न ही उसको पूरा पकड़ते हैं। इसीलिए दोनों के बीच में हम कई बार फ्रसट्रेशन(निराशा) में आते हैं।

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