आदरणीय राजयोगी बी के बृज मोहन भाई जी में अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए ज़बरदस्त आंतरिक शक्ति और ईश्वरीय ज्ञान की प्रेरणा थी।आदरणीय भाई-साहब में रमणीकता और गंभीरता का एक आदर्श संतुलन था। व्यक्ति की परख और समय देख कर कौनसा ज्ञान का तीर चलाना है इसका सटीक अनुभव उनके तरकश में मौजूद था। वे बाबा की मुरली के अनुसार दिव्य गुणों और ईश्वरीय शक्तियों के बारें में ही अधिकतर चर्चा करते थे। मैंने देखा है और अनुभव किया है कि भाई साहब हर किसी को ऊँची दृस्टि से देखते थे। भाई साहब बुद्धिवान थे, धैर्य और शीघ्रता कब और कैसे अपनाना है उसमे महारथ हांसिल थी।
एक बार की बात है मुझे मधुबन में रहते केवल पांच छः साल ही हुए थे, ज्ञानसरोवर में कॉन्फ्रैन्सेस होती रहती थी, भाई जी को कुछ पोलिटिकल विंग्स की टेप चाहिए थे, तब मुझे बड़ा शॉक लगा एक मुझ छोटे से बालक को भ्राता जी ने कहा- भाई साहब एक काम है ! पोलिटिकल विंग की कैसेट टेप चाहिए। हमने कहा- हाँ जी भाईजी। कहने का भाव यह है की भ्राता जी कितनी निर्माणता से कह रहे थे। मुझे तो बहुत ही अचंभित लगा। तब समझा भाई जी अपना कार्य बड़ी शालीनता से और युक्तियुक्त रीती से करते है।

अभी डेढ़ दो साल पहले लौकिक मामा जी को भाई साहब से मिलाया,तब मामा जी – एजुकेशन संस्थान के अध्यक्ष और लोकल बैंक के चेयरमैन थे। भाई साहब ने पहले तो उनसे सुना,परिचय में उन्होंने यह भी कहा हम माली है। तब भाई साहब ने उनको खेती के विषय से लेकर अच्छे कर्मों की खेती पर अच्छी तरह ज्ञान पंद्रह-बीस मिनिट तक समझाया। मामा जी 30 साल से, मेरे से नाराज थे कि भांजा कहाँ ब्रह्मा कुमारीज़ संस्था में आ गया। बस उसके बाद उनकी नारजगी निकल गई और संस्था के विषय में और मेरे बारे में सकारत्मक हो गए।

