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आबू राज(माउंट आबू): ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान ‘जामवंत’ की तरह सोई हुई शक्तियों को जगाने का कर रहा कार्य: शिक्षाविद्

आबू राज(माउंट आबू),राजस्थान:ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के ज्ञान सरोवर परिसर में विश्वविद्यालय और कॉलेज एजुकेटर कॉन्फ्रेंस  का भव्य आगाज़ हुआ ।  ब्रह्मकुमारीज शिक्षा प्रभाग  द्वारा उपाधियों से परे  शिक्षा कार्यक्रम को संबोधित करते हुए  देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिष्ठित अतिथियों ने शिक्षा में आध्यात्मिक मूल्यों के महत्व पर अपने अनुभव साझा किए।

अतिथियों के प्रेरक उद्गार : श्री हिंनजय पालीवाल (अध्यक्ष, गुजरात राज्य संस्कृत बोर्ड):* आपने एक सुंदर उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार हनुमान जी के पास शक्तियां थीं पर वे उन्हें भूल गए थे और जामवंत ने उन्हें उनकी शक्तियों की याद दिलाई, ठीक उसी प्रकार ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान समाज की सोई हुई शक्तियों को जागृत करने के लिए ‘जामवंत’ की भूमिका निभा रहा है। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को भारत की असली पहचान बताया।

डॉ. रीता शर्मा (निदेशक, एससीईआरटी, दिल्ली):* उन्होंने स्वीकार किया कि पहले उन्हें लगता था कि केवल थ्योरी पढ़ा देना ही शिक्षा है, लेकिन यहाँ आकर उन्होंने समझा कि किताबों से अलग हटकर बच्चों की समझ के साथ जुड़ना और स्वयं के अनुभव को साझा करना ही वास्तविक शिक्षा है।

डॉ. विजय कुमार अरोड़ा (कुलपति, सीडीएलयू, सिरसा):* उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी का ज़िक्र करते हुए कहा कि यदि विकसित भारत की गति को तेज़ करना है, तो शिक्षा में आध्यात्मिकता को शामिल करना ही होगा। उन्होंने चरित्र निर्माण और चेतना पर विशेष बल दिया।

डॉ. सुरेश आर. सवानी (निदेशक, भावनगर):* उन्होंने संस्थान की सराहना करते हुए कहा कि ब्रह्माकुमारीज़ मनुष्य को ‘मनुष्य’ बनाने वाली एक फैक्ट्री की तरह है। यदि छात्र मानवीय मूल्य सीख लें, तो जीवन में सफलता निश्चित है।

प्रो. (डॉ.) राम चंद्र पुर्बे (पूर्व शिक्षा मंत्री, बिहार):* लगभग 25 वर्षों बाद संस्थान में पुनः आगमन पर उन्होंने खुशी जाहिर की और अपने विद्यालय को प्रकृति व संस्कृति से जोड़ने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह संस्थान व्यक्ति से ‘मानव’ बनाने का अद्भुत कार्य कर रहा है।

राजयोगिनी बी.के. सुदेश दीदी का दिव्य संदेश:

संस्थान की संयुक्त मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी बी.के. सुदेश दीदी* ने अपने आशीर्वचनों में कहा कि शिक्षा वही है जो मनुष्य को बंधनों से मुक्त कर दे। उन्होंने प्रेरणा दी कि जब एक शिक्षक स्वयं राजयोग के अभ्यास द्वारा शांत और सुखी बनता है, तभी वह विद्यार्थियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। दीदी ने ज़ोर दिया कि डिग्रियों के साथ-साथ जीवन में दिव्य गुणों का समावेश अनिवार्य है।

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