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माउंट आबू : ब्रह्माकुमारीज प्रशासक सेवा प्रभाग द्वारा “कर्मयोग द्वारा सशक्त प्रशासन” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

मूल्यनिष्ठ प्रशासक ही बनाएंगे भारत को विश्वगुरु”
“आध्यात्मिक सशक्तिकरण ही है सुशासन के आधारशिला “

माउंट आबू,राजस्थान: आज के बदलते प्रशासनिक परिवेश में केवल पद, अधिकार और संसाधन पर्याप्त नहीं है।बल्कि नैतिक मूल्यों, आत्म-अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना से युक्त नेतृत्व की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य को लेकर ब्रह्माकुमारीज प्रशासक सेवा प्रभाग द्वारा “कर्मयोग द्वारा सशक्त प्रशासन” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया।

विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव मनोज कुमार जी ने उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि सरकारी विभागों में कर्मचारियों के बीच आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे समूहों में मूल्य-आधारित प्रशिक्षण चलाया गया। एक वर्ष तक चले इस प्रयास के परिणाम अत्यंत सकारात्मक रहे। एक सफल प्रशासक की पहचान तीन गुणों से होती है—विश्वास, पारदर्शिता और सहजता। वर्तमान समय में इन मूल्यों की कमी महसूस की जा रही है, जबकि आध्यात्मिकता इनके विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है।

ब्रह्माकुमारी संस्था के महासचिव राजयोगी भ्राता करुणा जी ने कहा कि ब्रह्माकुमारी का मूल संदेश “स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन” है। उन्होंने कहा कि वास्तविक नेतृत्व स्वयं पर विजय प्राप्त करने से प्रारंभ होता है। जो अपनी इंद्रियों और मन का स्वामी बन जाता है, वही समाज का श्रेष्ठ मार्गदर्शक बन सकता है। उन्होनें कहा कि संस्था की शिक्षा दो आधारों पर आधारित है—“मैं आत्मा हूँ” और “एक परमात्मा मेरा पिता एवं मार्गदर्शक है।” यही आत्मज्ञान मनुष्य को आत्मबल, शांति और निर्णय क्षमता प्रदान करता है। भारत का विश्वगुरु बनना आध्यात्मिक मूल्यों के पुनर्जागरण पर निर्भर करता है।

प्रशासक सेवा प्रभाग की अध्यक्षा राजयोगिनी ब्र.कु.आशा दीदी ने सम्मेलन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके आध्यात्मिक मूल्यों, संस्कारों और चरित्र में निहित है। उन्होनें कहा कि दुर्गा माता की आठ भुजाएं वास्तव में मनुष्य के भीतर निहित शक्तियों, सद्गुणों और सहयोग की प्रतीक हैं। केवल मूल्यों की चर्चा करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारना ही वास्तविक शक्ति है। उन्होनें कर्मयोग को परिभाषित करते हुए कहा कि कर्मयोग वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति पूर्ण जागरूकता और परमात्म स्मृति के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। एक सच्चा कर्मयोगी सफलता और असफलता से ऊपर उठकर अपने कर्म की श्रेष्ठता और ईमानदारी पर ध्यान देता है। जब कर्म में योग का समन्वय हो जाता है, तब कार्य तनाव नहीं बल्कि पूजा बन जाता है।

ब्रह्माकुमारी संस्था की संयुक्त प्रशासिका राजयोगिनी ब्र.कु.सुदेश दीदी ने कहा कि उन्हें यह सम्मेलन किसी प्रशासनिक बैठक से अधिक “राजाओं की सभा” प्रतीत हो रहा है। राजयोग राजाओं को सिखाया जाता है और यहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति आत्म-राज्य का अधिकारी है। पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला ही वास्तविक “राजा दशरथ” है।उन्होनें कहा जब व्यक्ति राजयोग के माध्यम से अपनी इंद्रियों का स्वामी बन जाता है, तब उसके भीतर सर्वशक्तिमान परमात्मा के गुण और शक्तियां स्वतः भरने लगती हैं। तब मन संशय, तनाव और नकारात्मकता से मुक्त होकर स्थिर, शक्तिशाली और निर्णयक्षम बन जाता है। परमात्मा हमें नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनने की प्रेरणा देता है। यही आध्यात्मिक साधना परिवारों को संस्कारित, समाज को श्रेष्ठ और विश्व को स्वर्ग समान बना सकती है।

ह्यूमन राइट्स आयोग, भोपाल के चेयरमैन डॉ. अवधेश प्रताप सिंह ने कहा कि आज दुनिया बाहरी विकास और सशक्तिकरण पर अधिक ध्यान दे रही है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन आंतरिक सशक्तिकरण से ही संभव है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अनेक भूमिकाएं निभाता है, इसलिए उसे मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त होना आवश्यक है। उन्होंने प्रकृति, खेल और अध्यात्म को सशक्तिकरण के प्रमुख माध्यम बताते हुए कहा कि अध्यात्म व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है और वही स्थायी विकास का आधार है।

ज्ञान सरोवर की निदेशिका राजयोगिनी ब्र.कु. प्रभा दीदी जी ने कहा कि कर्मयोग का वास्तविक अर्थ कर्मों में उत्कृष्टता और चेतना का समन्वय है। “योगः कर्मसु कौशलम्” अर्थात कर्म का कौशल ही योग है। राजयोग हमें सिखाता है कि किस प्रकार प्रत्येक कर्म को श्रेष्ठ, संतुलित और प्रभावशाली बनाया जाए। उन्होनें कहा जब व्यक्ति अपने कार्यों को आत्मिक चेतना के साथ करता है, तब उसका जीवन केवल सफलता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। उन्होंने उपस्थित प्रतिभागियों को राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास भी कराया।

प्रशासक सेवा प्रभाग के मुख्यालय संयोजक ब्र.कु.हरीश भाई जी ने कहा कि प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत व्यक्तियों के लिए आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश केवल व्यक्तिगत उन्नति ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण का भी आधार है। ब्र.कु.शैलेश भाई जी ने आभार व्यक्त किया।

दिनांक ५ जून तथा ६ जून, २०२६ के दिन भी प्रशासनिक क्षेत्र के अधिकारियों के आध्यात्मिक विकास से सम्बंधित विभिन्न विषयो पर ६ चिंतन सत्रों का भी आयोजन किया गया। जिसमें अनुभवी, विद्वान् वक्ताओं ने अभिप्राय प्रस्तुत किये तथा संस्था के राजयोगी, कर्मयोगी वक्ताओं या कर्मयोगी जीवन जीने की कला के बारे में प्रेरक वक्तव्य दिए।

राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी आशा दीदी, चेयरपर्सन, एडमिनिस्ट्रेशन विंग तथा डायरेक्टर, ओमशांति रिट्रीट सेंटर, गुरुग्राम, दिल्ली ने संस्था की स्थापना का इतिहास तथा सेवा प्रवृत्तियों की जानकारी आँखों देखा हाल के रूप में दी। सम्मेलन के समापन सत्र में कुशल लोक सेवा के लिए कर्मयोग के विषय में विद्वान वक्ताओं द्वारा प्रेरक मार्गदर्शन दिया गयदिया गया।
सम्मेलन के अंतिम दिन कल्चरल प्रोग्राम का भी आयोजन किया गया, इसमें कलाकारों द्वारा उत्कृष्ट गीत, संगीत, नृत्य प्रस्तुत किया गए साथ ही अनुभव सत्र भी रखा गया, जिसमें  वाले महानुभावों ने  सम्मेलन  के दौरान हुए अनुभवों को सुनाये। 

इस सम्मेलन में समस्त भारत के विभिन्न राज्यों से लगभग ३०० प्रशासनिक अधिकारीयों ने भाग लिया।जिसमे आईएएस अधिकरियों, प्रशासनिक अधिकारी, एसोसिएशन, कंपनी बैंक के अधिकारीयों ने भाग लिया। 

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