”ठहर जा ओ मानव, किधर जा रहे हो; मंजि़ल नहीं, तुम जिधर जा रहे हो” यह पंक्ति केवल एक आध्यात्मिक गीत नहीं, बल्कि आज के युग की सबसे बड़ी चेतावनी है। ऐसा लगता है मानो स्वयं परमात्मा व्यस्त, थके और दिशाहीन मानव को पुकार रहे हों – ”ज़रा ठहरो, सोचो, जिस दिशा में तुम भाग रहे हो, क्या वास्तव में वही तुम्हारी मंजि़ल है?” आज का मनुष्य पहले से अधिक शिक्षित है, अधिक संपन्न है और तकनीकी दृष्टि से अधिक सक्षम है। उसके हाथ में पूरी दुनिया है लेकिन मन में शांति नहीं है। साधन बढ़े हैं, पर संतोष घटा है। संपर्क बढ़े हैं, पर संबंध कमज़ोर हुए हैं। ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो गई हैं लेकिन भीतर का मन खाली होता जा रहा है। यही आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
इसका मूल कारण यह है कि मनुष्य ने अपनी वास्तविक पहचान खो दी है। वह स्वयं को शरीर मानकर शरीर से जुड़ी उपलब्धियों को ही जीवन का लक्ष्य समझ बैठा है। जबकि वह मूलत: शांंति, प्रेम, पवित्रता और आनंद स्वरूप आत्मा है। जब आत्मा स्वयं को भूल जाती है, तब वह बाहरी वस्तुओं में सुख खोजती है और अंतत: निराशा का अनुभव करती है।
गीत की पंक्ति – ”’साधनों में उलझा हुआ तेरा मन है, बीच भँवर में फँसा ये जीवन है” – आज के युग का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है। मनुष्य साधनों का स्वामी बनने के बजाए उनका दास बनता जा रहा है। सफलता की अंधी दौड़ में उसने जीवन का उद्देश्य ही पीछे छोड़ दिया है। परिणामस्वरूप तनाव, अवसाद, असुरक्षा और अशांति उसके स्थायी साथी बनते जा रहे हैं।
ऐसे समय में राजयोग मानव को भीतर की यात्रा का मार्ग दिखाता है। यह सिखाता है कि परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर से प्रारंभ होता है। जब आत्मा स्वयं को पहचानती है और परमात्मा शिव से अपना संबंध जोड़ती है, तब उसके भीतर सुप्त दिव्य शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं। विचारों में पवित्रता आती है, निर्णयों में स्पष्टता आती है और जीवन में संतुलन स्थापित होता है।
गीत की यह पुकार – ”आओ बदलें ये चिंतन की धारा, समझें प्रभु के समय का इशारा” – आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। अब वर्तमान संगमयुग वह पावन समय है जब परमात्मा शिव स्वयं मानव को नई दिशा देने के लिए अवतरित हुए हैं। उनका संदेश है – पहले स्वयं को बदलो, फिर संसार अपने आप बदलने लगेगा। विश्व परिवर्तन का आधार आत्म परिवर्तन है।
आज पूरी दुनिया शांति, विश्वास और मानवीय मूल्यों की तलाश में है। समाधान केवल नई तकनीक, नई व्यवस्था या नई नीतियों में नहीं, बल्कि नए और श्रेष्ठ संस्कारों वाले मनुष्य के निर्माण में है। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर प्रेम, करुणा, सत्य और पवित्रता के संस्कार विकसित करेगा, तभी एक श्रेष्ठ समाज और स्वर्णिम विश्व की नींव रखी जा सकेगी।
गीत की अंतिम पुकार – ”प्रभु का निमंत्रण क्यों ठुकरा रहे हो?” – हर आत्मा स्वयं से एक आत्मीय प्रश्न करती है क्या हम केवल उपलब्धियों का जीवन जीना चाहते हैं या उपलब्धि के साथ आत्मिक संतुष्टि भी चाहते हैं? क्या हम केवल सफलता चाहते हैं या सफलता के साथ शांति भी?
आज आवश्यकता केवल तेज़ चलने की नहीं, बल्कि सही दिशा में चलने की है। कुछ क्षण रुककर स्वयं से पूछें – मैं कौन हूँ? मेरा जीवन किस उद्देश्य के लिए है? मेरी मंजि़ल क्या है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर आत्म-जागृति, परमात्म स्मृति और श्रेष्ठ कर्मों की दिशा में मिलता है, तो समझिए कि मानव ने अपनी वास्तविक मंजि़ल पहचान ली है। तभी यह गीत केवल सुनने का विषय नहीं रहेगा, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक बन जाएगा। यही समय का संदेश है – रुकिए, स्वयं को पहचानिए, परमात्मा से जुडि़ए और अपने जीवन को स्वर्णिम भविष्य की ओर अग्रसर कीजिए।
ठहर जा ओ मानव,मंज़िल नहीं समय है दिशा बदलने का
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