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रिटर्न जर्नी – की वास्तविकता को समझते हैं

संगमयुग का यह अनुपम समय आत्माओं के लिए परमात्म मिलन और आत्म-परिवर्तन का श्रेष्ठ अवसर है। चारों ओर बदलती हुई विश्व परिस्थितियाँ, अशांति, तनाव और मानवीय मूल्यों का ह्रास हमें एक गहरे आत्मचिंतन के लिए पे्ररित करते हैं। ऐसे समय में परमपिता शिव अपने बच्चों को स्नेहपूर्ण स्मृति दिलाते हैं – अब समय है रिटर्न जर्नी का।

रिटर्न जर्नी अर्थात् केवल परमधाम वापस जाने की यात्रा नहीं, बल्कि परमात्मा से प्राप्त हुए दिव्य खज़ानों को संसार में बाँटने की यात्रा भी है। बाबा ने हमें ज्ञान दिया, योग की शक्ति दी, श्रेष्ठ संस्कारों की पालना दी और आत्मा को उसकी वास्तविक पहचान कराई। अब समय है कि हम दिव्य प्राप्ति का प्रतिदान अपने जीवन और कर्मों के माध्यम सेे दें।

रिटर्न का आध्यात्मिक अर्थ
परमात्मा समझाते हैं कि रिटर्न के दो अर्थ हैं। पहला-जहाँ से हम आये हैं, उस अपने स्वीट साइलेंस होम,परमधाम में वापस लौटना। दूसरा- जो कुछ परमात्मा ने हमें दिया है, उसे विश्व कल्याण के लिए वापस देना।
परमात्मा ने हमेंकेवल सुख प्राप्त करने का मार्ग नहीं बताया,बल्कि सुख देने वाला बनने की कला सिखाई है। उन्होंने हमें शांति का अनुभव कराया, ताकि हम अशांत आत्माओं को शांति का अनुभव करा सकें। उन्होंने हमें प्रेम दिया, ताकि हम प्रेम के दीपक बनकर दूसरों के जीवन में उजाला कर सकें।

बाप समान बनने की प्रेरणा
मुरली में बाबा बच्चों को बार-बार प्रेरणा देते हैं – बाप समान बनो। परमात्मा प्रेम के सागर, शांति के सागर, करुणा के सागर और दया के सागर हैं। उनके बच्चे होने का अर्थ है कि हमारे जीवन में भी इन दिव्य गुणों की झलक दिखाई दे।
आज अनेक आत्माएं जीवन की कठिन परिस्थितियों से गुजऱ रही है। किसी को सच्चे स्नेह की आवश्यकता है, किसी को सहयोग की, किसी को सही मार्गदर्शन की। ऐसे समय में ब्राह्मण आत्माओं का कत्र्तव्य है कि वे अपने विचार, वाणी और व्यवहार से परमात्मा के संदेश को साकार करें। क्योंकि कई बार जो प्रभाव शब्द नहीं डाल पाते, वह हमारा श्रेष्ठ आचरण कर देता है। एक मधुर मुस्कान, एक शुभ भावना, एक सहयोग का हाथ और एक शांत व्यवहार किसी के जीवन में नई आशा जगा सकता है।

पुराने संस्कारों का त्याग, दिव्य संस्कारों की धारणा
रिटर्न जर्नी की वास्तविक तैयारी अपने अंदर के परिवर्तन से शुरू होती है। पुरानेे संस्कारों का त्याग ही सच्चा त्याग है। क्रोध, अहंकार, आलस्य, ईष्र्या, स्वार्थ और देह-अभिमान जैसे संस्कारों को समाप्त कर आत्मा के मूल गुणों को प्रकट करना ही ब्राह्मण जीवन की सुंदरता है।
हमारा वास्तविक स्वरूप ही प्रेम, शांति, पवित्रता और सहयोग है। परमात्मा ने हमें यही स्मृति दिलाई है कि हम साधारण आत्माएं नहीं, बल्कि दिव्य संस्कारों से सम्पन्न श्रेष्ठ आत्माएं हैं।

विश्व कल्याण के निमित्त बनना
आज विश्व को केवल भाषणों की नहीं, बल्कि श्रेष्ठ जीवन जीने वाले व्यक्तित्वों की आवश्यकता है। जब हम स्वयं शांत स्वरूप बनते हैं, तभी दूसरों को शांति देसकते हैं। जब हमारे कर्म दिव्य बनते हैं, तभी संसार को नई दिशा मिलती है।
परमात्मा की इच्छा है कि उनके बच्चे उनके कार्य में सहयोगी बनें। जहाँ
दु:ख है वहाँ सुख पहुँचाएं, जहाँ निराशा है वहाँ उमंग जगाएँ, जहाँ अज्ञान है वहाँ ज्ञान का प्रकाश फैलाएँ। यही सच्ची विश्व सेवा है। यही परमात्मा की पालना का वास्तविक रिटर्न है।
आज समय है स्वयं से पूछने का -यदि बाबा हमसे पूछें,”बच्चे, मैंने तुम्हें जो प्रेम, ज्ञान और शक्ति दी, उसका रिटर्न क्या लाए?” तो हमारा उत्तर क्या होगा?
आइए, ऐसा जीवन बनाएँ कि हमारा हर विचार शुभ हो, हर वाणी मधुर हो और हर कर्म विश्व कल्याण का माध्यम बने।
क्योंकि सच्ची रिटर्न जर्नी वही है, जिसमें आत्मा घर लौटने से पहले परमात्मा के कार्य को आगे बढ़ाने का संकल्प लेती है।
क्रक्रबाबा,आपने हमें जो बनाया है,अब हम भी आपके समान बनकर विश्व में शांति और सुख का प्रकाश फैलाएँगे।ञ्जञ्ज

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