Homeसंपादकीयविकारों से बचना है तो नियमित करें यह अभ्यास

विकारों से बचना है तो नियमित करें यह अभ्यास

मनुष्य दु:ख से छूटने का जितना प्रयास करता, उतना ही वो और ही उस भंवर में उलझता चला जाता। उसे न तो दु:ख से छूटने का सही मार्ग का पता और न ही कैसे छूटा जाये उसका पता। वो समझता है कि भगवान का गुणगान करने से या पूजा आदि करने से उसके दु:ख-दर्द मिट जायेंगे। परंतु यह तो ऐसा है कि मैंने लाल कपड़े पहन कर कोई पाप कर्म किया और सफेद कपड़े पहने तो वो चुक्तू हो गया। ये तर्कसंगत बात नहीं है। जो दु:ख आया है, वो दु:ख उसी रूप और उसी अनुपात में ही पूरा होता है। जैसे हमने किसी से हज़ार रुपये नकद के रूप में उधार लिये तो हज़ार रुपये नकद लौटाने पर ही तो हमारा हिसाब बराबर होगा ना! ठीक वैसे ही दु:ख आता ही है कोई न कोई विकारों के वश किये हुए कर्म के कारण। आसक्ति व स्वार्थवश किया हुआ कर्म ही हमें दु:ख देता है। ऐसे में हम क्या करें जो हम उससे मुक्त हो पायें? ऐसा नहीं हो सकता कि हमारे सामने परिस्थितियां व दु:ख आवेे ही ना, तो हम सुख-शांति से रहें। पर ये तो जीवन-यात्रा है, तो यात्रा में तो साइड-सीन आयेगी ही। ऊँचाई-निचाई तो होगी ना! इसमें परिस्थितियां, मुश्किलातें तो आयेंगी ही, पर हम उसमें से कैसे बिना असहज हुए पार हो सकें ये कला हमें खुद में लानी होगी।
माली समझदार हो, तो कांटों से नफरत नहीं, बागड़ का काम ले लेता है। ऐसे ही हमें कुछ बातों का सही इस्तेमाल कर लेना चाहिए और कुछ को तो शुरुआत में ही रोक देना चाहिए। जि़न्दगी में कुछ चीज़ें यदि शुरुआत में न रोकी जाए तो फिर उन्हें बीच में रोकना मुश्किल होता है। जैसे तीर यदि एक बार कमान से निकल जाए तो छूटा हुआ तीर फिर नहीं रुकता। ऐसे ही शब्द और वासना, ये दो बातें ऐसी हैं जिनके साथ पूरा होश और पूरी समझ रखनी होगी। शब्द का तीर जीभ की कमान से निकलता है, वासना का तीर विचार की कमान से गुज़रता है। शब्द का तीर यदि एक बार निकल गया, फिर आप कुछ नहीं कर पायेंगे। ऐसे ही यदि एक बार वासना का तीर छूटा, तो नुकसान पहुंचायेगा ही। इसलिए सबसे पहले जीभ के स्तर पर काम करिए, बोलने से पहले थोड़ा सोचिए। यह संभव हो सकेगा एक प्रयोग से।
अपनी जीभ को भीतर ही भीतर ऊपर मोडि़ए और तालु पर टिकाकर दो-तीन मिनट रोकिए। इस अभ्यास से जीभ पर नियंत्रण होने लगेगा। ऐसे ही यदि वासना का तीर कंट्र्रोल करना हो तो विचार के स्तर पर काम करिए। जैसे ही मन में कोई बुरा विचार आए, उसे वहीं खत्म कर, तुरंत सांस रोक लें। मन को बुरे विचार का भोजन मिलना बंद होगा और वह बुरा ख्याल बाहर ही रह जायेगा। आप गलत विचारों से बच जायेंगे। आप इसे अभी ही करके देखें। आपके विचार की धारा बंद हो गई ना? इसी तरह आप कभी भी जोश में होश को नहीं खोयेंगे और विकारों के फोर्स से बच जायेंगे। और जहाँ एक बार उसका फोर्स कम हो गया, तो आपको सम्भलने का अवसर मिल जायेगा। और उससे होने वाले विकर्म से भी बच जायेंगे। जहाँ विकर्म नहीं होगा, वहाँ दु:ख भी नहीं होगा। तो आपको लगातार अपने ऊपर अटेंशन रखना होगा। आप अगर ऐसा तीन दिन के लिए कर पाये, फिर सप्ताह के लिए कर लिया, फिर आपने पंद्रह दिन तक कर लिया, ऐसे ही आपने क्रम में एक महीने से तीन महीने तक कर लिया तो आपकी बुरी आदतें और पुराने संस्कार पूर्ण रूप से कमज़ोर होकर जड़ से ही खत्म हो जायेंगे और आप इस तरह विकारों से बच जायेंगे अर्थात् दु:ख से भी बचे रहेंगे। अब इसकी जगह जो खाली हुआ स्थान है, उस स्थान को सद्विचारों और श्रेष्ठ विचारों के चिंतन से भरें, तो फिर जैसा बोओगे वैसा ही बाहर आयेगा, इस सिद्धान्त के अनुरूप आपने जो शुभ भरा है वो सुख के रूप में बाहर आयेगा।

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