बाबा कहते आधा स्लोगन याद नहीं करो कि मैं किसी को दु:ख नहीं देता हूँ, मैं तो सभी से बहुत अच्छा चलता हूँ, लेकिन दूसरे मेरे को डिस्टर्ब करते हैं, तंग करते हैं। वास्तव में अगर उसने दु:ख दिया भी तो जिम्मेवार मैं हूँ कि दु:ख लूं या नहीं लूं।
बाबा के प्यार का अभी हम सबको मिलकर रिटर्न देना है। जिससे प्यार होता है उसका जो भी संकल्प, बोल, कर्म होता है वो प्यारा भी लगता है और उस जैसा बनने का लक्ष्य भी रहता है। हम सबका तो बाबा से 100 प्रतिशत से ज्य़ादा प्यार है ना! बाबा कहता है मुझे और कुछ रिटर्न नहीं चाहिए। सिर्फ आप टर्न हो जाओ, यही रिटर्न चाहिए। अभी मुझे परिवर्तन करना ही है। दूसरे को थोड़ा-थोड़ा देखेंगे? क्योंकि दूसरे को देखने से अलबेलापन भी आ जाता है। कभी सोचते हैं कि महारथी भी ऐसे हैं, कोई सम्पन्न नहीं हुआ है, कमी है तो मेरे में भी थोड़ी कमी रह गयी, तो यह है अलबेलापन। वो पुरुषार्थ कर रहे हैं अपनी कमी छोडऩे का और हम उसकी कमी को देखकर, अपने अन्दर रखकर फॉलो करके अलबेले बनें तो नुकसान किसको? आजकल तो बाबा हमको स्लोगन भी याद करा रहा है – न दु:ख दो न दु:ख लो। अगर कोई भाई या बहन, निमित्त टीचर भी कुछ कह देती है तो बाबा प्रश्न पूछता है, चलो उसने आपको दु:ख दिया, तो लेने वाला कौन है? देने वाला अलग होता है, लेने वाला अलग होता है। उसने दिया, उसका कर्म बापदादा जाने। लेकिन हम लेते क्यों हैं! आपको कोई खराब चीज़ देते हैं तो उसे फेक देंगे ना!
बाबा कहते आधा स्लोगन याद नहीं करो कि मैं किसी को दु:ख नहीं देता हूँ, मैं तो सभी से बहुत अच्छा चलता हूँ, लेकिन दूसरे मेरे को डिस्टर्ब करते हैं, तंग करते हैं। वास्तव में अगर उसने दु:ख दिया भी तो जिम्मेवार मैं हूँ कि दु:ख लूं या नहीं लूं। मन में कभी भी अगर कोई दु:ख देता है तो लेना नहीं है यानी दिन में फील नहीं करना है। अगर फील किया, तो मन में फीलिंग आ गयी तो जब भी वो सामने आयेगा तो उसके प्रति कभी भी शुभ भावना, शुभ कामना होगी ही नहीं। कोई न कोई ग्लानि ही आयेगी या ईष्र्या आयेगी या घृणा आयेगी।
अगर किसी ने कुछ कह दिया तो भविष्य के लिए उससे शिक्षा लेकर अपने को ठीक रखूं। बाबा तो कहते ही हैं कि निन्दा हमारी जो करे मित्र हमारा सोय। आप सबने यज्ञ की कहानी सुनी होगी कि कलकत्ते में एक दैनिक विश्वमित्र अखबार निकलती है, उसमें बाबा की जीवन कहानी में लिख दिया कि दादा साईकल रिपेयर का काम करता था। जब निर्मलशांता दादी ने पढ़ा तो उसको जोश आ गया कि मैं इस पर केस करूँगी। तो उसने बाबा को पत्र लिखा कि ऐसे अखबार में निकला है। तो बाबा ने यही कहा कि बाबा सब बच्चों का बाप है, अभी बाप कैसे छुट्टी देगा कि मेरे बच्चे पर
केस करो। मैं तो सबका पिता हूँ तो कैसे मैं छुट्टी दूंगा। आप यही सोचो कि निन्दा हमारी जो करे मित्र हमारा सोय। यही मित्र बनके आपकी प्रजा में आयेगा। तो फालो फादर करना है।

