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इंदौर: आदरणीय ओम प्रकाश भाईजी की 8 पुण्य स्मृति दिवस पर विशेष अनुभव

 प्रेरणा स्रोत ओम प्रकाश भाईजी

इंदौर,मध्य प्रदेश।आदरणीय भाईजी मेरा बचपन से प्रेरणा स्रोत रहे थे भाईजी को 11या 12वर्ष की थी तभी से भाईजी से पहचान हो गई थी। भाईजी एक बार लगभग 25 ब्र.कु. समर्पित सीनयर दीदियों को लेकर हमारे लौकिक घर आये थे। मैं और हमारे घर वाले कितने भाग्यशाली हैँ ऐसे महान आत्माओ के हमारे घर में चरण पड़े। परिवार वाले सभी ख़ुशी से गदगद हो गए । भाई जी को अपने अलौकिक पिता के रूप में देखती थी।

भाईजी को देखकर एक अलग रूहानी फरिस्ता का अहसास होता था, एक रूहानी आकर्षण होता था भाईजी को अपनी छोटी बड़ी बात शेयर करती थी । भाई जी भी मेरे से छोटे बच्चे की तरह बात करते थे। मैं लगभग हर त्यौहार रायपुर शांति सरोवर रिट्रीट सेंटर में मनाती थी तो भाई जी से हमेशा मिलना होता था। भाई जी हमेशा खुश खैरापत व घर का हालचाल पूछते थे,भाई जी मुझे देख देख बहुत खुश होते थे, भाई जी हमेशा कहा करते थे पढ़ाई करने के बाद नौकरी की टोकरी नही उठाना। मेरे मन में था पढ़ाई करके मैं डॉ. बनु परन्तु खुदा को कुछ और ही मंजूर था और मैं रूहानी डॉ बन गई। भाई जी से जब से पहचान हुई थी तब से मैं राखी के साथ एक पत्र भी भेजती थी और भाई जी पत्र का बकायदा जवाब भी देते थे । मैंने भाई जी में ब्रह्मा बाप का स्वरुप देखा, निरहंकारी के अवतार थे । 2006 में शांति सरोवर रायपुर आई हुई थी उसी समय भाई जी भी रायपुर आये हुए थे, भाई जी इंदौर लौटते वक़्त कार में बैठते बैठते कहा इंदौर चल रही हो ? मैंने कहा जी भाईजी, भाईजी ने तुरंत घर से कपड़े का अटैची मगवाएं और मैं इंदौर आ गई । 2015 में मेरा माउन्ट आबू में समर्पण समारोह हुआ। उसके बाद इंदौर आ गए। कुछ समय के बाद भाईजी से मिलने गए ओम शांति भवन न्यू पलासिया (ज्ञान शिखर )उस समय भाईजी की तबियत ख़राब थी, रेस्ट कर थे हम इंतजार करने लगे मेरे साथ मेरे से बड़ी लौकिक अलौकिक बहन और मेरी लौकिक माता जी भी थी। थोड़ी देर के बाद भाई जी से मिलने गए कमरे में तो भाईजी बड़े प्यार से हमें बैठाया और बाते करने लगे और कहा मुझे पहले क्यों नही जगाया, बीमार थे परन्तु उनके चेहरे में थोड़ी भी सिकन नही था । हमसे हँस हँस कर बाते करते रहे, मेरे सारे समर्पण के एक एक फोटो को देखा हम उस दिन डेढ़ दो घंटे तक मिलते ही रहे, समय का पता नही चला। ऐसे थे हमारे भाई जी- जो छोटे बड़े सभी को अपना स्नेह भरे प्यार लुटाते थे और अपना बना लेते थे। करुणा व पारखी नजर के खान थे। भाईजी ऐसे महान बाबा के अमूल्य रत्न को बारम्बार नमन एवं श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ।

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