हम सभी की जि़ंदगी कैसी है, क्या है, और किस दिशा में जा रही है – यह लगभग हर व्यक्ति जानता है। फिर भी जीवन में निरंतर उतार-चढ़ाव, अनेक घटनाएं, किस्से और अनुभव आते रहते हैं। हम उन्हें स्वीकार भी करते हैं और समय के अनुसार कर्म भी करते रहते हैं।
हम सभी की जि़ंदगी कैसी है, क्या है, और किस दिशा में जा रही है – यह लगभग हर व्यक्ति जानता है। फिर भी जीवन में निरंतर उतार-चढ़ाव, अनेक घटनाएं, किस्से और अनुभव आते रहते हैं। हम उन्हें स्वीकार भी करते हैं और समय के अनुसार कर्म भी करते रहते हैं। शरीर एक अद्भुत यंत्र है, जिसकी अपनी एक कार्यप्रणाली(मैकेनिज़्म) है। इस शरीर को संतुलित और व्यवस्थित रखने के लिए हम योगासन का सहारा लेते हैं। जब हम योगासन करते हैं, तो हमें लगता है कि हमने कुछ विशेष किया है, शरीर हल्का और स्वस्थ महसूस होता है। लेकिन कुछ समय बाद फिर वही स्थिति आ जाती है। प्रश्न उठता है – ऐसी अवस्था से बाहर कैसे निकला जाए?
प्रश्न अनेक हैं, लेकिन उत्तर एक है, मिलन। मार्ग अनेक हैं, लेकिन रोशनी एक ही है।
यदि हम अपने जीवन को ध्यान से देखें, तो पाएंगे कि जीवन का एक बड़ा हिस्सा केवल शरीर के निर्वाह में बीत जाता है। बचपन में हम स्वतंत्र होते हैं, शरीर की ओर अधिक ध्यान नहीं देते। खेलकूद और सक्रियता के कारण शरीर स्वत: स्वस्थ रहता है। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, जि़म्मेदारियां बढ़ती हैं और हम अपने शरीर तथा मन की अनदेखी करने लगते हैं।
जब शरीर में समस्याएं आती हैं, तो हमें सलाह दी जाती है – योगासन करें, प्राणायाम करें। हम यह सब शुरू भी करते हैं, लेकिन कुछ समय बाद उसका प्रभाव कम होने लगता है। इसका कारण क्या है?
कारण यह है कि आसन करने वाला और उसे संचालित करने वाला अलग-अलग है। जैसे एक कार स्वयं नहीं चल सकती – उसे चलाने के लिए एक चालक(ड्राइवर) आवश्यक होता है। उसी प्रकार यह शरीर एक यंत्र है और उसका चालक है – आत्मा। यदि यह चालक शक्तिशाली नहीं है, तो शरीर का तंत्र ढंग से कार्य नहीं कर सकता।
इसलिए यह समझना आवश्यक है कि केवल शारीरिक योग पर्याप्त नहीं है। राजयोग हमें यह सिखाता है कि जैसे हम बाहरी उपकरणों – बिजली, पंखा, लाइट आदि का उपयोग करना सीखते हैं वैसे ही हमें अपने मन और संकल्पों को भी समझना और नियंत्रित करना चाहिए। हमारे भीतर जो विचार और संकल्प उत्पन्न होते हैं वही हमारे शरीर को संचालित करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप पार्क में योगासन कर रहे हैं और अचानक घर से कोई आपातकालीन समाचार मिल जाए, जैसे किसी को हार्ट अटैक आ गया, तो तुरंत आपकी सारी शारीरिक स्थिति बदल जाती है। आपकी ऊर्जा का प्रवाह बदल जाता है और मन पूरी तरह उस परिस्थिति में लग जाता है।
इससे स्पष्ट होता है कि शरीर को नियंत्रित करने वाली मुख्य शक्ति मन और आत्मा है। जब हम इंद्रियों को नियंत्रित कर लेते हैं तो हमारा शारीरिक तंत्र स्वत: नियंत्रित हो जाता है। तब हम जिस समय जो करना चाहें, उसे सहज रूप से कर सकते हैं। यह अवस्था अत्यंत श्रेष्ठ है।
आज की भागदौड़ भरी जि़ंदगी में हम मशीन की तरह कार्य करते हैं लेकिन हमारे विचार निंरतर चलते रहते हैं। इसलिए योग गुरु भी कहते हैं कि जब आप योगासन करें, तो पूर्ण जागरूकता के साथ करें – ध्यान दें कि पैर कैसे हैं, हाथ कैसे हैं, शरीर की स्थिति कैसी है। लेकिन यह जागरूकता तभी संभव है जब मन शांत और नियंत्रित हो। यदि मन भय, चिंता, दु:ख, पीड़ा या तनाव से भरा हुआ है तो वह एक अस्वस्थ ड्राइवर की तरह है जो गाड़ी को सही दिशा में नहीं चला सकता। इसलिए सबसे पहले मन का स्वस्थ होना आवश्यक है। राजयोग मन को स्वस्थ बनाता है। यह मन की उलझनों को समाप्त करता है और भीतर शांति एवं शक्ति भरता है। जब मन संतुलित होता है, तब शारीरिक योग का वास्तविक लाभ मिलता है।
इसलिए अब समय है जागने का – सबसे पहले स्वयं को जानने का कि मैं इस शरीर को चलाने वाली शक्ति आत्मा हूँ। जब आत्मा स्वयं को पहचानती है और परमात्मा से जुड़ती है तब उसे एक दिव्य शक्ति प्राप्त होती है। उस शक्ति के साथ किया गया हर कार्य सफल होता है। दुनिया में अनेक प्रकार के योग और आसन प्रचलित हैं और सभी का अपना महत्त्व है। लेकिन राजयोग एक ऐसा योग है जो हमें परम सत्ता से जोड़ता है। यह योग हमारे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों शक्तियों को संतुलित और सशक्त बनाता है।
अंतत:, जब हम आत्मबोध और मन की एकाग्रता को विकसित करते हैं तो हमारा सम्पूर्ण तंत्र स्वत: सुचारू रूप से कार्य करने लगता है। इसी अवस्था को आगे बढ़ाकर हम पूर्ण राजयोग ध्यान की ओर अग्रसर होते हैं – जहाँ जीवन में स्थिरता, शांति और सफलता का अनुभव होता है।



