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दिल्ली-किंग्सवे कैंप: कला और आध्यात्म का अनूठा संगम: विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में राजयोगी जगदीश भाई जी को दी गई भावपूर्ण श्रद्धांजलि

कला और आध्यात्म का अनूठा संगम: विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में राजयोगी जगदीश भाई जी को दी गई भावपूर्ण श्रद्धांजलि

* कला के माध्यम से दी गई श्रद्धांजलि – बनाए गए जीवंत पोर्ट्रेट

* परमात्म याद में किए गए कर्म ही सच्चा कर्मयोग: बी.के. साधना दीदी* संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण पर जोर: प्रो. रमेश सी. गौर

दिल्लीकिंग्सवे कैंप:  ब्रह्माकुमारीज़ (शांति भवन) में रविवार, 10 मई को एक भव्य आध्यात्मिक एवं कलात्मक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। महान साहित्यकार राजयोगी बी.के. जगदीश भाई जी के 25वें पुण्य स्मृति दिवस और ओम शांति रिट्रीट सेंटर (ORC) के ‘रजत रश्मियां’ महाअभियान के उपलक्ष्य में ‘Karmyoga for Empowered Bharat’ प्रोजेक्ट के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में ‘संजय – कलाकृत कर्मयोग आर्ट कम्पटीशन’ के माध्यम से कला और आध्यात्म का अत्यंत सुंदर संगम देखने को मिला।
*राष्ट्रीय स्तर के कला मर्मज्ञों की गरिमामयी उपस्थिति*समारोह में ‘गेस्ट ऑफ ऑनर’ के रूप में प्रो. डॉ. रमेश सी. गौर, निदेशक, कलानिधि विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार),पंडित प्रो. डॉ. राजीव वर्मा, डीन, संगीत एवं ललित कला संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय विशेष रूप से उपस्थित रहे। साथ ही, विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ कलाकार श्रीमती कामिनी मिनोचा और कला निर्देशक सुश्री स्वाति जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। इन सभी गणमान्य अतिथियों और राजयोगिनी बी.के. साधना दीदी ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का मंगलमय शुभारंभ किया।
कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण ‘संजय- कलाकृत कर्मयोग आर्ट कम्पटीशन’ रहा। इस अनूठी कला प्रतियोगिता में अनेक प्रतिभागियों ने आदरणीय राजयोगी बी.के. जगदीश भाई जी के ‘कर्मयोगी जीवन’ को अपनी कल्पना का आधार बनाया। प्रतिभागियों ने भाई जी के अत्यंत जीवंत और मनमोहक पोर्ट्रेट (चित्र) बनाकर, अपनी कला के माध्यम से उन्हें भावपूर्ण श्रद्धा सुमन अर्पित किए। समारोह के दौरान अतिथियों द्वारा इन उत्कृष्ट कलाकृतियों की हृदय से प्रशंसा की गई तथा पोर्ट्रेट बनाने वाले होनहार प्रतिभागियों को मंच पर पुरस्कृत किया गया।
प्रो. डॉ. रमेश सी. गौर जी,निदेशक, कलानिधि विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार)   ने अपने उद्बोधन में भारतीय संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमें अपनी युवा पीढ़ी और बच्चों में उच्च संस्कार सिंचित करने होंगे, क्योंकि इसी में हमारी असली शक्ति निहित है। ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान इसी महान भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने और बच्चों में संस्कार पिरोने की जो सेवा कर रहा है, वह अत्यंत सराहनीय है। उन्होंने इस कला प्रतियोगिता को आदरणीय जगदीश भाई जी के प्रति एक ‘सच्ची श्रद्धांजलि’ बताया। साथ ही, उन्होंने यह भी घोषणा की कि जगदीश भाई जी द्वारा रचित विपुल आध्यात्मिक साहित्य को वे अपनी लाइब्रेरियों में भी रखेंगे, ताकि बच्चे उन्हें पढ़कर उनके महान जीवन से प्रेरणा ले सकें।
साथ ही  पंडित प्रो. डॉ. राजीव वर्मा,  डीन, संगीत एवं कला संकाय,दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपनी सुमधुर आवाज़ में ‘शिव बाबा की सुंदर स्तुति’ गाकर आदरणीय जगदीश भाई जी को एक भावपूर्ण संगीतमय श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रो. वर्मा यहाँ के शांत और आध्यात्मिक वातावरण से अत्यंत प्रभावित हुए तथा उन्होंने विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को प्रेरक संदेश देते हुए कहा कि यदि बच्चे नियमित रूप से यहाँ आकर मेडिटेशन (राजयोग) सीखेंगे, तो उन्हें असीम मानसिक शांति और आंतरिक शक्ति की अनुभूति होगी।
सेवाकेंद्र संचालिका, राजयोगिनी बी.के. साधना दीदी जी ने आदरणीय जगदीश भाई जी के साथ के अपने गहरे अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें भाई साहब की रूहानी पालना लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। दीदी जी ने उनके ‘कर्मयोगी जीवन’ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भाई साहब अपना हर कर्म करते हुए परमात्मा की याद में पूरी तरह मग्न रहते थे। परमात्मा के प्रति उनका अटूट प्रेम इतना गहरा था कि उनकी आँखों से ईश्वरीय प्रेम के अश्रु छलक उठते थे। जो कोई भी उनके कमरे में प्रवेश करता था, उसे शांति और योग के शक्तिशाली प्रकंपनों (Vibrations) की प्रत्यक्ष अनुभूति होती थी। दीदी जी ने आगे कहा, “भाई साहब की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जटिल से जटिल परिस्थितियों और भारी कार्यभार के बीच भी ईश्वरीय स्मृति की शक्ति से हर कार्य को अत्यंत सहजता और निपुणता के साथ संपन्न करते थे। उनका यही कर्मयोग हम सभी के लिए सच्ची प्रेरणा है।”
इस अवसर पर उत्कृष्ट कलाकृतियों को देखकर विशिष्ट अतिथि श्रीमती कामिनी मिनोचा ने प्रतिभागियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा, “किसी भी प्रतियोगिता का मूल उद्देश्य केवल पुरस्कार जीतना नहीं होता, बल्कि उसके पीछे आपकी कल्पनाशीलता (Imagination), रचनात्मकता(Creativity), आपकी लगन (Sincerity) और उससे प्राप्त होने वाला अनुभव(Experience) सबसे अधिक मूल्यवान है।” उन्होंने सभी को अपनी कलात्मक क्षमता को निरंतर निखारने की प्रेरणा दी।
समारोह के अंत में सभी गणमान्य अतिथियों ने अपने उद्बोधन में जीवन में कला और रूहानियत के इस अनूठे समन्वय को अनुकरणीय बताया। अंततः गहन राजयोग मेडिटेशन के अभ्यास और ‘ब्रह्मा भोजन’ की सुखद अनुभूति के साथ इस भव्य कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ।

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