आप देखो भक्ति से लेकर अभी तक की जो सब मनुष्य की स्थिति है या मानव का परमात्मा के प्रति भाव है, उसकी अलग-अलग सीमाएं तय की गई। जैसे भक्ति में कहा जाता है कि भगवान भाव का भूखा होता है, न कि भोजन का भूखा है, फल-फूल या जल का भूखा है। वो केवल भाव का भूखा कहा जाता है। लेकिन इस बात को समझने वाले कितने हैं? बहुत थोड़े। लेकिन जो समझते हैं और उसको अपने जीवन में अपनाते हैं उनकी भी संख्या बहुत ज्य़ादा नहीं है। परमात्मा को समझने का आधार क्या हो सकता है? जैसे आप देखो इस दुनिया में जो स्थूल चीज़ें हैं – घर, गाड़ी, मकान, पैसा, इसमें हम सबके अपने संकल्प भी हैं, हमारा खुद का भाव भी है। और जो भी हमारे संकल्पों में होती है, सोच में होती है वो थोड़े दिन में हमारे पास अपने आप ही रेवेल होके आ जाती है, प्रत्यक्ष हो जाती है। लेकिन जब भी हम परमात्मा से जुड़ते हैं, दुनिया में भी कहते हैं कि कोई न कोई दु:ख, तकलीफ, दर्द जब होता है तब जुड़ते हैं। मनुष्य की एक स्थिति है, जब उसका सबकुछ ठीक चल रहा होता है तो कुछ भी नहीं सुनना चाहता, और जब सब कुछ खराब हो जाता है तो उस समय उसके पास ताकत नहीं होती कि वो कुछ भी सुन सके गहरी बात, ज्ञान की बात। तो सुनेगा कब, जब सब ठीक हो।
तो ज्य़ादातर जब दु:ख और तकलीफ की स्थिति होती है उस समय लोग परमात्मा के पास जाते तो हैं और मिलते भी हैं, जुड़ते हैं लेकिन प्राप्ति के लिए, प्रेम के लिए नहीं। तो जहाँ पर प्राप्ति है, प्राप्ति का भाव है, प्राप्ति करने की स्थिति है वहाँ प्रेम हो ही नहीं सकता। तो परमात्मा कहते हैं कि ये सारी चीज़ें तो आपको आपके संकल्पों से ही मिल जाएंगी। आप मेरे पास केवल प्रेमपूर्ण बात करने के लिए बैठो। मेरे से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बनाओ। दुनिया में व्यक्ति धनी तब माना जाता है जब दुनिया में उसके सारे सम्बन्ध बहुत अच्छे हों। कहते हैं जब कोई व्यक्ति बीमार है और उसके सारे सम्बन्धी उसको सपोर्ट करते हैं तो उसको बीमारी में भी सुख मिलता है। ऐसे ही परमात्मा कहते हैं कि तुम मेरे से प्रेमपूर्ण रूप से जुड़ते हो, केवल मेरे से महसूस करते हो, बिना कुछ मांगे, बिना कुछ इधर-उधर की बातें किए, बिना कुछ दु:ख सुनाए, हम कभी भी परमात्मा के साथ बैठकर बात कर सकते है
आप देखेंगे कि आज भी जब हम परमात्मा के साथ योग लगाने बैठते हैं तो बहुत सारी बातें दु:ख की, तकलीफ की, दर्द की स्थिति बयां करते हैं, हम सारा टाइम उन बातों में निकाल देते हैं, तो फिर भगवान से हमने क्या बातचीत की? तो परमात्मा ने राजयोग की स्थिति इसी को बताई कि जब आत्मा यहाँ के सारे देह के सम्बन्ध और देह के पदार्थों की बातें भूलकर मेरे से मैं जो हूँ, जैसा हूँ उस रूप से मिलती है। केवल एक भाव से, केवल एक एहसास से उसको कोई नाम नहीं देती है, केवल मिलती है, केवल प्रेेम करती है। उससे जो प्राप्ति होती है वो सुकून वाली होती है, शांति वाली होती है। और उससे जो अपनापन मिलता है उससे लगता है कि हम भी इस दुनिया में हैं तो ज़रूर, लेकिन एक केवल भूमिका निभाने के लिए। तो इस प्रेमपूर्ण सम्बन्ध की गहराई समझने के लिए सबसे पहले जो भी इसको जानना चाहता है, करना चाहता है, पूछना चाहता है, बताना चाहता है, वो इसको करे। इसको इस भाव से भी देखा जाता है कि जब इसको हम करना शुरू करेंगे तो एक दिन में कोई चीज़ हमको नहीं मिल जाएगी, एक दिन में कोई प्राप्ति नहीं हो जाएगी। लेकिन वो प्राप्ति जो इस समय होगी वो भाव वाली होगी, उस प्राप्ति में सुख बहुत होगा।
कहने का मतलब है – परमात्मा से प्रेम का अर्थ ये है कि हम सभी जिन गुणों और जिन शक्तियों से बने होते हैं ना, हम उसी की पूरी जीवन तलाश करते हैं। हम बने हैं ज्ञान से, पवित्रता से, शांति से, सुख से, प्रेम से, आनंद से और इन्हीं चीज़ों की तलाश हम स्थूल चीज़ों में कर रहे हैं और इन्हीं की प्राप्ति के लिए हम भगवान से भी जुड़ रहे हैं। तो ये तो न्याय नहीं हुआ ना! इसीलिए परमात्मा कहते हैं तुम मनुष्यों को अतीन्द्रिय सुख या फिर भगवान के साथ परम सुख प्राप्त करना है तो उसके लिए कोई प्राप्ति की बात नहीं करो, केवल जुड़ो, केवल अनुभव करो और आपको अपने संकल्पों से वैसे ही सबकुछ मिल जाना है। इस आधार से जो सम्बन्ध बनेगा उससे हमारी हेल्थ, वेल्थ और हैप्पीनेस नैचुरल होगी, और हमारे को कोई . भी कमी महसूस नहीं होगी। तो परमात्मा से इस सम्बन्ध को बढ़ाएं और अपने आपको जोड़ कर दिखाएं, इसी को राजयोग कहेंगे।
राजयोग परमात्मा से प्रेमपूर्ण सबन्ध का नाम है
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