जब शांत स्वरूप होकर सभी ओमशान्ति बोलते हैं तो चेहरे में शांति, प्रेम, खुशी और शक्ति यह चारों इक_ी दिखाई पड़ती हैं। चारों का आपस में बड़ा गहरा सम्बन्ध है।
दिल में बहुत बातें होते हर बात स्पष्ट हो और उसमें सार भी भरा हुआ हो क्योंकि कोई भी बात स्पष्ट होने से कभी डाउट नहीं उठता, मूंझते नहीं हैं। निश्चय मजबूत है तो अचल-अडोल स्थिति बनाना इज़ी है, यह भी मेरा भाग्य है। संशय डोलायमान करता है, हिलाने लग पड़ता है। फिर जब हिलते हैं तो चलायमान होते हैं जिससे रेत के लड्डू बन जाते हैं। बार-बार चलायमान, डोलायमान होने वाले सेकण्ड में रेत के लड्डू के समान हो जाएंगे।
अगर किसी को जीभ रस बहुत है, लेकिन हज़म करने की ताकत नहीं है, जब हज़म नहीं कर सकता है तो ताकत कहाँ से आवे? सिर्फ बाबा की मुरली बहुत अच्छी, बहुत अच्छी कहते रहने से क्या होगा? क्योंकि अन्दर में डोलायमानी और चलायमानी का कुछ गड़बड़ घोटाला है इसलिए हज़म ही नहीं होता है। तो कई भाई-बहनों की शक्ल को देखते लगता है कि इन्होंने शायद कुछ खाया-पिया नहीं है। लगता ही नहीं है कि यह कोई ब्रह्माभोजन खाया हुआ है या ब्रह्मा बाबा के मुख से कुछ ज्ञान सुना है। परचिंतन की जो खामी है वो कभी ब्राह्मण भी बनने नहीं देगी। देवता तो सतयुग में बनेंगे उसके लिए फरिश्ता बनना है। जो सच्चा पक्का ब्राह्मण होगा वही फरिश्ता बनेगा।
जो सच्चा होगा वो पक्का बन सकता है। थोड़ा भी झूठा है तो उसके आगे मुश्किलातें बहुत आएंगी, उनके लिए मुस्कुराना मुश्किल है और जो सच्चा और पक्का होगा उसके लिए सब कुछ सहज होगा, वही यह गीत गायेगा कि तुमने हमको अपना बनाके मुस्कुराना सीखा दिया। तेरी मुस्कुराहट से किसी की मुश्किलातें मिट जायें तो जो बाबा ने दिया है उसको यूज़ करो तो मुक्ति और जीवनमुक्ति का वर्सा मिलेगा। मुक्ति माना कोई भी बात से फ्री, कोई मुझे रोक नहीं सकता, बंधनमुक्त है। जीवनमुक्त माना न्यारा और प्यारा है। जीवन में है पर सबसे न्यारा है। बंधनमुक्त माना लगाव, झुकाव और दबाव से मुक्त। किसी भी प्रकार के कलियुगी कर्मबंधनों से मुक्त। वह किसी के आगे झुकता नहीं। उसे नशा रहता है मेरे बाबा जैसा कोई नहीं।
कभी भी किसी प्रकार से शक्ल छोटी न हो जाए। कभी गुस्से से लाल हो जाएगा, कभी थोड़ा अपमान हुआ तो पीली हो जाएगी। सोचेगा यह काम तो कुछ भी नहीं करते नाम इनका ही आता है, मेरा कभी नाम ही नहीं आता है, यह सोचा तो लगा माया का गोला। अरे! नाम से काम नहीं। तुम काम ऐसा करो जो नाम भगवान के मुख पर आये। पर जब तक यहाँ वहाँ नाम रूप की बीमारी है और जो नाम कमाने के लिए काम करता है वो भगवान के मुख की संतान नहीं है। भगवान के मुख की संतान वो है जिसके मुख पर उसका नाम है, उसका नाम फिर भगवान के मुख पर है।
निश्चय मजबूत है तो अचल-अडोल स्थिति बनाना इज़ी है
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