ग्वालियर: ब्रह्मा बाबा के 146 वें जन्म दिवस को “आध्यात्मिक सशक्तिकरण दिवस” के रूप में मनाया

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ग्वालियर,लश्कर,मध्य प्रदेश। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय प्रभु उपहार भवन माधौगंज में संस्थान के साकार संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के जन्मदिवस को ग्वालियर सहित पूरे विश्व मे संस्थान से जुड़े अनुयायियों ने आध्यात्मिक सशक्तिकरण दिवस के रूप में मनाया गया।

कार्यक्रम में मुख्य रूप से लश्कर सेवाकेंद्र ब्रह्माकुमारी आदर्श दीदी, बी.के. लक्ष्मी दीदी, बी.के. प्रहलाद, बी.के. सुरभि, बी.के. रोशनी उपस्थित रहीं।

कार्यक्रम में  ब्रह्माकुमारी आदर्श दीदी ने सभी को सम्बोधित करते हुए कहा कि साकार संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा से आज जन – जन परिचित हो चुका है। सन् 1937 से सन् 1969 तक की 33 वर्ष की अवधि में तपस्यारत रह वे “सम्पूर्ण ब्रह्मा” की उच्चतम स्थिति  को प्राप्त कर आज भी विश्व सेवा कर रहे हैं ।

पिताश्री का जन्म हैदराबाद सिंध में 15 दिसंबर 1876, को एक साधारण परिवार में हुआ था । उनका शारीरिक नाम दादा लेखराज था । दादा लेखराज अपनी बौद्धिक प्रतिभा, व्यापारिक कुशलता, अथक परिश्रम, श्रेष्ठ स्वभाव एवं जवाहरात की अचूक परख के बल पर सफल व प्रसिद्ध जवाहरी बने । उनका मुख्य व्यापारिक केंद्र कोलकाता में था ।

जवाहरात के व्यवसाय के कारण दादा लेखराज का संपर्क उस काल के राजपरिवारों से काफी घनिष्ट हो गया था । विपुल धन – संपदा और मान – प्रतिष्ठा पाकर भी उनके स्वभाव में नम्रता, मधुरता और परोपकार की भावना बनी रही । वह किसी भी परिस्थिति या प्रलोभन के वश अपनी भक्ति भावना और धार्मिक नियमों को नहीं छोड़ते थे । दादा लेखराज प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक थे । उनका स्वभाव बहुत ही सरल, मधुर  और उदारचित था । वे प्रतिदिन 18 – 20 घंटे कार्य करते थे इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनका जीवन कैसे संयम – नियम से युक्त तथा स्वस्थ रहा होगा । आलस्य और निराशा ने तो कभी उनका स्पर्श तक नहीं किया । दादा का व्यापारिक और पारिवारिक जीवन, लौकिक दृष्टि से सफल एवं संतुष्ट जीवन था परंतु दादा लगभग 60 वर्ष के थे तब उनका मन भक्ति की ओर अधिक झुक गया । वे प्रतिदिन अपने व्यापारिक जीवन से समय निकाल ईश्वरीय सेवा के लिए देते थे ।

कार्यक्रम में बी.के. लक्ष्मी ने दादा लेखराज से प्रजापिता ब्रह्मा बनने तक के सफर को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह उस समय की बात है जब संसार भर में लोग विकारों के वशीभूत थे और इसे ही स्वाभाविक जीवन माने हुए थे । तब परमपिता परमात्मा शिव ने धर्म ग्लानि के ऐसे समय पर दादा लेखराज  को निमित्त बनाकर विश्व में सदाचार, निर्विकारिता एवं पवित्रता की पुनर्स्थापना का कार्य शुरू किया। दादा लेखराज को कई प्रकार की आलोचना भी सहनी पड़ी लेकिन फिर भी वह सबके प्रति शुभ भाव और सद्भावना रखते थे। वह बस परमात्मा शिव के आदेश को पालन करते गए । इस प्रकार यह नया आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ हुआ और परमपिता परमात्मा शिव ने उन्हें अलौकिक नाम “प्रजापिता ब्रह्मा” रखा ।

कार्यक्रम में बी.के. प्रहलाद ने संस्थान का परिचय देते हुए कहा कि सन् 1937 में “प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय” की स्थापना हुई। लगभग 14 वर्षों तक ईश्वरीय ज्ञान तथा दिव्य गुणों की धारणा का और योग स्थित होने का निरंतर अभ्यास करने के बाद अर्थात तपस्या के बाद, सन् 1951 में जब यह ईश्वरीय विश्व विद्यालय आबू पर्वत (राजस्थान) पर स्थानांतरित हुआ तब से लेकर अब तक ब्रह्माकुमारीज संस्थान के भाई एवं बहनें विश्व सेवा में संलग्न हैं ।

सन् 1969 में पिताश्री ब्रह्मा बाबा अपनी सम्पूर्ण अवस्था को प्राप्त हुए । उनके अव्यक्त सहयोग से ईश्वरीय सेवाएं पहले की अपेक्षा तीव्र गति से बढ़ी जो विश्व भर में 140 देशों में फैल चुकी हैं । सूक्ष्म रूप में बाबा आज भी हर बच्चे को अपने साथ का अनुभव कराते हुए कदम कदम पर सहयोग, स्नेह और प्रेरणाएं प्रदान कर रहें हैं।

छत्रछाया बन कर बच्चों को निरंतर सुरक्षा कवच प्रदान करने वाले पिताश्री ब्रह्मा बाबा के 146वें जन्मदिन को “आध्यात्मिक सशक्तिकरण दिवस” के रूप में मनाया जा रहा है।

कार्यक्रम का कुशल संचालन बी.के. सुरभि ने किया तथा आभार बी.के. रोशनी के द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में बी.के. विजेंद्र, बी.के. संजय, सहित सैकड़ों भाई एवं बहनें उपस्थित थीं।

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