भारत की संस्कृति में पर्व केवल उत्सव मनाने के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे जीवन को नई दिशा देने वाले आध्यात्मिक पड़ाव भी हैं। नवरात्रि ऐसा ही एक पर्व है, जिसे हम हर वर्ष श्रद्धा, उमंग और उत्साह के साथ मनाते हैं। ‘नवरात्रि’ को यदि आध्यात्मिक भाव से देखें तो ‘नव’ अर्थात् नया और ‘रात्रि’ अर्थात् अंधकार- तो यह पर्व हमें अपने भीतर के अंधकार से बाहर निकलकर जीवन में नवीन प्रकाश का स्वागत करने का संदेश देता है। प्रश्न यह है कि क्या नवरात्रि केवल नौ दिनों की पूजा है, या हमारे जीवन की पुरानी चाल, पुराने संस्कार और पुराने विचारों में नवाचार लाने का अवसर भी है?
नवरात्रि - पुराने से नए की ओर यात्रा
हमारा जीवन अक्सर एक निश्चित दिनचर्या में चलता रहता है। वही सोच, वही प्रतिक्रियाएं, वही आदतें और वही व्यवहार। कई बार हम जानते हुए भी पुराने संस्कारों को दोहराते हैं।
नवरात्रि हमें ठहरकर स्वयं से पूछने का अवसर देती है- क्या मैं वही पुराना जीवन जी रहा हूँ, या अपने भीतर कुछ नया निर्माण कर रहा हूँ?
‘नव’ का वास्तविक अर्थ केवल नया वस्त्र, नया घर या नई वस्तु नहीं, बल्कि नई सोच, नया संकल्प, नई दृष्टि और नया संस्कार है। यदि नौ दिनों में हम अपने जीवन की एक-एक कमज़ोरी पर विजय का संकल्प लें, तो नवरात्रि वास्तव में आत्म-परिवर्तन का पर्व बन सकती है।
रात्रि अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर
आध्यात्मिक अर्थ में ”रात्रि” को अज्ञान, कमज़ोरी, भय, चिंता, मोह, क्रोध और नकारात्मकता के अंधकार का प्रतीक मान सकते हैं। जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप और परमात्म-संबंध को भूल जाती है, तब जीवन में अंधकार बढऩे लगता है।
नवरात्रि का संदेश है- अंधकार को कोसना नहीं, अपने भीतर प्रकाश जगाना है। राजयोग मेडिटेशन के माध्यम से जब हम स्वयं को एक शांत, पवित्र और शक्तिशाली आत्मा के रूप में अनुभव करते हैं तथा परमात्मा को याद करते हैं, तब भीतर की चेतना में नया प्रकाश जागृत होता है।
नौ देवियां – नौ शक्तियों का जागरण : नवरात्रि में नौ देवियों की पूजा की जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से इन देवियों को हमारे भीतर छिपी नौ शक्तियों और गुणों के जागरण का प्रतीक मान सकते हैं।
हम सकंल्प करें- पहले दिन पवित्रता, दूसरे दिन शांति, तीसरे दिन शक्ति, चौथे दिन प्रेम, पांचवें दिन धैर्य, छठे दिन साहस, सातवें दिन सत्यता, आठवें दिन करूणा और नौवें दिन आत्मविश्वास को जीवन में धारण करेंगे।
इस प्रकार देवी की पूजा केवल मंदिर में दीप जलाने तक सीमित न रहकर अपने भीतर की शक्ति को जगाने की साधना बन सकती है।
उपवास – केवल भोजन से नहीं, विकारों से
नवरात्रि में अनेक लोग उपवास रखते हैं। ‘उपवास’ का सुंदर आध्यात्मिक अर्थ है- उप अर्थात् समीप और वास अर्थात् रहना। अर्थात् परमात्मा के समीप रहना।
इस दृष्टि से उपवास केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि नकारात्मक विचारों, क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार और व्यर्थ चिंतन से दूरी बनाने का अभ्यास भी है।”
नौ दिनों का संकल्प हो– ”मैं अपने मन को व्यर्थ बातों का आहार नहीं दूँगा, मैं उसे ज्ञान, शांति और शुभ संकल्पों का भोजन दूँगा।”
रास – जीवन में उमंग और संतुलन
नवरात्रि में रास और गरबा का विशेष आकर्षण होता है। वृत्ताकार घूमता हुआ रास हमें जीवन की एक सुंदर शिक्षा दे सकता है- जीवन में गति हो,लेकिन केंद्र से संबंध न टूटे।
हमारा जीवन भी परिस्थितियों के चारों ओर घूमता रहता है, लेकिन यदि हमारी चेतना का केंद्र परमात्म-स्मृति और आत्मिक मूल्यों में स्थिर है, तो बाहरी परिस्थितियां हमें विचलित नहीं कर सकती।
इसलिए रास केवल नृत्य नहीं, बल्कि उमंग, संतुलन और सामूहिक ऊर्जा का उत्सव बन सकता है।
तप-स्वयं को बदलने का संकल्प
नवरात्रि में तपस्या की भावना भी जुड़ी है। आध्यात्मिक तप का अर्थ स्वयं को कष्ट देना नहीं, बल्कि अपने पुराने संस्कारों को परिवर्तन की अग्नि में तपाना है।
हम एक संकल्प चुन सकते हैं- क्रोध पर नियंत्रण, मीठी वाणी, समय का सदुपयोग, मोबाइल पर संयम, नियमित ध्यान, या किसी एक नकारात्मक आदत से मुक्ति।
एक नवरात्रि-एक नया संस्कार। यदि नौ दिनों में एक भी श्रेष्ठ संस्कार स्थायी हो जाए, तो हमारा जीवन सचमुच बदलने लगता है।
नवरात्रि के बाद क्या?
सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यही है- नौ दिन पूजा करने के बाद क्या हम फिर वही पुराने बन जाएं?
यदि नवरात्रि समाप्त होते ही हमारे संकल्प भी समाप्त हो गए, तो उत्सव केवल कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि नवरात्रि के नौ दीप हमारे भीतर नौ नए संस्कारों का प्रकाश जगा दें, तो यही पर्व हमारे जीवन की दिशा बदल सकता है।
नवरात्रि के बाद दीपावली आती है। पहले भीतर की शक्तियों को जगाएं और फिर उस जागृति का दीप अपने जीवन में जलाएं-यही दीपावली की सच्ची तैयारी है।
आइए, इस नवरात्रि केवल देवी की प्रतिमा के सामने सिर न झुकाएं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति के सामने भी जागें। पुराने विचारों को नया रूप दें, पुराने संस्कारों को श्रेष्ठ में बदले और जीवन में नए संकल्पों का प्रकाश भरें।
नवरात्रि केवल नौ रातों का उत्सव नहीं, बल्कि नौ अवसर हैं- अपने भीतर के अंधकार से निकलकर नवचेतना, नवऊर्जा और नवजीवन की ओर बढऩे का।
यही हो हमारा संकल्प-‘‘इस नवरात्रि कुछ नया केवल जीवन में नहीं, अपने भीतर लाएंगे; और इस नवता को वर्षभर अपने कर्मों में जीवित रखेंगे।’’

