ये कथन, चौपाई, या उद्धरण रामचरित मानस के उत्तरकांड से लिया गया है। जिसमें परमात्मा की महिमा, परमात्मा राम की महिमा को दर्शाया गया है। इस बात को समझने से पहले कुछ बातें जानना जरूरी है। जैसे कहते हैं कि अगर ध्यान बंटता है तो जीवन घटता है। तो हमारा ध्यान ना बंटे तो इसका मतलब जीवन बढ़ जाएगा, घटेगा नहीं और बढ़ेगा ही नहीं सिर्फ सुदृढ़ और सुचारू रूप से कार्यरत रहेगा। इन्हीं सारी बातों को लेकर हम आज थोड़ा-सा कुछ बातों को, कुछ बिन्दुओं को, सबके सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं।
आज मनुष्य का ध्यान कितना बंट रहा है और क्यों बंट रहा है? उसका कारण है इंद्रियों का संयम ना होना। इंद्रिय संयम में जो हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं, पांच कर्मेन्द्रियां हैं, एक मन है, और इन्हीं दसों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाले को राम कहा गया। और दसों इन्द्रियां हमें भटकाती हैं, हमारा ध्यान बंटता है तो जीवन घटता है। जब आप बड़े ध्यान से देखेंगे तो आपके जीवन में ऐसा नहीं है कि केवल आपकी आँखें देखती हैं, आपकी त्वचा भी देखती है, आपका कान भी देखता है, सुनना भी देखना है। कोई टच करे वो भी देखना है। कोई भी वाणी बोलता है, शब्द बोलता है तो वो देखने में आता है। ऐसे ही पूरे शरीर का एक-एक अंग हमारा देखने वाला होता है। तो हरेक अंग देख रहा है।
अब आप सोचो, कहते हैं कि जो हम देखते हैं, वही हम होते हैं। जो हम देखते हैं वो ही हम सोचते हैं, तो हमारी हरेक इंद्रिय आज हमारे कंट्रोल में नहीं है। इसीलिए सबसे पहले ये समझना आवश्यक है कि जो हमारी एक-एक इंद्रिय है, वो अगर किसी चीज़ को महसूस कर रही है तो माना वो देख रही है। तो हमारे अन्दर जो चित्र छप रहा है, वो हमेशा के लिए छप रहा है। इसीलिए सबसे पहले एक जागृति हमको लानी है कि हमारी जो पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं, वो पांचों ज्ञानेन्द्रियों के एक-एक जो कर्म हैं, उस कर्म के आधार को परखना और पकडऩा पड़ेगा।
जैसे दशहरा आता है तो कहते हैं, राम ने रावण पर विजय प्राप्त की। और रावण को हमेशा दशानन के रूप में दिखाते हैं, दस उसके सिर हैं और आनन माना इंद्रिय। इसीलिए परमात्मा का जो परिचय आता है, जो ऊपर टॉपिक है क्रआनन रहित सकल रस भोगीञ्ज का मतलब हमारी जो इंद्रियां नहीं हैं तो भी परमात्मा को कहते हैं सभी रसों का रसास्वादन कर सकता है। वैसे ही हम सभी इंद्रियां होते भी आज अतीन्द्रिय सुख का अनुभव नहीं कर पाते। तो कारण क्या है, अगर मुझे भी परमात्मा की तरह अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करना है तो इस दस+आनन को पूरी तरह से खत्म करके अपने मन पर सवार होना पड़ेगा, मन को दिशा देनी पड़ेगी। और इसी का यादगार है कि श्रीराम चन्द्र जी ने रावण पर विजय प्राप्त की माना दसों इंद्रियों को जीत लिया।
दसों इंद्रियों को जीतने का अर्थ क्या है- हमारी जितनी भी स्वार्थपरत दृष्टि थी, स्वार्थपरत दृष्टि खासकर इसको बड़े ध्यान से हमको समझना होगा। हम कहीं भी थोड़ा भी अगर परेशान हैं, तंग हैं, दु:खी हैं, डिस्टर्ब हैं इसका मतलब हमारी दृष्टि स्वार्थ की है, परमार्थ की नहीं। क्योंकि जब हमारा किसी से स्वार्थ है- मिलते हुए, सुनते हुए, बोलते हुए, खाते हुए, तभी हमारी कुछ उम्मीदें हैं और वो उम्मीद ना पूरी होना हमारा मन और मूड खराब होना है। इसलिए सबसे पहले नि:स्वार्थ भाव से हमें अपनी इंद्रियों को समेटना होगा। और जब हम अपनी इंद्रियों को समेटकर किसी से मिलते हैं तब जाकर हमारे को परमात्मा की तरह सारे रसों का सुख लेना आसान हो जाता है।
इसीलिए समाज में ये बहुत बड़ी भ्रान्ति है कि परमात्मा निराकार ज्योति बिन्दु स्वरूप तो है ही लेकिन उसके बावजूद भी वो सबकुछ कैसे जानता है! वो इसलिए जान पाता है क्योंकि वो इंद्रिय सुख से परे है। अगर आप भी अपनी इंद्रियों के सुख से परे होना चाहते हैं, या होते हैं तो आपको भी सारी चीज़ें बड़ी ही स्पष्ट नज़र आएंगी।
तो क्यों न हम सभी एक बात अपने ज़हन में डाल लें आज से कि ये दसों इंद्रियां हमारे भटकाव को अपनी तरफ आकर्षित कर रही हैं और इनपर विजय प्राप्त करना ही सच्चे दशहरे की ओर हमको ले जाना है। लेकिन वो केवल एक राम ने नहीं किया, हम सारी आत्मा राम की ये कहानी है। और हर आत्मा राम इन दसों इंद्रियों के वश है। क्यों वश हो गया? क्योंकि भूल गया, जागृति खत्म हो गई। इसी का यादगार है कि राम ने रातभर शक्तियों का जागरण किया फिर सुबह जाकर रावण के साथ युद्ध किया।
तो इसका मतलब क्या है कि हमको भी अपनी शक्तियों को जगाना पड़ेगा तब हम इन दसों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर पाएंगे। और ये विजय हमेशा के लिए सुनिश्चित हो जाएगी।


