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बाबा में था अलौकिक आकर्षण -राजयोगिनी बी के दादी चंद्रमणि जी

बाबा अपनी सूक्ष्म शक्तियों को संजोते थे, संवारते थे। अपने मन, बुद्धि और स्मृति को चेक करते और नोट करते थे कि कहाँ-कहाँ मेरी ये शक्तियां जा रही हैं… बारीकी से नोट कर उसपर तपस्या करते और शिव बाबा की शिक्षाओं के अनुरूप उन शक्तियों को ढ़ालते थे।

ब्रह्मा बाबा का लौकिक नाम दादा लेखराज था। वे हीरे-जवाहरात का धंधा करने वाले, पक्के पुजारी और अति भक्ति करने वाले थे। उन्होंने अनेक गुरू भी किये थे। उन्हें विचार आया कि मैं तपस्या करूँ। व्यापार के झूठे धंधे में क्यों फँसू! उनको बेहद का वैराग्य अन्दर में पैदा हुआ। पहले-पहले उन्होंने अपने मन को समझाया। मन को एक बच्चे के रूप में देखा। उन्होंने सोचा, यह मन तो यहाँ-वहाँ घूम रहा है… कभी पोज़ीशन में, कभी सम्बन्धों में, कभी दुनिया के कई प्रकार के वैभवों में। उन्होंने शुरू से ही अपने मन को समझाने की कोशिश की। हे मन! तू कहाँ जा रहा है? मन से रूह-रिहान की। हे मेरे मन! तू कहाँ भटक रहा है? देह में जा रहे हो? यह देह तुमको सुख नहीं दे रही, दु:ख दे रही है। देह का धर्म दु:ख देने वाला है। शुरू-शुरू में बाबा ने एकान्त में मन से ऐसे कई प्रकार की बातें करनी शुरू की। बनारस में एक बहुत बड़ा पेड़ था, उसके नीचे बैठ उन्होंने एकांत में तपस्या की। जब समय आता है बदलने का, तो संकल्प भी बदलने के ही चलते हैं। बाबा ने अपने लिए बुद्धि और स्मृति की शक्ति से धरनी बनायी। बुद्धि और स्मृति कहाँ-कहाँ जाती है, नोट किया। शिव बाबा ने उनको साक्षात्कार की लिफ्ट दी जिससे उनको दिखाया कि तू मेरा एक ही सकीलधा बच्चा है और तेरे को ही यह आसुरी वृत्ति वाली दुनिया बदलनी होगी। मैं तेरे साथ हूँ। इसलिए शुरुआत में ही बाबा को साक्षात्कार हुए कि कौन-सा समय चल रहा है और क्या करना है, क्या नहीं करना है। इस पुरानी दुनिया का विनाश कैसे होना है, वो दृश्य बाबा ने साक्षात्कार द्वारा देखा। स्थापना नये स्वर्णिम विश्व की कैसे होनी है, उसका भी बाबा ने साक्षात्कार किया।

तपस्या का आधार आत्मानुभूति है
शिव बाबा ने पहले-पहले तपस्या का फाउण्डेशन डाला। ब्रह्मा बाबा ने आत्मिक वृत्ति व आत्मिक दृष्टि का विशेष अनुभव किया। मैं शरीर नहीं हूँ, मैं एक ज्योतिर्बिन्दु हूँ। लाइट हूँ, माइट हूँ। वो लाइट और माइट ऊपर जा रही है। धीरे-धीरे जब उनको आत्मा की अनुभूति हुई तो उन्होंने सभी सम्बन्धियों व मित्रों को भी उसी रूप से देखना व बात करना आरंभ कर दिया।

सूक्ष्मवतन का साक्षात्कार
कई बार मैंने बाबा को ज़मीन से आसमान तक के स्वरूप में देखा और अपने को भी एक लाइट के आकार में देखा। ऐसे महसूस करती हूँ कि मुझे सूक्ष्मवतन का साक्षात्कार हुआ। बाबा के प्रति मेरा इतना अपनापन का सम्बन्ध जुट गया कि बाबा ही मेरी माँ है, पिता है और सबकुछ है। उस समय हमें शिव बाबा की प्रवेशता का ज्ञान नहीं था पर ब्रह्मा बाबा के प्रति एक अलौकिक आकर्षण था। उनकी अव्यक्त स्थिति और रुहानियत ने हमको खींचा। लौकिक परिवार के साथ हमने बाबा को कभी भी देह के सम्बन्ध में नहीं देखा। चाहे बाबा की युगल थीं, चाहे बाबा की बहू थी, चाहे बाबा के बच्चे थे, उनसे भी बाबा ऐसे ही बात करता था जैसे कल्याणार्थ हमसे करता था इसलिए बाबा का घर ऐसा लगा ही नहीं कि यह कोई गृहस्थी का घर है। वो हमें शुरू से ईश्वरीय परिवार दिखाई दिया।

गहन शान्ति का अनुभव
बाबा जब ओम की ध्वनि करते थे तो हम डीप साइलेन्स में चले जाते थे। हमारे अंदर कोई छोटा-मोटा पुराना संस्कार था भी तो वह उस साइलेन्स के गहन अनुभव से बहुत जल्दी समाप्त हो गया। फिर निश्चय हो गया कि जो बाबा श्रीमत दे रहे हैं, उसी पर चलना है। जब मैं छोटी थी तो स्वतंत्र विचारों की थी, अपने विचारों का महत्व रखती थी कि जो कहूँ वही हो। पर यहाँ जब बाबा की श्रेष्ठ मत को प्यार से समझा तो मैंने मनमत को ईश्वरीय मत से बदल दिया। दृढ़ निश्चय किया कि चलेंगी तो ईश्वरीय मत पर ही चलेंगी, ईश्वरीय मत ही सबसे श्रेष्ठ है। कितने भी विघ्न आएं, मुझे ईश्वरीय गुणों और शक्तियों को धारण करना ही है।
”ओम” शब्द सर्वत्र – बाबा हमको सदा ओम शब्द से बुलाते थे जैसे ओम रामा, ओम मोती आदि और हम कहते थे, ओम बाबा, ओम राधे। ओम माना पहले आत्मा का परिचय आ जाता था। ओम माना मैं पवित्र आत्मा। बाबा हमेशा कहता था, आत्मा की स्मृति से एक-दो को बुलाओ और आत्मा की स्मृति से ही बातचीत करो। ”जशोदा निवास” बाबा की बिल्डिंग का नाम था। यह बाबा की युगल के नाम पर था। ओम शब्द लगाने से उसका नाम ओम मण्डली पड़ गया। दूसरी बिल्डिंग जो होस्टल थी, उसका नाम ”ओम निवास” इसलिए पड़ा क्योंकि बिजली का एक बहुत बड़ा ”ओम” बिल्डिंग के ऊपर लगाया गया था जो सारे शहर में दिखाई देता था। बड़े अर्थ से इन दोनों भवनों के नाम रखे गये थे। बाबा जो भी कार्य करते थे, जो भी बोल बोलते थे उनके हर बोल और कर्म में अर्थ समाया होता था।

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