समय के साथ हर चीज़ बदलती है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। पदार्थों में भी परिवर्तन होता रहता है। उसी तरह कोई भी चीज़ नई से पुरानी होती ही है। सिवाय क्रपरिवर्तनञ्ज के सब कुछ परिवर्तन होता है। बस ‘परिवर्तन’ शब्द ही अपरिवर्तनशील है। हम अपने ही बारे में बात करें तो हम पहले कितनी नम्रता और दिव्यता से भरपूर थे। जहाँ एक-दूसरे का आदर-सम्मान करते हुए स्नेहपूर्वक रहते थे। जिसे हम एक शब्द में कहें, तो स्वर्णिम भारत की ये एक झलक है। जहाँ आपसी आदर-सम्मान के साथ-साथ नम्रता, सभ्यता की भी प्रखरता थी। शुरू से हमारी ये संस्कृति रही है, छोटे-बड़ों को झुककर प्रणाम कर आदर-सम्मान व्यक्त करते थे। करते तो आज भी हैं, पर सिर्फ केवल शिष्टाचार के रूप में। झुककर प्रणाम करना और आदर करना, ये हृदय से होता है। लेकिन आज शिष्टाचार सिर्फ एक बाह्यता का रूप बनकर रह गया है। इसीलिए आज के समय में आये दिन छोटे-बड़े परिवार व समाज तथा देश-विदेश में आपस में झगड़ों की दीवारें खड़ी हो गई हैं। कलह-कलेश तो हरेक में ऐसे घर कर गया है जैसे कि एक डायबिटिक पेशेंट में शुगर। ये एक ऐसा कैंसर है जिसके लिए आज न तो कोई हॉस्पिटल है और न ही कोई स्कूल, जहाँ इसका निदान हो सके। परिणामस्वरूप कितने ही सारे परिवार टूटते जा रहे हैं, समाज विघटित होता जा रहा है। इसके तह में जायें तो हम पायेंगे कि सिर्फ सहृदय से प्रणाम करना हम कहीं भूल चुके हैं। इसी का एक संदर्भ महाभारत में आता है, जो यहाँ लिखना उचित होगा। महाभारत का युद्ध चल रहा था। एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर ‘भीष्म पितामह’ घोषणा कर देते हैं कि -‘मैं कल पांडवों का वध कर दूंगा।’ उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई। भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था, इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंकाओं से परेशान हो गये। तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा – ‘अभी मेरे साथ चलो।’ श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुंच गये। द्रौपदी ने अंदर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने – ‘अखण्ड सौभाग्यवती भव:’ का आशीर्वाद दे दिया। फिर उन्होंने द्रौपदी से पूछा कि ‘वत्स- तुम इतनी रात में यहाँ अकेली कैसे आई हो! क्या तुम्हें श्रीकृष्ण यहाँ लेकर आये हैं?’ तब द्रौपदी ने कहा -‘हाँ, और वे कब से बाहर खड़े हैं।’ तब भीष्म भी कक्ष से बाहर आ गये और दोनों ने एक-दूसरे को प्रणाम किया।
भीष्म ने कहा- ‘मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं।’
शिविर से वापस लौटते समय श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि ‘तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीयदान मिल गया है। अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन, दुशासन आदि की पत्नियाँ भी पाण्डवों को प्रणाम करती होतीं तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती।’
वर्तमान समय हमारे घरों में जो इतनी समस्यायें हैं, झगड़े हैं, उनका भी मूल कारण यही है कि जाने-अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है। यदि घर के बच्चे और बहुयें प्रतिदिन घर के बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो शायद किसी भी घर में कभी कोई कलेश न हो। बड़ों के दिये आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं। उन्हें कोई ‘अस्त्र-शस्त्र’ नहीं भेद सकता। अत: यदि हम हमारी पूर्ववत संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाये। क्योंकि आदर-सम्मान व प्रणाम प्रेम है, अनुशासन है, शीतलता है, आदर सिखाता है, सुविचार आते हैं, झुकना सिखाते हैं, क्रोध मिटाते हैं, आंसू धो देते हैं, अहंकार मिटाते हैं। ये हमारी संस्कृति है।
तो अब आपके मन में क्या ख्याल चल रहे हैं? ये पढऩे के बाद क्या आप हिम्मत कर पा रहे हैं कि हम अपनी संस्कृति को पुन: जागृत कर विचार और कर्म के धरातल पर उतारेंगे? अगर हाँ, तो बस आरंभ कर दीजिये। तब आप बहुत सारी चीज़ों से बच जायेंगे। आपकी शक्ति, एनर्जी बच जायेगी और नई ऊर्जा के साथ आप अपनों से घुल-मिल जायेंगे और खुशी का औरा आपके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जायेगा।

ब्र.कु. निहा, मुम्बई.


