शुभ-विचार से सद्-आचार की प्रेरणा मिलती है। जितना जिसके पास शुभ-विचारों का खज़ाना होगा, उतना ही वे सद्-आचरण के लिए प्रेरित रहेगा। विचार ही मनुष्य की पहचान होती है। अब वो कैसा विचार है, ये बात रही। अब वो किस क्वालिटी का विचार लिए घूमता-फिरता है, उसी अनुरूप उसका व्यक्तित्व पनपता है।
अब हम बात ये करते हैं कि विचारों को शुभ व सुदृढ़ कैसे बनायें जिससे हम हमारी जीवन-यात्रा को सुखद बना सकें। हर विचार में एक शक्ति होती है। पर उसका रंग कैसा हो, ये हमारे पर निर्भर है। तो हमें कौन-से विचार को प्रखर बनाना है और किस विचार को नहीं लेना है, ये हमारी च्वाइस होती है। किसी भी विचार में निखार लाना है तो उस विचार को बारंबार दोहराते हुए उस पर चिंतन करना होगा। शुभ-चिंतन ही बीज है शुभ-चिंतक बनने का। एक तरफ हम दूसरे की भलाई का, शुभ सोचने का प्रयास करते हैं, हमारे से किसी को दु:ख न पहुंचे, पर समय आने पर न चाहते भी वो हो जाता है। ऐसे में अगर हम इस वस्तु, स्थिति को बदलना चाहते हैं तो शुभ-चिंतन के हथियार की धार तेज़ करनी होगी। अर्थात् शुभ-चिंतन की आदत बनानी ही होगी।
शुभ-चिंतन के लिए हमें कहीं न कहीं अपने आप को नियम में बांधना होगा। क्योंकि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सिस्टम, डायरेक्शन औरटाइम(समयबद्धता), ये तीन चीज़ें होनी ज़रूरी होती हैं।
जो लोग अपने लिए नियम नहीं बनाते, उन्हें फिर दूसरों के बनाये हुए नियमों पर चलना पड़ता है। मंजि़ल तक पहुंचने के लिए रास्ता मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु एक अनुशासन, समर्पण, प्रतिबद्धता और एक बहुत बड़े जुनून की भी आवश्यकता होती है।
जीवन के छोटे-छोटे नियम आपको बड़ी-बड़ी परेशानियों से बचा लेते हैं। कई बार छोटे-छोटे नियमों का पालन न करना ही बड़ी परेशानियों का कारण बन जाया करता है। अत: कोई दूसरा आकर आप पर राज करे, इससे तो अच्छा है आप स्वयं ही अपने पर राज करें। अपने जीवन के लिए कुछ नियम ज़रूर बनायें और उनका पालन भी करें। नियम से ही सफलता के शिखर का मार्ग प्रशस्त होता है।
तो शुभ-चिंतन के हथियार के माध्यम से ही शिखर की यात्रा तय की जा सकती है। इसके लिए आप रोज़ आध्यात्मिक-पाठन, सत्संग व मेडिटेशन को अपने जीवन का हिस्सा बनायें।
शुभ-चिंतन का सीधा-सा कनेक्शन है शिव से। शिव यानी कल्याणकारी। जीव और शिव के मध्य शुभ-रूपी सेतु जितना सुदृढ़ होगा, उतना ही हरेक के लिए मंगलमय हम बन सकेंगे और मंगलमय कामना कर सकेंगे।
आज संसार के वायुमण्डल में ये आवाज़ आती है कि कोई हमारी मदद करे, कोई हमारी राह को आसान करे, सब ऐसी आश लिये हुए दिखाई पड़ते हैं। ऐसे में हमें दूसरों की सहायता करनी है तो सबसे पहले शुभ-चिंतन के सांचे में ढलना होगा और उसे मज़बूत बनाना होगा। और शुभ-चिंतन की ढाल से ही दूसरे का शुभ-चिंतक बन सकेंगे। तो हमें शुभ-चिंतन के हथियार को इतना व्यवस्थित रूप से तेज-तर्रार बनाना है, जिससे समय आने पर उसका हम पूर्ण रूप से उपयोग कर सकें। कहते हैं, शुभ-चिंतन करने वाला ही शुभ-चिंतक बन सकेगा। तो बीज है शुभ-चिंतन। ऐसे करना चाहेंगे ना! दु:खियों के दर्द मिटाने के लिए खुद को तैयार करेंगे ना! क्यों नहीं, वे भी तो हमारे ही भाई-बहनें हैं ना! उनका हम सहारा नहीं बनेंगे, तो और कौन बनेगा!

ब्र.कु. प्रीति,बाजीपुरा.


