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मीठी वाणी बोल रे मनवा ? – ब्र.कु. दिलीप राजकुले, ओमशांति मीडिया, माउंट आबू

एक कहावत है कि तलवार के घाव तो जल्दी भर जाते हैं पर ज़ुबान के घाव भरने में ज़्यादा देर लगती है। परंतु हम देखते हैं कि हरेक देश की दंड संहिता में तलवार से आघात पहुँचाने वाले व्यक्ति के लिए तो दंड निर्धारित है किंतु ज़ुबान से घाव करने वाले व्यक्ति के बारे में वैसा कोई कड़ा दंड नहीं है। लोहे की तलवार से तन को आहत करने वाले व्यक्ति को तो कत्ल का अपराधी माना जाता है, परंतु ज़ुबान की तलवार से मन को आहत करने वाले व्यक्ति का कर्म वैसा बड़ा दंडनीय अपराध नहीं माना जाता।

यूं सभाओं में और समाज में भाषण या वार्तालाप में शिष्टता का व्यवहार करने के लिए भी मर्यादाएँ प्रचलित हैं और सरकार के विरुद्ध भड़काने एवं उकसाने के बारे में विधि-विधान हैं, परंतु व्यक्तिगत व्यवहार में तथा घरेलू एवं पारिवारिक वार्तालाप में यदि कोई किसी को अपने शब्द रूपी बाण से ज़ख्मी करता है तो उसके अपराध के लिए कोई कड़ा दंड-विधान नहीं है। खैर इसके अपराध घोषित न होने का कारण चाहे कुछ भी रहा हो, इस बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता कि ज़ुबान से किसी के मन को आहत और पीड़ित करना भी एक बहुत बुरा कर्म है।

“ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।।”

वाणी सबसे बड़ा आदान-प्रदान का माध्यम है। आपकी बोल-चाल… यही एक है जिसका आदान-प्रदान निःशुल्क होता है। धन, पदार्थ, श्रम, शक्ति का आदान-प्रदान तो किसी खास काम से, किसी खास उद्देश्य या किसी खास अवसर पर ही होता है। लेकिन वाणी का आदान-प्रदान तो हर क्षण होता ही रहता है—चाहे मनोरंजन के लिए हो, चाहे जिज्ञासा पूरी करने के लिए हो, चाहे चुप्पी तोड़ने के लिए हो, चाहे क्रोध व्यक्त करना हो, चाहे प्यार प्रदर्शित करना हो।

यही वाणी यह बताती है कि बोलने वाले का स्वभाव कैसा है? चरित्र कैसा है? व्यक्तित्व कैसा है? वाणी की अपनी शक्ति होती है। यह तो बोलने वाले पर निर्भर करता है कि वह कटु वचन बोलता है, या मधुर वचन बोलता है। जहाँ मधुर वचन पराए को भी अपना बना लेते हैं, वहीं कटु वचन चोट पहुँचाते हैं, आहत करते हैं। कोयल और कौवे की वाणी का अंतर सारा संसार जानता है। अपनी नम्रता, दूसरों का सम्मान, आत्मीयता का लेपन—इन तीनों का घोल ही वाणी को मधुर बनाता है। अतः सार्थक वाणी बोलिए, अहंकार छोड़कर बोलिए, सामने वाले को आनंदित करने के लिए बोलिए।

ध्यान से देखा जाए तो एक दृष्टि से ज़ुबान के घाव ज़्यादा खतरनाक होते हैं—केवल इसलिए नहीं कि कटु शब्द से पीड़ित होकर कई व्यक्ति अपनी हत्या तक कर डालते हैं या कई परिवारों का संगठन टूट जाता है या परस्पर दुश्मनी के बढ़ने से कलह-क्लेश को बढ़ावा मिलता है; बल्कि इसलिए भी कि यदि तलवार द्वारा कोई व्यक्ति ज़ख्मी हो जाता है तो उसका ज़ख्म उस तक ही सीमित रहता है, परंतु जब शब्द-प्रहार से कोई व्यक्ति आहत होता है तो वह उत्तेजना, अपमान या अशिष्टता का अनुभव करने के परिणामस्वरूप संपर्क में आने वाले दूसरे व्यक्तियों को भी दुःखी करता है।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी गृहिणी को कोई कटु वचन बोलता है तो वह उद्विग्न होकर बच्चों या पति से खिन्न होकर बोलती है और पति बस में कंडक्टर या यात्रियों से अथवा दफ़्तर में अपने सहयोगियों से लड़ पड़ता है अथवा बच्चों पर अपना गुस्सा निकालता है और बच्चों की अपने पड़ोस के बच्चों से झड़प हो जाती है… और इस प्रकार समाज में यत्र-सर्वत्र तनाव तथा पर-पीड़ा का कुचक्र अथवा भंवरसा चल पड़ता है। कटु अथवा अभद्रतापूर्ण वचनों से चेहरे की कांति सूख जाती है, मुख पर से मुस्कान मिट जाती है, मन से उत्साह नष्ट हो जाता है; इसलिए कटु शब्द एक कुचक्र का उत्पादक बन जाता है।

“कुदरत को नामंजूर है, सख्ती ज़ुबान में।

इसलिए तो नहीं दी, उसने हड्डी ज़ुबान में।।”

प्रियवादी को कहीं विपत्ति नहीं है, कोई कष्ट नहीं है। वह सबका प्रिय होता है; जबकि अप्रियवादी को जगह-जगह विपत्ति है।

एक बार दंत और जीभ में झगड़ा हो गया। दाँत बोले—”तू हम 32 के बीच अकेली रहकर भी इठलाती है। हम जिस दिन चाहेंगे उसी दिन तुझे चबा जाएँगे, लहुलुहान हो जाएगी।” जीभ बोली—”तुम बत्तीसों के लिए मैं अकेली ही काफ़ी हूँ।”

एक दिन सामने से एक पहलवान जा रहा था। जीभ ने अपना कमाल दिखाया—वह पहलवान को अप्रिय बोली और गाली दे दी। पहलवान को गुस्सा आ गया, उसने मुँह पर एक मुक्का जड़ दिया। बत्तीसों दाँत निकलकर बाहर आ गिरे! देखा आपने अप्रिय बोलने का कमाल? बुजुर्गों ने सलाह दी है कि हमेशा मीठा और प्रिय बोलो, आपको सफलता मिलेगी।

आपकी बात, बोली ही पहचान कर देती है कि आप क्या हैं? कोई व्यक्ति कितना गहरा, कितना उथला है, इसका ज्ञान उसकी भाषा से हो जाता है। उसके कर्मों से, उसके व्यवहार से, उसके बोल से गहराई की झलक मिलती है।

एक अंधा फ़कीर राजपथ के बीचों-बीच खड़ा था। राजा की सवारी निकलनी थी। सवारी से पहले कुछ पैदल सिपाही वहाँ से गुज़रे। बोले—”अंधे हो क्या? दिखता नहीं, महामहिम की सवारी आ रही है, हटो यहाँ से।” सिपाहियों ने फ़कीर को धमका दिया। सिपाही चले गए, लेकिन फ़कीर फिर वहीं खड़ा रहा और बोला—”अच्छा!”

थोड़ी देर बाद कुछ घुड़सवार सैनिक निकले, बोले—”हटो, हटो, राजा की सवारी आ रही है, एक तरफ़ हो जाओ।” घुड़सवार चले गए। फ़कीर बोला—”अच्छा!” फ़कीर फिर उसी जगह खड़ा हो गया।

कुछ देर बाद वज़ीर साहब निकले, उन्होंने फ़कीर को देखा और चुपचाप चले गए। फ़कीर बोला—”अच्छा!”

कुछ देर बाद राजा की सवारी निकली। राजा ने फ़कीर को देखा, रथ के नीचे उतरे, फ़कीर के पैर छुए और प्रणाम किया। फ़कीर बोला—”लगता है राजा आ गया।” वह फिर बोला—”बहुत अच्छा!”

जब राजा की सवारी निकल गई, तब वहाँ खड़े लोगों ने फ़कीर से पूछा—”आप बार-बार अच्छा, अच्छा क्यों कह रहे थे?” फ़कीर बोला—”जो जितना गहरा है, उसका व्यवहार उतना ही उत्तम है। जो उथला है, उसका व्यवहार भी अहंकार से भरा है। क्या तुम्हें राजा और सिपाहियों के भाषा और व्यवहार में अंतर पता नहीं लगा?”

मुँह आपका, जीभ आपकी, सोच आपकी, बोलना आपको है… तो “क्यों न सुंदर, मीठा बोलें!” इसके लिए अभिमान छोड़ें, सुनने वाले को मान दें। जब ज़रूरत हो तभी बोलें, पहले सोचें फिर बोलें, अपशब्द तो एकांत में भी न बोलें। दर्पण के सामने सब तरह की बातें बोल कर देखें—कौन सी अपनी छवि आपको अच्छी लगती है? उसी को आदत में उतार लें।

ब्र.कु. दिलीप राजकुले, ओमशांति मीडिया, माउंट आबू

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