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ग्वालियर: पिताश्री ब्रह्माबाबा के पुण्य स्मृती दिवस पर ब्रह्माकुमारीज केंद्रों पर विश्व शांति के लिया हुआ ध्यान

ब्रह्मा बाबा नें माताओं बहनों को सदैव आगे रख नारी सशक्तिकरण की पेश की अनूठी मिशाल – आदर्श दीदी

ब्रह्मा बाबा कि वाणी में नम्रता, विनम्रता और महानता झलकती थी – बीके प्रहलाद

ग्वालियर, मध्य प्रदेश। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के साकार संस्थापक पिताश्री ब्रह्मा बाबा की 57 वीं पुण्य स्मृति दिवस पर देश विदेश के सभी केन्द्रो पर तथा ग्वालियर ओल्ड हाईकोर्ट लाईन स्थित संगम भवन केंद्र एवं प्रभु उपहार भवन माधौगंज केंद्र सहित ग्वालियऱ के सभी केंद्रों पर इस दिन को विश्व शांति दिवस के रूप में मानते हुए विश्व शांति हेतु ध्यान का कार्यक्रम आयोजित हुआ।
कार्यक्रम में सभी ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये, इस अवसर पर बडी संख्या में अनुयायियों ने भाग लिया।


कार्यक्रम में केंद्र प्रमुख राजयोगिनी बीके आदर्श दीदी नें अपने संबोधन में कहा कि ब्रह्मा बाबा का सम्पूर्ण जीवन मानवता के कल्याण के लिए समर्पित रहा और उनका जीवन आज भी साधकों के लिए प्रेरणास्रोत है। वह संस्था के साकार संस्थापक थे, लेकिन उन्होंने माताओं बहनों को सदैव आगे रख नारी सशक्तिकरण कि अनूठी मिशाल पेश की। और उन्हीं को ही संस्थान का कार्य भार सौंपा जो आज भी सकुशल रीति से पूरे विश्व में ब्रह्माकुमारीज संस्थान का संचालन बहनों के द्वारा किया जा रहा है।
ब्रह्माबाबा के जीवन-दर्शन को विशेष रूप से स्मरण करते हुए बताया कि उनके व्यक्तित्व की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि वे हमेशा दूसरों को अपने से आगे बढ़ाने की भावना रखते थे। वे हर आत्मा अर्थात हर व्यक्ति को सम्मान देते थे और व्यवहार में “पहले आप” का सिद्धांत अपनाते थे। विशेष रूप से माताओं और बहनों को सदैव आगे रखकर उन्होंने समानता और मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर बीके प्रहलाद भाई नें ब्रह्मा बाबा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका हर कर्म फरिश्ता स्थिति से प्रेरित होता था और उनके सोचने, बोलने और करने में पूर्ण समानता दिखाई देती थी। उनकी महानता इस बात में भी दिखाई देती थी कि उन्होंने कभी कर्म के फल की इच्छा नहीं रखी। वे निष्काम भाव से सेवा करते रहे और नाम-मान-शान से परे रहकर सभी की पालना करते थे।
उनका हर संकल्प विश्व-कल्याण के लिए समर्पित था। उनकी वाणी में नम्रता, विनम्रता और महानता झलकती थी।
दुनिया में रहते हुए भी वे किसी व्यक्ति या भौतिक वैभव से आसक्त नहीं रहे। वे सदा साक्षी भाव में स्थित रह हर कर्म को श्रेष्ठ बनाते थे। उनकी शिक्षाएं आज भी हम सभी का मार्ग प्रशस्त कर रही है। इस अवसर पर पूरे दिन सभी केंद्रों पर मौन साधना का दौर जारी रहा।

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