याद अच्छी तब रहेगी जब हर बात में बाबा को फॉलो करने की लगन होगी। भक्ति में तो सिर्फ फॉलोअर कहने मात्र होते हैं क्योंकि फॉलो कहाँ करते हैं। सिर्फ गुरू में भावना होती है, बस। अनेक गुरू करने के बजाए एक को गुरू मान करके उसी में भावना रखते हैं। लेकिन यहाँ हमारी एक बाबा में भावना भी है तो विश्वास भी है।
हम सबको पहले खुद में निश्चय हुआ, फिर बाप में, ड्रामा में, निश्चयबुद्धि बनें, इसी निश्चय से विजयी बने हैं। संगम पर हमारा हीरो-हीरोइन पार्ट है। सारे कल्प में हम ऊंचा पार्ट बजाने वाली आत्मा हैं, यह बुद्धि में न सिर्फ समझा है पर दिल से मान लिया है। तो उसका अन्दर से अनुभव होने लगता है, निश्चय ने अनुभव करा लिया है तो भावना बैठ गई है। निश्चय समझ से हुआ है इसलिए कोई संश्य उठता ही नहीं है।
चेक करो खुद में, बाप में या ड्रामा में या कोई भी बात में कभी क्वेश्चन मार्क तो नहीं उठता कि यह क्यों, यह क्या… व्हाय, व्हाट, व्हेन… इन सबमें डब्ल्यू लिखना बड़ा डिफीकल्ट है। एक बाबा दूसरा विक्ट्री(विजयी) जो इन दो बातों को समझ जाता है वो होली और योगी बन जाता है।
हम सब आत्माएं भाई-भाई हैं और ब्राह्मण भाई-बहन हैं तो दृष्टि एकदम आत्मा की तरफ जाती है। परमात्मा मेरा बाप है, हम सब उसके ही बच्चे हैं। जब हमारी दृष्टि भाई-भाई की बन जाती है, तो अशरीरी स्थिति भी सहज बन जाती है। अगर आत्मा की दृष्टि से नहीं देखेंगे तो रूह में रूहानियत की खुशबू नहीं आ सकेगी।
बाबा हमें कर्म से जो गुण सिखाता है वह गुण औरों को भी बाबा की तरफ खींचते हैं। बच्चा है, बूढ़ा है सिर्फ मुस्कुरा के कोई पानी का गिलास भी देवे तो कितना अच्छा लगेगा और बिना मुस्कुराये कोई खाना भी देवे तो इतना अच्छा नहीं लगेगा। तो सदा यह नशा रहे कि हम किसके साथ रहते हैं? मेरे को कौन पढ़ाता है? बाबा तो बहुत अच्छा है, हमें बाबा अच्छा लगता है पर बाबा को अच्छा कौन लगेगा? जो अच्छा पढ़ेगा।
सवेरे अमृतवेले बाप है, क्लास के समय टीचर है। सेवा के समय हमारा योग कैसा हो वह भी बाबा हमें बताता है। सुबह अमृतवेले उठना कैसे, बैठना कैसे… वो भी सिखाता है। उस घड़ी कुछ नहीं कहता है, पर अपनी आकर्षण से खींचता है। टीचर खींचता नहीं है, बाबा खींचता है।
पढ़ाई में कितना बार मीठे बच्चे, मीठे बच्चे कह कह करके अन्दर से सारा कडुवापन निकाल देता है। ब्राह्मण कुल की शोभा बढ़ाने वाले स्वदर्शन चक्रधारी बच्चे बनते हैं। पढ़ाने वाला जैसे पढ़ा रहा है, वैसे ध्यान दे करके पढऩा है। श्रीमत को अच्छी तरह से जानकर, मानकर उस पर चलना है। कभी मनमत नहीं चलानी है। इसमें अपना भाव-स्वभाव, संस्कार काम नहीं करे। तो बाबा देखकर खुश होगा कि यह बच्चा अच्छा पढ़ता है। अच्छा पढऩे वाले बच्चे को बाप अपनी गोद में बिठाता है।
किसी में रूसने की आदत है तो यह सबसे बुरी आदत है। जो आपस में अपने बहन-भाई से रूसते या किसी से भी रूसते हैं तो वो एक दिन बाबा से भी रूसने लग पड़ते हैं क्योंकि आदत पड़ गई। कई हैं जो खुद जब बच्चे थे तो लड़ते थे, जब बच्चे पैदा किये तो भी लड़ रहे हैं। बाबा हमारी वह सब आदतें चेंज करता है। स्वदर्शनचक्र घुमाओ तो पहले की सब आदतें बदल जायेंगी और तुम बदलेंगे तो चैरिटी बिगन्स एट होम, आपे ही घर वाले चेंज हो जाते हैं। कई बार घर वालों को चेंज करने में थोड़ा टाइम लगता है क्योंकि हिसाब-किताब होता है। कोई अच्छा मानेंगे, कोई बुरा मानेंगे पर बाहर वाले बदलाव देखकर जब अच्छा कहते हैं तब घर वाले पीछे जागते हैं, यह भी कइयों का मिसाल है।


