विभिन्न धर्मों का एक गुह्य रहस्य स्पष्ट कर देना चाहते हैं। जिसको न जानने के कारण कुछ धर्म अपने स्वमान में नहीं रहते और बहुत धर्मों को ये पता नहीं है कि उनके धर्म पिता का धर्म क्या था। कई कन्फ्यूज़न हैं। आज हम इन थोड़ी-थोड़ी बातों को ले रहे हैं। एक ये भारत वाले अपने को हिन्दु कहलाते हैं। कुछ लोग अपने को सनातनी कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय हैं हिन्दु धर्म के भी। कोई वैष्णव सम्प्रदाय से है, कोई शैव मत से, कोई आर्य समाज से, जैन धर्म भी है भारत में और भी तीन मुख्य धर्म हैं। बुद्ध धर्म, क्रिश्चियन धर्म, मुस्लिम धर्म, और उनकी शाखाएं भी बहुत हैं। और भी छोटे-छोटे धर्म हैं- यहूदी, पारसी, जैनिज़्म भी है।
मैं पूछा करता हूँ बहुतों से कि तुम्हारे धर्म पिता का धर्म कौन-सा था? सोचने लगते हैं लोग। उससे पहले तो हमारा धर्म था ही नहीं। क्रिश्चियन धर्म तो था ही नहीं। क्राइस्ट धर्म तो पहले होगा ना। महात्मा बुद्ध थे तो बुद्ध धर्म थोड़े ही था। तो उसका धर्म क्या था? तो पहले मैं स्पष्ट कर रहा हूँ कि ये जो सृष्टि का खेल है, ये केवल पाँच हज़ार वर्ष का खेल है। कई शास्त्रों में इसको लाखों वर्ष तक का दिखा दिया है, ऐसा नहीं है। ये 1250वर्ष का ही एक युग है और ये चतुर युग ही पाँच हज़ार वर्ष के हैं। ये रिपीट होता रहता है खेल। ये नहीं कि संसार की आयु पाँच हज़ार साल है। संसार तो अनादि-अविनाशी है। विश्व का ड्रामा अनादि-अविनाशी है, चलता आ रहा है। लेकिन चार युग इसमें पाँच हज़ार वर्ष में पूर्ण हो जाते हैं।
सतयुग से प्रारंभ होता है। तब होता है यहाँ आदि सनातन देवी-देवता धर्म। लोग उसे केवल सनातन धर्म कह देते हैं। हिन्दु धर्म तो इस धर्म में नाम पड़ा ही बाद में है। कई लोग इसको जानते हैं। कई लोग कहते हैं कि हम हिन्दु हैं। अब हिन्दु हैं लेकिन वास्तव में आप सभी आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हो। इसीलिए हिन्दु लोग मन्दिरों में देवी-देवताओं को बहुत सम्मान देते हैं, पूजा करते हैं। ये पूजा-पाठ और कुछ नहीं ये अपने पूर्वजों को सम्मान अर्पित करना ही तो है। तो हम सभी इस सतयुग में देवी-देवता थे। और ये देवी-देवता धर्म दो युग तक चला। सतयुग और त्रेतायुग। तो फिर क्या हुआ? आप जानते हैं इब्राहिम सबसे पहले आया उन्होंने इस्लाम धर्म की स्थापना की। जैसे हम चर्चा कर रहे थे कि इन धर्म पिताओं का धर्म कौन-सा था। हमारे यहाँ एक कल्प वृक्ष का चित्र है उसमें आप देख सकते हैं कि धर्मों की सभी शाखाएं इस हिन्दु धर्म से ही निकली हैं। जो सतयुग-त्रेता में आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। द्वापर से जो हिन्दु कहलाया। महात्मा बुद्ध हिन्दु ही तो थे। एक बौद्ध संघ ही स्थापित किया था शुरू में, धर्म नहीं था। बाद में चलके वो धर्म में परिवर्तित हुआ।
क्राइस्ट भी इसी धर्म के थे, और बाद में उनका धर्म क्रिश्चियन धर्म नाम पड़ा। और इब्राहिम भी इसी धर्म के थे। बाद में सबकुछ बदलता गया। सबके धर्म अलग-अलग हो गये। वास्तव में सभी का मूल ये देवी-देवता धर्म ही है। इसलिए सभी के अन्दर देवत्व है। कई लोग कहते हैं कि पुराने धर्म में बड़ी ही हिंसा है। बड़ी ही नफरत भाव रखते हैं एक-दूसरे के लिए। ये बहुत बड़ी गलती होती है। ये तो सत्य है कि हरेक धर्म वाला अपने धर्म का विस्तार करना चाहेगा। लेकिन मैं आपको एक गुह्य रहस्य और बता दूं कि जब सभी आत्माएं परमधाम में हैं तो सभी धर्मों की आत्माओं के रहने का स्थान वहाँ अलग-अलग है। क्योंकि सभी धर्मों की आत्माओं के मूल संस्कार ही अलग-अलग होते हैं। एक धर्म की आत्मा, दूसरे धर्म की आत्मा में जम्प नहीं लगा सकती। इसलिए यहाँ कोई जबरदस्ती परिवर्तन करते भी हैं धर्म का तो तलवारों के बल पर परिवर्तन हुआ। धन के बल पर परिवर्तन हुआ। तो वो कल्प के अन्त में पुन: अपने मूल धर्म में वापिस आ जाएंगे। आ भी रहे हैं आजकल बहुत सारे।
आप देखेंगे इन सभी धर्मों का काल केवल अढ़ाई हज़ार वर्ष है। तो भला सतयुग-त्रेता जो देवी-देवता धर्म था उसका काल अनंत लाख साल थोड़े ही होगा। उसका भी अढ़ाई हज़ार साल ही था पहले। ये सृष्टि के खेल में बहुत सुन्दर संतुलन है। एक को बहुत कुछ मिल रहा हो और दूसरे को कुछ भी न मिल रहा हो, ऐसा इसमें नहीं होता।
एक रहस्य सबको जान लेना चाहिए कि जब धर्म की स्थापना होती है तो उसके सभी लोगों की स्थिति सतोप्रधान थी फिर वो रजो में आते हैं, फिर तमो में आते हैं, चार स्थितियों से सभी धर्मों को गुज़रना पड़ता है। सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो और अब अन्त है। बिल्कुल स्पष्ट रूप से सबको जान लेना चाहिए। कल्प का अन्त है, युग बदलने वाला है। सभी धर्म के लोग अपनी लॉएस्ट स्थिति में पहुंच गये हैं। धर्म जो प्रेम सिखाते थे, धर्म जो सद्भाव सिखाते थे, जो अपनापन सिखाते थे, नि:स्वार्थ भावना सिखाते थे, आत्मिक भाव, रूहानी भाव सिखाते थे, वो भेदभाव सिखाने लगे हैं। लड़ाई-झगड़े धर्मों में आ गये हैं। हिंसा प्रबल हो गई है। हर धर्म अपने को बचाने के लिए हिंसक हो जाता है। पर सबको पता होना चाहिए कि किसी धर्म को कोई भी शक्ति नष्ट नहीं कर सकती। न धर्म का विस्तार जबरदस्ती किया जा सकता है, बहुतों ने किया है। क्या वो दूसरों के धर्मों को नष्ट कर पाये? क्या उनका इतना विस्तार हो गया कि वही-वही रह गये हों? जैसा कई लोग मानते हैं। क्रिश्चियन ने क्रिश्चियन मिशनरी शुरू की, पर क्या सभी को क्रिश्चियन बना सके? उनका राज था औरंगजेब के समय में, तलवार के बल पर बहुतों को मुस्लिम बना दिया गया। क्या वो सबको मुस्लिम बना पाये? ये सम्भव ही नहीं है। इसीलिए धर्मों का विस्तार करना तो हर धर्म का अपना एक लक्ष्य होता है, उसका कत्र्तव्य होता है और उसमें हिंसा को स्थान देना ये धर्म के सिद्धान्तों के विपरित हो जाता है। धर्म की प्युरिटी के विपरित हो जाता है। इसीलिए हमने कहा कि लॉएस्ट स्टेज, तमोप्रधान स्थिति आ गई हर धर्म की।
तो अब सबको समाप्त होकर रूहों को वापिस अपने धाम चलना है। कयामत का समय नज़दीक आता दिख रहा है। असार उसके सामने नज़र आ रहे हैं। अभी भगवान पुन: आकर सभी धर्मों को पवित्र बनने का संदेश दे रहे हैं और वो कह रहे हैं कि तुम सभी आत्माएं मेरी संतान हो। स्वीकार करें इस सत्य को। चाहे उसे वालिद मानते हैं, गॉड फादर मानते हैं, परमपिता मानते हैं। वो पिता है, वो ही हम सबके ऊपर है। वो सुप्रीम है। उससे कनेक्शन जोड़ कर ही मनुष्य आत्माएं पाप से मुक्त हो सकती हैं। अपवित्रता को नष्ट कर सकती हैं, पावन बन सकती हैं। क्योंकि पावन बनकर ही सबको घर जाना है। जाने का समय आ गया है। तो मैं विशेष करके आदि सनातन देवी-देवता धर्म वालों से बात करूंगा आप सभी संसार के मूल हैं। आप सभी संसार के पूर्वज हैं। आपको सभी की पालना करनी है और कर भी रहे हैं। इसीलिए आपके मन में सभी के लिए प्रेम, सद्भावना, अपनापन, नि:स्वार्थ भाव, शांति देने का भाव, सुख देने का भाव, सभी को सम्मान देने का भाव, प्रबल रूप से जागृत करना है। क्योंकि आपके वायब्रेशन्स का प्रवाह सभी धर्मों को पहुंचेगा। आप सभी के पूर्वज हैं और पुन: भगवान आकर आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहे हैं। क्योंकि धर्म लोप हो गया है। धर्म भी लोएस्ट स्थिति में पहुंच गया है। केवल देवी-देवताओं की पूजा हो रही है। देवत्व लोप हो गया है। तो आइए भगवान से मिलकर हम अपने देवत्व को जागृत करके आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना में सहयोगी बनें।




