आबुराज (माउंट आबू राजस्थान। ब्रह्माकुमारी संस्था के ज्यूरिस्ट विंग द्वारा “मूल्य-आधारित न्याय” विषय पर विशेष राष्ट्रीय न्यायविद सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में देश के कोने-कोने से आए माननीय न्यायाधीशों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानूनी क्षेत्र से जुड़े प्रबुद्ध जनों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की शुरुआत परमात्मा शिव बाबा की स्मृति के साथ हुई।
उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के न्यायधीश गुरूपाल सिंह अहलूवालिया ने मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आज के समय का सबसे गंभीर और चिंतनीय विषय है “मूल्य-आधारित न्याय”। उन्होंने कहा कि यदि सत्य से मूल्यों को हटा दिया जाए, तो वह असत्य बन जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भौतिक शरीर और सूक्ष्म शरीर दोनों अलग हैं, लेकिन मनुष्य इनके पार अपनी मूल चेतना है। जब मनुष्य द्वेष, घृणा और ईर्ष्या रूपी काले चश्मे को हटाएगा, तभी वह वास्तविक सत्य को देख पाएगा।
हाई कोर्ट के पूर्व जज एवं न्यायविद प्रभाग के उपाध्यक्ष राठी जी ने कहा कि आज के वैश्विक परिदृश्य में स्वयं के परिवर्तन से ही विश्व परिवर्तन संभव है। सभी अतिथियों का आत्मिक स्वागत किया।
उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायधीश बी.के.नायक ने कानूनी न्याय और वास्तविक न्याय के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि मूल्य-आधारित न्याय ही सच्चा न्याय है। उन्होंने कहा कि किसी केस को जीतने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना, झूठे साक्ष्य तैयार करना या सच्चाई को बदलना कानून और वकालत के पेशेवर मूल्यों को कमजोर करता है।
कार्यक्रम में ओडिशा सरकार के एडिशनल एडवोकेट जनरल पीतांबर आचार्य तथा कंज्यूमर कोर्ट के जज घनश्याम यादव भी उपस्थित थे।
मूल्यों के चार मुख्य स्तंभ: न्यायविद प्रभाग की राष्ट्रीय संयोजिका ब्र.कु.रश्मि ओझा ने स्पष्ट किया कि मूल्य-आधारित न्याय वह है जो इंसान के मन की आवाज़ से निकलता है। उन्होंने मानवीय मूल्यों को चार भागों में विभाजित किया:- व्यक्तिगत मूल्य नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य, सामाजिक मूल्य, व्यावहारिक मूल्य। एक सुंदर सूत्र देते हुए उन्होंने कहा कि जब आत्मा में प्रकाश होता है तो व्यक्ति में सुंदरता आती है, व्यक्ति से घर में सामंजस्य, घर से राष्ट्र में व्यवस्था और राष्ट्र की व्यवस्था से ही विश्व में शांति स्थापित होती है। बिना आध्यात्मिकता के ‘सत्य’ अधूरा।
न्यायिक सदस्य नई दिल्ली राजवीर सिंह वर्मा ने कहा कि मूल्यों के बिना कानून एक ऐसे निष्प्राण शरीर के समान है जो केवल ठंडा और कठोर होता है। जब न्याय में दैवीय गुणों और मानवीय मूल्यों का वास होगा, तभी समाज में सच्ची न्याय व्यवस्था, आत्म-अनुशासन और आपसी सम्मान की स्थापना हो पाएगी।
संस्था की संयुक्त मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी सुदेश दीदी ने कहा “लॉ ” शब्द का अर्थ समझाते हुए कहा- एल- लाइट, ए- अवेयरनेस/अवेकनिंग, डब्लू- विजडम, आज समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार और अन्याय का मुख्य कारण आध्यात्मिक ज्ञान की कमी है। उन्होंने धर्म और स्वधर्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब मनुष्य अपने स्वधर्म में स्थित रहता है, तब धर्म की रक्षा स्वतः होती है। सत्य को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि जीवन में अपनाना भी आवश्यक है।
ब्रह्माकुमारी संस्था के महासचिव ब्र.कु.करुणा भाई ने अपने संबोधन में कहा कि आज के समय में लोग अक्सर समय की कमी की बात करते हैं, जबकि परमात्मा ने सभी को समान समय और सीखने का अवसर दिया है। उन्होंने कहा कि हम सभी एक ही परमात्मा की संतान हैं और “वन लॉ- वन वर्ल्ड” की भावना को अपनाकर अच्छे कर्मों के मार्ग पर चलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ईश्वर ने संसार को नियमों के आधार पर बनाया है, इसलिए कानून को अपने हाथ में लेने के बजाय सही कर्म करना ही सच्चा मार्ग है।
न्यायविद प्रभाग की अध्यक्षा ब्र.कु. पुष्पा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सफलता और जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए आध्यात्मिकता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि कानून व्यक्ति को बाहरी रूप से नियंत्रित करता है, जबकि आध्यात्मिकता मनुष्य को भीतर से नियंत्रित और जागरूक बनाती है। आध्यात्मिकता से मनोबल, जागरूकता और आत्मिक शक्ति बढ़ती है, जिससे सही निर्णय लेने और जीवन में संतुलन बनाए रखने की क्षमता विकसित होती है। उन्होंने आगे कहा कि आध्यात्मिकता हमारे विचारों और जीवन-दर्शन को गहराई प्रदान करती है तथा हमें सशक्त बनाती है। परमात्मा को शक्ति का स्रोत बताते हुए उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता ही मनुष्य को भीतर से मजबूत और सकारात्मक बनाती है।
न्यायविद प्रभाग की राष्ट्रीय संयोजिका ब्र.कु.लता अग्रवाल ने बताया कि ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा सिखाया जाने वाला राजयोग मेडिटेशन एक “माइंड और स्पिरिचुअल थॉट प्रोसेस” है। इसके द्वारा हम परमात्मा के शांति, प्रेम और पवित्रता जैसे गुणों को स्वयं के अंदर समाहित करते हैं।
प्रधान सिविल न्यायधीश और न्यायिक मजिस्ट्रेट बी.के. रोहिणी ने ध्यान से हमारे अंदर धैर्य आता है, जिससे हम पूरी तरह तटस्थ होकर किसी भी केस में सही निर्णय ले पाते हैं। उन्होंने हर व्यक्ति को अपने मन को ‘शांति का मंदिर’ बनाने की प्रेरणा दी।
न्यायविद प्रभाग की मुख्यालय संयोजिका ब्र.कु. श्रद्धा नें कुशल मंच संचालन किया।
कानूनी दांव-पेंच और पेंडिंग केसों पर चिंता सम्मेलन में अन्य वक्ताओं ने कहा कि आज अदालतों में लगभग 5 करोड़ केस पेंडिंग होने का एक बड़ा कारण यह है कि अधिकारी और लोग अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा रहे हैं। केस जीतने के लिए असली तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना और झूठे सबूत बनाना वकीलों की व्यावसायिक साख को नुकसान पहुँचाता है। यदि देश के नागरिकों में ईमानदारी और सत्यता जैसे मानवीय मूल्य आ जाएं, तो देश में अवैध गतिविधियां अपने आप समाप्त हो जाएंगी।





