दुनिया की सर्व समस्या का एक समाधान और उसका आधार राजयोग और उसकी पद्धति है। उसके अन्दर जो कुछ भी है- चाहे वो शरीर से सबन्धित है, चाहे वो मानसिक है, चाहे आध्यात्मिक है, चाहे आर्थिक है, उन सारी स्थितियों को एक सूत्र में पिरोता है राजयोग। और ये राजयोग आज का नहीं है, प्राचीन है। जिसको ऋषि, मुनि, तपस्वी सबने सराहा है। इस आधार को आधार बनाकर हम सभी भी अपने आप को उन स्थितियों से पार ले जा सकते हैं, जो हमें हर पल, हर क्षण छेड़ती हैं, परेशान करती हैं। तो क्यों न हम इसको अपनाकर अपनी दिनचर्या में उन सारे कर्मों को एक सही दिशा दे पायें। दें, जो हमें सफलता दिलाए, जो हमें आगे बढ़ाए, हमारे से औरों को आगे बढ़ाए, हमसे सबको दुआएं मिले। ऐसी स्थिति में आकर ही हम सबको वो सब दे सकते हैं, जो हम चाहते हैं।
योगाभ्यास वास्तव में वह शक्ति है जो हमारी संभावनाओं को वास्तविकता में बदल देता है। मनुष्य के भीतर परमात्मा ने सभी शक्तियां समान रूप से प्रदान की हैं। ऐसा नहीं है कि किसी को अधिक और किसी को कम मिला है – हर मानव को यह दिव्य सामथ्र्य प्राप्त है।
लेकिन अंतर यहाँ आता है कि कौन उस शक्ति का सही लालन-पालन करना जानता है, कौन उसे विकसित करने का प्रयास करता है। परमात्मा ने हर जीवन के भीतर एक सहज प्रेरणा, एक ऊंचा उठने की इच्छा शक्ति रखी है। यही इच्छा हमें आगे बढऩे के लिए प्रेरित करती है।
योग उस वातावरण को तैयार करने का माध्यम है, जिसमें हमारी यह सुप्त शक्तियां जागृत होती हैं। जिनके पास ज्ञान और अनुभव का अभाव है, उन्हें यह संदेह हो सकता है कि क्या योग के माध्यम से इतना परिवर्तन संभव है?
लेकिन जो बीज से वृक्ष बनने की प्रक्रिया को समझता है, उसके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जब एक छोटा-सा बीज विशाल वटवृक्ष बन सकता है, तो मनुष्य भी अपने साधारण स्वरूप से उठकर क्रक्रनर से नारायणञ्जञ्ज की अवस्था को प्राप्त कर सकता है।
राजयोग इसी अनंत संभावनाओं का द्वार खोलता है। राजयोग का अर्थ है- अपने भीतर उस श्रेेष्ठ बीज को पहचानना, जो हमारे जीवन रूपी वृक्ष को महान बना सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि मेरे भीतर सृजन करने की, अपने जीवन को अपनी इच्छानुसार दिशा देने की पूर्ण योग्यता है।
इन अनंत संभावनाओं को पहचानने और उन्हें साकार करने के लिए हमें अपने भीतर छिपी हुई सुषुप्त शक्तियों को जागृत करना होगा। योगाभ्यास हमें यही सिखाता है अपने आप को जानना, अपनी शक्ति को पहचानना और उसे सही दिशा में प्रयोग करना।
योग द्वारा मन पर नियंत्रण – योग का सच्चा फल:-
योग सभी के व्यक्तित्व विकास और समाज के समग्र विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह मानव और प्रकृति के बीच सद्भावना स्थापित करने का माध्यम है और लोगों को स्वस्थ एवं संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। योग हमारे जीवन को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखता है – यदि हम इसे सही विधि और समझ के साथ अपनाएं।
हममें से हर व्यक्ति जीवन को पूर्ण रूप से, जी भरकर जीना चाहता है और योग उसी कला की जड़ी-बूटी है। योग का सम्पूर्ण लाभ लेने के लिए हमें इसे गहराई से समझना होगा। इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि योगी कौन होता है।
योगी वह व्यक्ति होता है जिसमें स्वयं के लिए दूसरों के लिए और प्रकृति के लिए सद्भावना होती है। योग हमारी इंद्रियों को नियंत्रित करता है और देह भान को परिवर्तित करता है, जिससे यह अनुभूति होने लगती है कि यह शरीर केवल एक साधन है – परमशक्ति का अनुभव करने का माध्यम है।
योग में इतनी शक्ति है कि वह पूरे विश्व को एकता के सूत्र में बांध सकता है। कई लोग योग को केवल एक व्यवस्था के रूप में देखते हैं लेकिन वास्तव में योग कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि एक अवस्था है। योग कोई संस्था नहीं, बल्कि आस्था है। जब तक हम इसे इस रूप में नहीं समझते, तब तक हम इसे टुकड़ों में ही देखते हैं और इसकी पूर्णता को पहचान नहीं पाते।
एक सच्चा योगी बनने के लिए हमें इस देह रूपी साधन से ऊपर उठकर अपने भीतर के सत्य को पहचानना होगा। परमशक्ति के साथ जुडक़र, आंतरिक शक्ति का अनुभव करते हुए हमें यह समझना होगा कि हमारी वास्तविक पहचान यह शरीर नहीं बल्कि एक शुद्ध, सच्ची आत्मा है। यह शरीर केवल एक माध्यम है, जिसके द्वारा हमें जीवन जीना है।
जब जीवन पर हमारा नियंत्रण स्थापित होता है तब हम वास्तविक अर्थों में योग को प्राप्त करते हैं और यही योग का सच्चा फल है।
योगा और राजयोगा का संतुलन स्वस्थ जीवन का आधार:-
आज के समय में लोग अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हैं जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन आदि। इन बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए लोग लगातार उपाय खोजते रहते हैं, लेकिन उपचार के बजाए ये बीमारियां धीरे-धीरे लाइलाज रूप लेती जा रही हैं। इसका एक प्रमुख कारण बढ़ता हुआ तनाव है, जिसे आज की युवा पीढ़ी सही तरीके से संभाल नहीं पा रही। परिणामस्वरूप वे शराब और ड्रग्स जैसे हानिकारक साधनों का सहारा लेने लगते हैं।
ऐसी स्थिति में एक ही सशक्त उपाय सामने आता है – योगाभ्यास। योग ही हमारी मानसिक स्थिति को संतुलित बनाए रखने में सक्षम है। यदि हम शरीर को मन और बुद्धि का मंदिर मानें, तो योग उस मंदिर को सुंदर, सशक्त और पवित्र बनाता है। योग तभी पूर्ण रूप से लाभकारी होता है जब उसे सही विधि और अनुशासन के साथ किया जाए। यह न केवल हमारी शारीरिक और मानसिक क्षमता को बढ़ाता है बल्कि हमारी आंतरिक विशेषताओं का विकास करता है और हमें तनावमुक्त जीवन जीने की दिशा में अग्रसर करता है।
योग को समझने के लिए क्रसाधनञ्ज और क्रसाध्यञ्ज के अंतर को जानना आवश्यक है। हमारा शरीर साधन है, जबकि मन और बुद्धि साध्य हैं। मन और बुद्धि के बीच जो द्वंद्व चलता है – मन कुछ और चाहता है और बुद्धि कुछ और निर्णय लेती है – यही असंतुलन हमारे जीवन में अनेक समस्याओं का कारण बनता है। इस असंतुलन के कारण शरीर में रासायनिक प्रक्रियाएं प्रभावित
होती हैं जिससे बीपी, डायबिटीज और अन्य विकृतियां उत्पन्न होती हैं।
वास्तव में, यह अंसतुलन मन और बुद्धि के बीच तालमेल के अभाव और परिस्थितियों के प्रभाव में लंबे समय तक जीने की आदत के कारण उत्पन्न होता है। हम अपनी वास्तविक पहचान से दूर हो जाते हैं और बाहरी वातावरण के प्रभाव में आकर अपने जीवन का संतुलन खो देते हैं।
इसलिए योग का महत्त्व अत्यंत बढ़ जाता है। यह हमें शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर सशक्त बनाता है। यदि हम स्वस्थ, संतुलित और सम्पूर्ण जीवन जीना चाहते हैं, तो योग को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना ही होगा। यही हमें वास्तविक स्वास्थ्य और आत्मिक संतुलन की ओर ले जाता है।
राजयोग भयमुक्त, संतुलित और समृद्धि जीवन कुंजी:-
योग के माध्यम से जब हम स्वयं को नया बनाते हैं, तभी हम विश्व को भी नया बना सकते हैं। आज का विश्व आर्थिक आधार पर विभाजित हो चुका है, जहाँ भौतिकता के कारण निरंतर संघर्ष चलता रहता है। लेकिन सबसे बड़ी विफलता यह है कि हम एक-दूसरे की भावनाओं को समझने में असमर्थ रहे हैं। और यह तब तक संभव भी नहीं है जब तक हम स्वयं को नहीं समझते।
स्वामी विवेकानंद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक राजयोग में कहा है कि प्रत्येक आत्मा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है और उसमें यह सामथ्र्य है कि वह प्रकृति को नियंत्रित कर अपनी आंतरिक और बाह्य शक्तियों को प्रकट कर सके। उन्होंने यह भी संदेश दिया कि अपने कर्म और साधना के माध्यम से इसे अनुभव करो, लेकिन अपनी विचाराधारा को दूसरों पर थोपने का प्रयास मत करो। स्वयं स्वतंत्र रहो और दूसरों को भी स्वतंत्र रहने दो – यही सच्चा धर्म और जीवन का कत्र्तव्य है।
योग किसी व्यापार या प्रदर्शन की वस्तु नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक अवस्था है। जब हम योग को केवल बड़ी-बड़ी और जटिल बातों के रूप में देखते हैं तो हमें यह कठिन लगने लगता है और हमारा विश्वास डगमगाने लगता है। लेकिन यदि हम इसे छोटे-छोटे सरल कदमों में समझें तो महसूस होता है कि यह तो हम भी कर सकते हैं, यह मार्ग हमारे लिए भी संभव है।
योग न तो कोई व्यवस्था है और न ही किसी की निजी सम्पत्ति है। यह एक अवस्था है, जो सम्पूर्ण मानव जाति की धरोहर है। यह केवल इस युग के लिए नहीं, बल्कि अनेक युगों के लिए मानव जीवन को श्रेष्ठ और सम्पूर्ण बनाने का साधन है। योग के माध्यम से हम शारीरिक और मानसिक स्तर पर सशक्त बनते हैं और जीवन के वास्तविक आनंद का अनुभव करते हैं।


