सदा हर आत्मा के प्रति स्नेह की, शुभ भावनाओं की और खुशी के सुनहरे पुष्पों की वर्षा करते रहो। चाहे दुश्मन हो लेकिन स्नेह की वर्षा दुश्मन को भी दोस्त बना देगी। चाहे कोई आपको मान दे व मान न दे लेकिन आप सदा स्वमान में रह औरों को भी स्नेह की दृष्टि, स्नेही वृत्ति से, आत्मिक मान सम्मान देते चलो। वह लोग आपको माने न माने लेकिन आप उसको मीठा भाई, मीठी बहन मानते चलो। भल वह नहीं माने, आप तो मान सकते हो न। वह पत्थर फेंके आप रत्न दो। यदि आप भी पत्थर फेंको तो आप में और उन लोगों में क्या अंतर रहा? अरे! आप तो स्वयं रत्नागर बाप के बच्चे हो। रत्नों की खान के मालिक हो ही, मल्टी,मल्टी मिलेनियर हो भिखारी नहीं। ऐसा आप नहीं सोच सकते कि वह दे, तब मैं दूँ, यह भिखारी के संस्कार हैं। दाता के बच्चे, अभी लेने का हाथ नहीं फैला सकते। मन व बुद्धि से भी यह संकल्प करना कि वह करे तो मैं करूँ, वह स्नेह दे तो मैं दूं, वह मान दे तो मैं मान दूं- यह भी हाथ फैलाना हो गया, यह भी एक तरह का रॉयल भिखारीपना है। इसमें निष्काम योगी बनो, तब ही गोल्डन दुनिया की खुशी की लहर विश्व तक पहुंचेगी और फैलेगी।
परमात्म ऊर्जा – चाहे कोई आपको मान दे व न दे लेकिन आप सदा स्वमान में रहें
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