Homeब्र.कु. अनुजआकर्षण क्यों हैं इनमें

आकर्षण क्यों हैं इनमें

बहुत सारे देवी-देवताओं की चर्चा होती है लेकिन आकर्षक, मनमोहक, अप्रतिम, अद्वितीय, अगर कोई प्रतीमा किसी को बहुत भाती है तो वो है श्रीकृष्ण की। कारण क्या है? क्योंकि शास्त्रगत वर्णन में भी देखा जाए तो श्रीकृष्ण को पूर्ण अवतार का नाम दिया जाता है। और श्रीराम जी को अंश अवतार कहते हैं। तो पूर्ण अवतार और अंश अवतार को बहुत सामान्य भाषा में समझने का प्रयास करते हैं। कहा जाता है कि जो पूर्ण होना चाहता है, सम्पूर्ण होना चाहता है वो अपने आप को परमात्मा की महिमा के साथ जोड़ता है। माना जैसा परमात्मा है वैसा अपने व्यक्तित्व को बनाता है।
परमात्मा अनंत है, अविचल है, बहुत ऊंचा है, श्रेष्ठ है, अति श्रेष्ठ है। अब वो ऊंचाई प्राप्त करने के लिए, वो शून्यता प्राप्त करने के लिए अपने को पूरी तरह से झोंक देना, अगर अपने व्यक्तित्व को परमात्मा के व्यक्तित्व के साथ जोड़ा तो श्रीकृष्ण ने जोड़ा। जो पूरी तरह से अपने व्यक्तित्व को खो दिया। खोने का अर्थ है कि अगर मैं किसी भी धार्मिक पिता या धर्म पिता चाहे वो बुद्ध हों या महावीर जैन हों, चाहे गुरुनानक देव जी हों या अन्य अनेक जो धर्म गुरु हैं उनको अगर एक सांचे में ढाला जाए तो हमेशा उनका एक व्यक्तित्व है, उनका एक चेहरा है कि गुरुनानक जी ऐसे ही होने चाहिए। बुद्ध जी ऐसे ही बैठे हुए होने चाहिए, इसामसीह जी ऐसे ही अंगुली ऊपर करके खड़े होने चाहिए सबकी एक प्रतिमा, आकृति एक मन मस्तिष्क के ऊपर छपी हुई है। लेकिन कृष्ण को आप किसी भी रूप में यूज़ कर सकते हैं, प्रयोग कर सकते हैं। ऐसा शास्त्रगत दिखाया गया।
कोई संत, कोई भी कवि उनको कभी बालकृष्ण के रूप में यूज़ कर रहा है, कोई युवा कृष्ण के रूप में यूज़ कर रहा है, कोई प्रेम के लिए यूज़ कर रहा है। यहाँ तक कि जो दुनिया में गलत काम करने वाले जिसको हम एक तरह से चोरी करने वालों को कहें वो भी कहते हैं कि कृष्ण चोर था। तो उन्होंने कृष्ण को वैसा भी यूज़ किया। तो अगर इसको इस तरह से देखा जाए तो ये बहुत बड़ा आर्केस्टा है जिसमें अलग-अलग वाद्ययंत्र है, और हरेक वाद्ययंत्र में भी वही छवि सबको नज़र आ रही है। कोई उसको ढोलक के रूप में यूज़ कर रहा है, कोई तबले के रूप में यूज़ कर रहा है। कोई किसी भी तरह से उसको यूज़ कर रहा है।
तो इतना आकर्षण इसीलिए तो है कि वो कुछ भी बन जाता है। भक्ति में गायन भी है कि ”कभी राम बनके, कभी श्याम बनके चले आना, प्रभु जी चले आना”। माना परमात्मा की कम्प्लीट छवि को अपने अन्दर उतार दिया और अपने आप की पर्सनैलिटी को खो दिया परमात्मा की पर्सनैलिटी के साथ कि वो ज़ीरो है। न कम है, न ज्य़ादा है, न ऊंचा है, न नीचा है, बैलेंस्ड। किसी के लिए कोई दुर्भावना नहीं, सभी के लिए सद्भावना। इसीलिए कृष्ण के व्यक्तित्व में इतना आकर्षण है। और लोग उस व्यक्तित्व को पसंद भी करते हैं। पूरी दुनिया उनको नेक्स्ट टू गॉड भी कहती है, कि अगर परमात्मा के बाद किसी का नाम है तो वो है श्रीकृष्ण जी का। तो ये है पूर्ण अवतार का अर्थ जो अपने आप में रहा नहीं, सम्पूर्ण समर्पण हो गया परमात्मा के लिए। अब वो समर्पणता को ही हम समझ नहीं पाते कि कृष्ण का व्यक्तित्व इतना आकर्षक क्यों है? इसीलिए जब तक हमको एक भी अवगुण, एक भी चिंतन, एक भी कर्म ऐसा होगा जो हमारे व्यक्तित्व को कहीं न कहीं से डाउन करे, नीचा गिराए, तो वो हमको व्यक्तित्व के साथ जुडऩे में मददगार नहीं होगा।
इसीलिए श्रीराम चंद्र जी को एक मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में दिखाया गया। राम को जीवन के रूप में दिखाया गया, कि ऐसे जीवन जीना चाहिए। लेकिन कृष्ण को कलाकार के रूप में दिखाया गया, जो है भी, नहीं भी। एक सेकण्ड में बाल गोपाल बन गया, एक सेकण्ड में माखन चुरा रहा है, एक सेकण्ड में कपड़े चुरा रहा है, एक सेकण्ड में कुछ और कर रहा है, तो इतने सारे रूप बहुरुपी की तरह उन्होंने देखा और लोग उसी व्यक्तित्व को पसंद करते हैं। तो ऐसे अप्रतिम, अद्वितीय, अति आकर्षण, मनमोहक, निर्मोही श्रीकृष्ण को हम क्यों न पसंद करें! तो चलो इस जन्माष्टमी पर उनके अन्दर, उनके व्यक्तित्व में झांक कर अपनी एक झांकी बनाएं।

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