ज़रा भी न्यारेपन की कमी है, देह के भान में हैं तो बाबा का प्यार खींच नहीं सकते…

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बाबा से हम दृष्टि लेते हैं पर देखें हमारा चरित्र कैसा है? शिवबाबा ने ब्रह्मा बाबा के रथ को लिया सोच समझके, जब बाबा को देखते हैं साकार, अव्यक्त, निराकार तीनों की पहचान है। हर एक बाबा को देख रहा है, बाबा अव्यक्त रूप से गुल्ज़ार दादी के तन में कैसे हमारे सामने अपनी नज़र से निहाल करने आते हैं। बाबा अपनी नज़र से निहाल करने आते हैं। बाबा अपनी नज़र से हमको क्या से क्या भासना देता है। वो मेरा बाबा है, बाबा कहता है तुम मेरे बच्चे हो। टीचर के रूप में कितनी अच्छी पढ़ाई पढ़ा रहा है। पढ़ाई पर जब मनन-चिंतन-मंथन करते हैं तो ज्ञान के एक-एक बोल रत्न के बराबर हो जाते हैं। रत्नों की बहुत वैल्यू होती है। आत्मा, परमात्मा और ड्रामा। आत्मा की गहराई में जाओ, आत्मा शरीर में होते हुए मैं-पन व देह के भान का अभिमान नहीं है। कैसे बाबा ने देह में होते हुए देहभान से छुड़ा दिया है। अभी बाबा इशारा दे रहा है देह के भान से परे रहो। जब इतने सब लोग शान्ति में शान्त बैठे हैं, सबका अटेन्शन है कि मैं कौन, मेरा कौन… अन्दर से श्वासों-श्वास यह स्मृति रहे मैं कौन? मेरा कौन? बाबा ने आत्मा की समझ दी है फिर यह ड्रामा है, इसमें हर आत्मा का अपना पार्ट है। दो का एक जैसा पार्ट नहीं हो सकता है। यह इतनी अच्छी विधि जो है हरेक का पार्ट अपना है। यह स्मृति, रिगार्ड रखने का अच्छा रिकॉर्ड बना देती है। ड्रामा में हर आत्मा कहाँ से भी आती है चाहे देश, चाहे विदेश से, सब बाबा के बच्चे हैं। जब भी देखते हैं देह भान से परे हैं, सम्बन्ध से न्यारे हैं। न्यारे बनने से बाबा का प्यार खींच लेते हैं। ज़रा भी न्यारेपन की कमी है, देह के भान में हैं तो बाबा का प्यार नहीं खींच सकते हैं। बाबा तो हर आत्मा को घर जाने के लिए रोज़ इशारा दे रहा है कि बच्चे घर चलना है। परमधाम की सब आत्मायें जब नीचे आयेंगी तब यहाँ से जाना शुरू हो जायेगा। हम तो बाबा के साथ पहले जायेंगे इस बात की खुशी है। यहाँ बाबा ने कई आत्माओं से सेवा कराई है, करा रहा है। भगवान है मेरा बाप, सेवा है मेरा भाग्य। यहाँ भगवान है, यहाँ सेवा है। ऐसी श्रीमत बाबा ने हम बच्चों को दी है। जो अपने को मनमत, परमत से फ्री कर दिया है, इस बात की मुझे बड़ी खुशी है। ऐसे जो फ्री हैं वो सच-सच हाथ उठाओ क्योंकि श्रीमत में बहुत पॉवर है, स्वयं भगवान की श्रीमत है। इतना समझाके इशारा देता है, डिटेल में भी समझाता है, इससे ही इतनी सारी सेवायें वृद्धि को पाई हैं। जब अधर्म का नाश होने वाला है तो हमारे में कोई भी विकर्म रहा हुआ हो तो उसको विनाश के पहले नाश कर दो शंकर के रूप से यानी अशरीरी अवस्था से, लक्ष्य के अनुसार विष्णु समान बनने का पुरुषार्थ करना है। मुझे कमल फूल समान रहना है। अन्दर ही अन्दर यह अभ्यास चलता रहे। बाबा ने मुझे अच्छा कमल का फूल बनाया है, ऐसी किसी को फीलिंग है! दो-तीन दिन से बाबा ने गुणवान बनने पर ध्यान खिंचवाया है। निर्विकारी बनना है, कोई विकार की ज़रा भी अंशमात्र न हो इसके मिसाल बनो। बाबा ने शुरू में दिल्ली, बॉम्बे में ऐसे मिसाल तैयार किये थे क्योंकि बाबा के बोल में शक्ति इतनी है, काम महान शत्रु है। बस, समझा। ज़रा भी अंश मात्र काम की हो तो वो ब्राह्मण नहीं कहला सकता। जिसके अन्दर से काम विकार गया तो उसका क्रोध भी गया। ज़रा भी काम का अंश होगा तो क्रोध भी होगा। चलो काम, क्रोध तो गया, पर लोभ, मोह थोड़ा भी है तो वो बाबा का बच्चा नहीं है। लोभ के साथ बाबा ने इतना अथाह ज्ञान धन जो दिया है, मनी भी दी है तो मान भी दिया है। जब सेवायें शुरू हुई मेरे को चित्रों पर समझाना बहुत अच्छा लगता था।शुरू में जो बाबा ने बनवाया था, वही चित्र ऊपर में हिस्ट्री हॉल में हैं। ऐसे इतने बड़े चित्र बनवाके मुझे वहाँ भेजे और कहा कि इन चित्रों पर लाठी ले करके समझाओ। कितना भी समझाओ, कैसा भी समझाओ परन्तु फिर भी कईयों की नींद कुम्भकर्ण जैसी है। ब्रह्माकुमारियां ज्ञान सुना रही हैं वो सोया हुआ है… यह देखा पढ़ा होगा।अभी मैं देखती हूँ बाबा के सामने बैठ मुरली सुनते भी कोई उबासी देगा या थोड़ा ऐसे झुटका खायेगा। ऐसे जिसको मुरली सुनते झुटका आता है, हाथ उठाओ। सच बताओ। क्योंकि मुरली में जादू है ना, मुरली अन्दर ही अन्दर काम करती है। बाबा सुना रहा है परन्तु मुरली में जादू है। बाबा हमारा कितना मीठा है, कितना प्यारा है, तो सभी बोलो मेरा बाबा, मीठा बाबा, प्यारा बाबा, शुक्रिया बाबा। बाबा भी कहता है अच्छा है बच्चे दिल से कहते शुक्रिया, यह भी एक रिवाज़ है। थोड़ी भी किसी की सेवा न करो ना तो कहेंगे थैंक्स। मैं कहती थैंक्स नहीं करो यह जो आपस में मिल करके प्यार से मिलना हुआ, दो शब्द न भी बोलो सिर्फ ऐसे मुस्कुराओ तो कितना अच्छा लगता है। गुल्जार दादी के तन में बाबा कैसे आता है, कैसे मिलता है, हमारे से बातें करता है। वो टाइम वो घड़ी हम सबके दिल में बाबा बाबा बाबा ही होता है। जैसे दादी बैठती है यहाँ, हम वहाँ बैठ जाते हैं। बाबा आया फिर हम यहाँ मिलने आते हैं, बाबा जा रहा है, क्या यह खेल है अव्यक्त पार्ट का! ओ.के.।

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