मुख पृष्ठब्र. कु. गंगाधरकंप्लेंट से कंप्लीट की ओर ले जाने वाले दिव्य मंत्र…

कंप्लेंट से कंप्लीट की ओर ले जाने वाले दिव्य मंत्र…

ऐसा भी समय आयेगा जहाँ शिकायत ही न हो! कंप्लेन कल्याण के भाव में बदल जाये! कंप्लेन होती ही तब है जब हमें सम्पूर्ण ज्ञान का अभाव होता है। पूर्ण भरा हुआ पानी का घड़ा कभी आवाज़ नहीं करता। शिकायत क्यों होती है, इससे हम किस तरह से बच सकते हैं, उसी सम्बन्ध में परमात्मा हमें बहुत ही स्नेह भरी शिक्षा देकर समझाते हैं कि यह संगम का समय बाप और बच्चों के सर्वश्रेष्ठ मिलन का है। ये मिलन ही सम्पूर्ण शिकायतों पर पूर्ण विराम लगा देता है। फिर भी बाबा कहते हैं कि संगम की यात्रा में चलते-चलते खुद की कमियां या परिस्थितियां आने पर दूसरों को या भाग्य को दोष देते हैं लेकिन बाबा कहते हैं कि शिकायत करना कमज़ोर आत्मा की निशानी है जबकि सम्पूर्णता की ओर बढऩा मास्टर सर्वशक्तिवान का लक्षण है। कहते हैं ना जहाँ सर्वशक्तिवान बाप है वहाँ बात नहीं, शिकायत नहीं।

  • 1. शिकायत(कंप्लेंट) क्यों पैदा होती है? शिकायत तब पैदा होती है जब हमारी नज़र दूसरों के दोषों पर होती है या जब हम स्वयं को परिस्थितियों से छोटा समझने लगते हैं। परचिंतन: जब हम सोचते हैं कि ”उसने ऐसा क्यों किया?” या ”यह मेरे साथ ही क्यों हुआ?”, तो हम अपनी शक्ति गँवा देते हैं। अपेक्षाएँ: दूसरों से सम्मान या सहयोग की उम्मीद रखना ही शिकायतों की जड़ है। बाबा कहते हैं कि शिकायत करने वाला व्यक्ति कभी भी संतुष्ट नहीं रह सकता और न ही दूसरों को सुख दे सकता है।
  • 2. कंप्लीट बनने का अर्थ क्या है? संपूर्ण या कंप्लीट बनने का अर्थ है- संतुष्टता। ऐसी अवस्था जहाँ न स्वयं से कोई शिकायत हो, न दूसरों से और न ही ड्रामा से। सम्पन्नता: जब मन में बाबा की याद और शक्तियों का खज़ाना भरपूर होता है, तो कमी महसूस नहीं होती। जहाँ कमी नहीं, वहाँ कोई शिकायत नहीं। स्वीकार करना: हर परिस्थिति और हर व्यक्ति के संस्कार को ‘ड्रामा’ का हिस्सा मानकर स्वीकार करना ही सम्पूर्णता की ओर पहला कदम है।
  • 3. शिकायत से बचने के उपाय बाबा हमें ‘कंप्लीट’ बनने के लिए कुछ विशेष सावधानियाँ देते हैं: ”क्यों’ को ‘बिंदी लगाओ”। ”क्यों” एक टेढ़ा सवाल है जो शिकायतों का अंबार लगा देता है। बाबा कहते हैं कि हर बात में ‘कल्याण’ देखो और फुल स्टॉप(बिंदी) लगाओ। स्व-परिवर्तन पर ध्यान: दूसरों को बदलने की कोशिश करेंगे तो शिकायतें बढ़ेंगी, खुद को बदलेंगे तो दुनिया बदल जाएगी। बेहद की दृष्टि: जब हम खुद को आत्मा और दूसरों को भी बाबा की संतान(भाई-भाई) समझते हैं, तो घृणा या शिकायत के भाव स्वत: समाप्त हो जाते हैं।
  • 4. विधाता और वरदाता को याद करो बाबा कहते हैं कि तुम बच्चे ‘विश्व कल्याणकारी’ हो। क्या एक दाता या कल्याणकारी कभी शिकायत कर सकता है? हमें देने वाला बनना है, माँगने वाला नहीं। जब हम मास्टर विधाता बनकर सबको दुआएं देते हैं, तो हमारा ‘कंप्लेंट’ का खाता समाप्त हो जाता है और ‘सम्पूर्णता’ का खाता जमा होने लगता है। जैसे ब्रह्मा बाबा को हमने देखा कुछ भी परिस्थितियां आईं लेकिन वे कभी भी विचलित नहीं हुए। क्योंकि विश्व कल्याणकारी का भाव उनकी रग-रग में समाया हुआ था।
  • 5. समय की पुकार: ‘नो मॉर एक्सक्यूज़(कोई बहाना नहीं)’ अब समय बहुत कम है। बाबा कहते हैं कि यदि अब भी हम छोटी-छोटी बातों की शिकायतें लेकर बैठेंगे, तो ‘सम्पूर्ण फरिश्ता’ कब बनेंगे? माया हमें परिस्थितियों के बहाने देगी, लेकिन हमें उन बहानों को अपनी शक्ति से खत्म करना है।

शिव बाबा हमें ‘कंप्लेंट मुक्त'(शिकायत मुक्त) और कंप्लीट(संपूर्ण) बनाने के लिए विशेष स्वमान का अभ्यास कराते हैं। जब हमारा स्वमान जाग्रत होता है, तो अभिमान और शिकायत स्वत: समाप्त हो जाते हैं।

यहाँ बाबा द्वारा दिए गए 6 मुख्य स्वमान हैं जो आपको हर परिस्थिति में अचल-अडोल रहने में मदद करेंगे:

  • 1. ”मैं मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा हूँ”
  • 2. ”मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ”
  • 3. ”मैं सदा संतुष्टमणि आत्मा हूँ”
  • 4. ”मैं अचल-अडोल आत्मा हूँ”
  • 5. ”मैं मास्टर विधाता और वरदाता हूँ”
  • 6. ”मैं कम्बाइड स्वरूप आत्मा हूँ”

शिकायत करना समय को व्यर्थ गँवाना है, जबकि सम्पूर्ण बनना समय को सफल करना है। बाबा के हाथ में हाथ देकर हर परिस्थिति को एक ‘पेपर’ की तरह समझें और उसे पास करें। जैसे ही आप ‘शिकायत’ छोड़ते हैं, परमात्मा के वरदानों के द्वार आपके लिए खुल जाते हैं।

तो आइए, आज से हम संकल्प करें कि हमारे मुख पर न किसी व्यक्ति की शिकायत होगी, न प्रकृति की और न ही प्रारब्ध की। हम बाबा की श्रीमत पर चलकर ‘कंप्लीट और परफेक्ट’ बनेंगे।

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