हम आप सबने इस प्यारे संगमयुग पर अपने आपको मीठे बाबा के आगे समॢपत किया। सिर्फ मन्सा या बुद्धि से नहीं परन्तु प्रैक्टिकल में अपनी जीवन को हथेली पर रखकर बाबा के आगे अॢपत कर दिया। सन्यासी सन्यास करते उनके मन में वैराग वृत्ति होती, वह अलग बात है। आप सब बेहद के डबल सन्यासी हो, डबल सर्टिफिकेट लेने वाले हो। आप सबको इस संगम का डबल सौभाग्य मिला हुआ है। आपका इस ड्रामा में डबल पार्ट है, डबल कमाई है, डबल लॉटरी है, डबल पालना है क्योंकि आप डबल सेवाधारी हो। आप अपने को दृढ़ करके महावीर बन युद्ध के मैदान पर आये हो।
आप सबका महान त्याग है। जिस घड़ी अपने आपको अॢपत किया- तो यह दृढ़ संकल्प किया कि ओ बाबा हम आपके घर में मर मिटेंगे परन्तु हटेंगे नहीं। सदा विजयी बनेंगे कभी हारेंगे नहीं। आपके द्वार पर हम अपना श्वास-श्वास सफल करेंगे। कहाँ भी अपना श्वास व्यर्थ नहीं गँवाएंगे। हर कदम पर आपका आज्ञाकारी बनकर रहेंगे। कदम-कदम श्रीमत पर चलेंगे। तो आप सब हो महान त्यागी। पाण्डवों का यह त्याग शक्तियों से भी बड़ा है। शक्तियां अनेक हैं, पाण्डव विरले हैं। आप सब देह-अभिमान छोड़कर निर्मान सेवाधारी बनें – तो आपकी माक्र्स शक्तियों से भी ज्य़ादा है इसलिए पाण्डवों का पति पाण्डवों का साथी है, शक्तियों का रखवाला है। शक्तियों को उसने आगे रखा, यह उनकी बलिहारी है, थैंक्स है। लेकिन पाण्डवों का सदा साथी है इसलिए आप सब महान हो। जिन्होंने यह दिल में संकल्प किया कि हमें मोल्ड होकर रहना है, मुड़कर पीछे नहीं देखना है, यह सब माक्र्स आप सबको एक्स्ट्रा मिल रही हैं।
प्रवृत्ति में रहने वाले सीढ़ी चढऩे के बाद उतरते हैं परन्तु आप लोगों ने अपने को सिद्ध किया कि हम बाल ब्रह्मचारी बाबा के बच्चे हैं। यह बाल ब्रह्मचारी रहना भी रिकॉर्ड है। आप लोगों ने दृढ़ संकल्प किया कि हमें सीढ़ी चढऩी ही नहीं है, और जो चढ़ चुके हैं उनको देखना भी नहीं है। यह भी बहुत बड़ा त्याग है तो आप डबल त्यागी हैं। अगर वह चढ़ी हुई सीढ़ी देखने में आती तो पूरे त्यागी नहीं। देखनी भी नहीं है यह मंजि़ल। दिखाई पड़ती है तो यह कमी है। अगर चढ़ी हुई सीढ़ी दिखाई पड़ती, वह संकल्प भी आता तो समझो हम अभी तक ज्ञानी व योगी तू आत्मा की स्टेज से दूर हैं इसलिए यह सर्टिफिकेट लेना है कि हम कोई देहधारी को देखते नहीं। हमारे इन नयनों में एक बाबा की ही ज्योति जगती। तो अपने आपको चेक करो कि मुझे कोई भी हस्ती सूक्ष्म में भी आकर्षित करती है? या मैं सर्व आकर्षणों से परे आकॢषत रूप हूँ। मेरी बुद्धि कहाँ किसी पर सूक्ष्म में भी आकॢषत तो नहीं होती? मिसाल बताते हैं कि लक्ष्मण ने 14 साल सीता के साथ वन में बिताया परन्तु उसने सीता के अंगूठे के सिवाए उसको कभी देखा ही नहीं। यह भी मिसाल है, ऐसे नहीं कि उसने देखा ही नहीं परन्तु देखते भी नहीं देखा। तो जब हमारे चन्द्रवंशी क्षत्रिय घराने का लक्ष्मण कहता कि हमने कभी सीता को देखा ही नहीं, तो हम सूर्यवंशी में आने वाले कैसे कह सकते कि हमें कोई दिखाई पड़ता! अगर कोई दिखाई पड़ता तो समझो मैं द्वापर वाला हूँ न कि सूर्यवंशी हूँ। यही है सबसे पहली मंजि़ल।



