जिस घड़ी मैं अपने को देखना शुरू करूं तो परचिंतन बन्द हो जायेगा

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ओम शान्ति के महान मंत्र से कितने फायदे हैं। यह मंत्र बाबा की याद दिलाता है, स्वधर्म की याद दिलाता है, घर की याद दिलाता है, ड्रामा की हर सीन को देखते हुए ओम शान्ति। चारों बातों में कमाल है ओम शान्ति की। यह संगमयुग धर्माऊ युग है, धर्मात्मा बनने के लिए युग है, इसमें हमारे कर्म श्रेष्ठ धर्म श्रेष्ठ हों। पहले मैं स्वयं को देखूं फिर औरों को देखूं। अन्दर अपने को देखने से तीसरा नेत्र खुला। जब तक अपने को नहीं देखा, नहीं जाना तो मेरा तीसरा नेत्र अभी खुला नहीं है। पहले रजो में किसके अवगुण देखते थे। अभी बुद्धि चेंज हुई सतोगुणी बनी। पर अन्तर में आत्मा जो अति सूक्ष्म है, अपने आपको जानूं, देखूं। पहले मैं अपने को आत्मा देखूं। आत्मा में मन-बुद्धि-संस्कार हैं। आगे कहते थे स्थूल, सूक्ष्म, मूल। जब आत्मा को जाना तो मन को पूछते हैं कहाँ हो तुम। बाबा की दृष्टि से आत्मा समझने लगती है मैं शांत हूँ। भगवान निज आत्मा को ज्ञान दे रहा है। सम्पूर्ण पवित्रता को जीवन में लाने वाली मैं आत्मा हूँ। कार्य व्यवहार छोड़कर हम प्रैक्टिस नहीं कर सकते। अभी कार्य व्यवहार तो पहले से भी ज्य़ादा है। पहले जि़म्मेवारी ज्य़ादा नहीं थी। अब ईश्वरीय परिवार में आ गये तो जि़म्मेवारी और बढ़ गयी, उसमें फिर पवित्रता हो, सत्यता हो तो लगेगा यह दिव्यता है। पवित्रता इतनी हो जो अशुद्ध संकल्प भी न आयें। अगर मेरे पास अशुद्ध संकल्प आया तो वह छोड़ेगा नहीं। जैसे मक्खी, मच्छर पीछे घूमते बीमारी पैदा करते हैं। अशुद्ध माना निगेटिव। कहेंगे इतना नहीं है थोड़ा है, फिर औरों से भेंट करेंगे या अपने पास्ट से भेंट करेंगे। पहले मेरा दर्पण साफ हो तो अपने आपही दिखाई पड़ेगा। पीछे भासना आयेगी, इन आँखों से दिखाई पडऩे वाली चीज़ मुझे नहीं दिखाई पड़ती। ये जो दिखाई पड़ता है वो मेरे काम का नहीं है। अन्तर साफ का सबूत है दिमाग साफ, अपने लिए चाहे सबके लिए। पहले संकल्प में मन को शान्त करो। यह बार-बार टी-टी करता है। बुद्धि में एकाग्रता की शक्ति को जमा करने के लिए मन बीच में टी-टी करता है। इधर की, उधर की, पराई, पुरानी बात। कहेंगे अशुद्ध नहीं है पर कॉमन है। तो छुट्टी दे दी ना! अगर अच्छी भावना से सोचते हैं तो भी व्यर्थ बहुत है। चलो अशुद्ध न हो पर व्यर्थ कितना है। या तो बड़े बनकर कहेंगे कि ये नहीं होना चाहिए या तो छोटे बनके कहेंगे बड़ों को यह नहीं करना चाहिए। ये जो बुद्धि का अभिमान है वो हमको पवित्र बनने नहीं देता है। यह रियलाइज़ेशन नहीं है, रियलाइज़ेशन में सच्चाई, समझ। रियलाइज़ेशन में पहले मुझे सच्चाई चाहिए। जिस घड़ी मैं अपने को देखना शुरू कर दूं, तो परचिन्तन बन्द हो जायेगा। अगर परचिन्तन बीच में आया तो स्व चिन्तन से लिंक बीच में टूट गयी या पास्ट चिन्तन बीच में आया तो स्व चिन्तन रह गया। स्व चिन्तन में परचिन्तन जिस घड़ी घुसता है या पास्ट की कोई बात आती है, उस घड़ी मेरी गति क्या है! चिन्तन शुद्ध श्रेष्ठ हो, स्व को अन्दर से समझदार बाबा को सामने रखकर, जिस दृष्टि से बाबा देख रहा है, उसी दृष्टि से मैं देखूं। बाकी यहाँ क्या हो रहा है उसको देखने की ज़रूरत ही नहीं है। जैसे साकार बाबा को देखा है। हम बच्चों को माँ बाप के रूप में पालनादी है। शिवबाबा ने साकार बाबा के द्वारा माँ बाप, सखा बनके कान में शिक्षा दी है, जो हर पल याद आती है, बाबा ने इशारा दिया है ये तुम नहीं कर सकती हो। जैसे बाबा ने आदि से आदत डाली है, इशारों से समझाया ना! आवाज़ में क्या आती है। जैसे बाबा की हैण्डलिंग पॉवर वंडरफुल है, वो पत्थरबुद्धि को पारस बना देता है। श्रीमत में अगर मनमत मिक्स नहीं है तो न कभी पर का प्रभाव आयेगा, न घृणा आयेगी। हम इतने पवित्र बनें जो पावन पूज्य बनें। मुझे पूजा करानी नहीं है पर लायक तो बनूं। धरती पर पाँव न हो, रॉयल्टी नहीं है। वायुमण्डल का असर कोई मेरे को न हो जाये। जब तक इधर-उधर देखने की आदत है, हू एम आय भूला हुआ है। इधर-उधर की सारी जानकारी बुद्धि में है। अगर इन्फॉरर्मेशन ही अन्दर डालते रहेंगे तो अपने को कब देखेंगे। बाबा से अन्दर कम्यूनिकेशन हो नहीं सकता। कनेक्शन हो तो कम्यूनिकेशन हो। जैसे बाबा की सर्व के प्रति कल्याण भावना है। अगर उस भावना में अन्तर है तो हमारी यह महानता नहीं है। अगर सत्यता नहीं है तो साहेब राज़ी नहीं है। बातें तो आयेंगी पर हम पार हो जायें। कैसे हुए? अरे बाबा है ना। बाबा कहता था लम्बे हैं जीवन के रास्ते आओ चले हम गाते हंसते। बाबा कहे बेफिकर बादशाह रहो, अगर हमारी शक्ल फिकर वाली हो तो फालो फादर नहीं है। पवित्रता फालो फादर करने में मदद करती है। सपूत बनके सबूत देना है। बाबा कहता था किसकी बातों में नहीं आना, न बातें सुनना, न सुनाना। इस चक् कर में आना ही नहीं है। हमे यह शिक्षायें मिली हैं। भगवान मेरे लिए क्या चाहता है, अन्दर इतनी सच्ची दिल हो, जो ईशारा वो करता है बच्ची तुम्हारा यह काम है। इसमें हम स्वतंत्र है यानी किसके दबाव, प्रभाव में आकर कोई काम न कर लें। मैं आत्मा इतनी फ्री रहूं जो कोई कर्म के हिसाब-किताब के बीच में में न आ जाऊं। कोई किसी की ग्लानि करता है तो उसे बन्द करा देना, बाबा के शब्द यही हैं। तो किसी को ताकत नहीं है कि यज्ञ की, ब्राह्मणों की ग्लानि में मेरे को शामिल कर ले। हमको जो करना है वही करना है। यज्ञ बाबा का है, यज्ञ का हम खाते हैं। इतना सुन्दर ब्राह्मण परिवार है। किसी के लिए मन में ग्लानि रखना या किसकी ग्लानि करना, उसको ब्राह्मण नहीं माना जाता है। फिर आती है सम्पूर्ण पवित्रता की बात, मैं मुख से कुछ नहीं कहूँ,स पर वो सामने आये तो ओम शान्ति भी न कहूँ। अरे मुस्कुरा के ओम शान्ति करो ना, क्या मैं इतना बिजी हूँ! अगर मेरी दृष्टि ऐसी है तो क्या मैं आत्मा शुद्ध आत्मा कीलाइन में हूँ? मैं अपनी बात देखूं, बाकी दूसरा कहाँ तक शुद्ध अशुद्ध है, ऐसे नहीं। गंगा कभी यह नहीं कहती है, ये पापी है। पापी का काम है उसमें टुबकी लगा के पावन बनना। बाबा ने कहा है तुम मेरे मस्तक से निकली हुई गंगा हो। तुम मेरे माथे की लाज़ रखना। मेरे दिल में जो होगा, दिमाग ऐसा ही चलेगा। दिमाग में होगा तोदिल में अन्दर से वही फीलिंग होगी। तो आत्मा अन्दर से अपने दिमाग और दिल को देखे। हम साउण्ड में आते साइलेन्स में रहें। इससे सम्पूर्ण पवित्रता क्या है, अपने आप खुद को अनुभव होगा। सम्पूर्णता है ही निर्विकारी पन की। सोलह कला सम्पूर्ण, सर्वगुण सम्पन्न, फिर सम्पूर्ण निर्विकारी। मेरे में कोई भी विकार की अंश न रहे। साइलेन्स में रहकर आवाज़ में आये, आवाज़ में आते संकल्प में थोड़ा भी अशुद्धि अशं मात्र भी न हो। जो बात मेरे करने योग्य है वो तो मेरे को करनी पड़ेगी। फिर हिम्मत बच्चे की मदद बाप की, नियत साफ मुराद हासिल, सच्ची दिल पर साहेब राज़ी। अगर मैं कोई भी बात में हिम्मत नहीं रखती हूँ तो जैसे बाबा का जो कॉन्टे्रक्ट साइन किया हुआ है हिम्मत बच्चे की मदद बाप की वो में कैन्सिल कर रही हूँ। बाबा ने मेरे में आशायें रखी हैं, उम्मीदें रखी हैं, कहाँ से उठा के कहाँ बिठाया है। अभी अपने को नालायक बना के, यह ख्याल करके हिम्मत को छोड़ेंगे तो क्या हाल होगा! तो हम लोगों केा इतना एलर्ट, एक्यूरेट रहना है। कई बाबा के बच्चों में मदद के आधार से हिम्मत नहीं छोड़ी है। पर हिम्मत और मदद के बीच में सच्चाई चाहिए। हिम्मत कभी अकेला काम नहीं कर सकती। सच्चाई का बल बाबा को पकड़के रखता है। बाबा मुफ्त में नहीं देता है, पहले सच्चाई को टेस्ट करता है। सच्चाई के आधार से भले कितने भी उतराव चढ़ाव आयेंगे, दूसरा कोई मदद नहीं करेगा। स्वयं अपनी आत्म-अभिमानी सीट पर रहें तो बाबा मदद करता है, भले कोई न पूछे। सच्ची दिल है तो साहेब राज़ी है, परिवार मेरा है। कोई भी परिवार में ऐसा नहीं हो सकता है, जो मेरे को प्यार न करे। पर मेरे अन्दर प्यार नहीं है, यह प्यार का परवाह बल देता है। ज्ञान भी तभी अच्छा लगा है जब भगवान के लिए प्यार है, स्वयं के लिए प्यार है। अगर मेरे में हार्ट ही नहीं है तो हेड क्या काम करेगा! हार्ट, हेड, हैण्ड इसपर आधार है। जैसा दिल, दिमाग है, हाथ वैसा ही काम करेगा। अगर दिल दिलवाला के साथ है तो दिल कभी भारी नहीं होगा। दिल में दु:ख आयेगा नहीं। दु:ख देने का भी ख्याल नहीं आयेगा। दु:ख देने का ख्याल आना भी अपवित्रता है। पवित्रता में सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं है। दृष्टि-वृत्ति एक बारी भी खराब हुई, उसमें चंचलता है तो वह हमें पवित्र बनने नहीं देगी। दृष्टि में हमारी रूहानियत, आत्मिक दृष्टि हो। एक बाबा के बच्चे हैं, किसके भी स्वभाव संस्कार वश मेरी दृष्टि में उसके लिए दुविधा आई या दु:ख महसूस हुआ। भले उसने मुझे धोखा दिया, उसका मुझे दु:ख हुआ, मेरी दृष्टि-वृत्ति बदल गयी। तो यह भी मेरी अपवित्रता हो गयी क्योंकि दु:ख, धोखेबाजी से बुद्धि दुविधा में आ जाती है। विश्वास अपने से या औरों से छूट जाता है। भावना मेरी सदा शुद्धि श्रेष्ठ हो, विश्वास अटल हो। अच्छा ही होगा, हुआ ही पड़ा है। जो मीठे बाबा ने कहा, बच्ची हो जायेगा। अन्दर से और कोई आवाज़ आये ही नहीं। कैसे होगा? मुख के लड्डू थोड़े ही खाना है। अन्दर विश्वास का जो आवाज़ है, उसको मैं क्यों छोडूं। ड्रामा में हुआ पड़ा है, कराने वाला बाबा बैठा है। मुझे अपनी भावना को सच्चा रखना, मेरा काम है। जो होगा मैं राज़ी हूँ। निश्चय में कभी खलल न पड़े, संशय न आये, स्वयं में, चाहे बाप में, चाहे ड्रामा में। ज़रा सा भी संशसय आया, तो आत्मा का जो भाग्य है, निश्चय के बल से विजय पाये, वह नहीं हो सकती। पूरे विश्व में सेवायें हो रही हैं, काई आत्मा नहीं कर रही है। परन्तु आत्मा का भाग्य है सिर्फ निश्चय रखा। भाग्य विधाता ने उसको निश्चय से निमित्त बना लिया। निश्चय का बल है सेवा का फल है। हमने क्या किया! सिर्फ पवित्रता हमारे संकल्प, वाणी, कर्म और सम्बन्ध में हो। संकल्प को शुद्ध, शान्त, श्रेष्ठ और दृढ़ बनाओ। संकल्प शुद्ध हैं, उसमें शुद्ध भावना है, श्रेष्ठ हैं तो कुछ अच्छा होने वाला है, हुआ ही पड़ा है। फिर आजकल बाबा कहते हैं दृढ़ संकल्प रखो, औरों को भी उमंग-उत्साह में लाओ, औरों को भाग्य बनाने का संकल्प आये। सम्पूर्ण पवित्रता में अशुद्ध बातों का अशुद्ध छींटा भी नहीं पड़ सकता है। पवित्रता की इतनी वैल्यू है तो सब वैल्यू हमारे में आ जायेंगी। सर्व गुण आ जायेंगे। मेरे में कोई अवगुण न रहे, मैं किसी का अवगुण चित्त पर न रखूं। एकाग्रता की शक्ति से चित्त मेरा साफ हो। सच्चाई को अगर कभी छोड़ा नहीं तो साहेब राज़ी रहेगा। फिर धर्मराज की आँख नहीं देखेंगे। सदा ही याद है, सत धर्म मेरा सच्चाई है, कारोबार में ट्रस्टी हैं। ट्रस्टी देखना है तो बाबा को देखो। हमारे बोल, चाल, व्यवहार से हर एक माने कि ये लोग बरोबर सतयुग स्थापन कर रहे हैं। दुनिया का फ्यूचर क्या है यह हमारे से दिखाई पड़े। साक्षात्कार भी हो, आवाज़ भी फैले, उनको अनुभव हो। यह है सम्पूर्ण पवित्रता।

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