मुख पृष्ठदादी जीदादी हृदयमोहिनी जीबार-बार अशरीरी बनने की ड्रील - अन्तिम पेपर की तैयारी

बार-बार अशरीरी बनने की ड्रील – अन्तिम पेपर की तैयारी

संगमयुग का जो अन्तिम काल है, उस समय की हमको क्या तैयारी करनी है? उसकी तैयारी कर ली है या करनी है? अन्तिम समय के हिसाब से बाबा ने दो शब्द कहे हैं- एक तो अचानक होना है और एवररेडी रहना है। तो सबको ये दो शब्द याद रहते हैं ना? कभी भी बुलावा हो सकता है नेक्स्ट जन्म के लिए। इसीलिए बाबा ने अचानक के लिए कई बातें सुनाई हैं। जैसे आप अपनी हर घड़ी अन्तिम घड़ी समझो क्योंकि सेकण्ड में क्या से क्या भी हो सकता है। इसलिए ऐसे समय पर नष्टोमोहा भी रहो और स्मृति स्वरूप भी रहो। तो अन्तिम पेपर में पास होने के लिए, अभी से ही हमको क्या लक्ष्य रखना चाहिए, उसकी योजना अभी से बना लेना चाहिए क्योंकि सेकण्ड का पेपर होना है। सेकण्ड में क्या से क्या भी हो सकता है इसीलिए बाबा कहते अभी से अशरीरी भव का अभ्यास करना क्योंकि अन्त हमारी श्रेष्ठ हो उसके लिए अशरीरी भव का अभ्यास बहुत ज़रूरी है। यह मन चारों ओर के दृश्य देख करके विचलित होगा लेकिन इस मन को कन्ट्रोल करना, मन की रूलिंग पॉवर हमारे हाथ में हो तो रूल करना, कन्ट्रोल करना, यह अभ्यास हो तब एक सेकण्ड में अशरीरी हो सकेंगे। कोई भी आकर्षण हमें खींचे नहीं तभी हम पास विद ऑनर होंगे। तो सेकण्ड में अशरीरी बनने का अभ्यास हमको अभी से करना पड़ेगा। हम जिस बात को नहीं चाहते हैं वो होता तो है यह सबके जीवन का अनुभव है। हम समझते हैं यह नहीं हो, कम से कम वेस्ट थॉट जो चलते हैं, उसके लिए भी सभी अभ्यास करते हैं कि व्यर्थ विचार नहीं आने चाहिए। लेकिन फिर भी आ ही जाते हैं, भिन्न-भिन्न रूप से माया आ जाती है, जो चाहते नहीं है लेकिन आ जाती है, तो न चाहते भी क्यों आती है? कारण है बहुतकाल से बॉडी कॉन्शियस में रहने का अभ्यास जो नैचुरल है वो विघ्न डालता है। तो यह अशरीरी बनने का अभ्यास अगर हम बहुतकाल से नहीं करेंगे तो बहुतकाल की मदद हमको नहीं मिलेगी। तो बाबा कहते हैं मन के मालिक बनके बार-बार शरीर के भान से परे अशरीरी रहने का अभ्यास बहुतकाल का आवश्यक है। इसलिए इस बारी बाबा ने यह 5 स्वरूपों का अभ्यास बीच-बीच में बार-बार करने का होमवर्क दिया है। बार-बार नहीं तो कम से कम 8 बारी तो ड्रिल करने का होमवर्क दिया है क्योंकि बार-बार करने से ड्रिल का लिंक जुटा रहता है। अगर एक ही बारी आपने 4-5 बारी करके अपना काम पूरा कर दिया, अब जो किया वो तो अच्छा है रिज़ल्ट तो उस समय अच्छी होगी। लेकिन सारे दिन का आपका निरंतर लिंक रहे, वो नहीं रहेगा। तो लिंक के लिए बाबा ने अलग-अलग टाइम 8 बारी करने का कहा क्योंकि अगर कोई भी चीज़ का लिंक टूट जाता है और उसे फिर जोड़ा जाता है तो उसमें फर्क हो जाता है। लेकिन लिंक जुटा ही रहे तो वो ताकत एक और होती है। इसलिए बाबा ने 8 बारी यह अभ्यास करने का कहा है। तो आत्मा रूप में स्थित होने की बाबा ने बहुत अच्छी एक युक्ति सुनाई है कि करावनहार की स्मृति से इन कर्मेन्द्रियों से काम लेंगे तो मालिकपने का नशा रहेगा, खुशी रहेगी। तो मैं आत्मा करनहार हूँ, तो मन-बुद्धि-संस्कार यह भी मेरे हैं, मैं नहीं हूँ। मैं शिवबाबा के नयनों का तारा हूँ, मैं शिवबाबा के दिलतख्त पर बैठने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ या मैं आत्मा परमधाम की यात्रा में जा रही हूँ, इस प्रकार से जो भी स्वमान बाबा देते हैं, उस स्वमान के स्वरूप अनुसार हमारी स्मृति बनी रहे तो वो शक्तिशाली स्थिति का अनुभव करायेगी। तो मैं आत्मा हूँ लेकिन कौन सी आत्मा हूँ यह स्मृति सारे दिन में बीच बीच में ला करके स्मृति स्वरूप बनने की कोशिश करते रहना चाहिए। भले हम जानते हैं कि मैं आत्मा हूँ लेकिन फिर भी स्वमान से जाने और आत्मा स्वरूप में अनुभव करें तो वो नशा और खुाश्ी बहुत ही सुखदाई न्यारा और प्यारा अनुभव करायेगी। तो मैं आत्मा हूँ इस अनुभूति में रहें। आत्मा का पाठ बहुत पक् का होना चाहिए। किसी से बोलते हैं किसी को भी देखते है तो ऐसा स्पष्ट अनुभव हो, हम आत्मा-आत्मा से बात कर रहे हैं, देख रहे हैं। मस्तक में देखते आत्मा की स्मृति से बात करो, एक दो को मिलो तो हमारी यह प्रैक्टिस चाहिए – किससे भी बात करें, किसे भी देखें तो स्वरूप की स्मृति अपनी भूले नहीं। अपने असली स्वरूप की नॉलेज है लेकिन उसकी अनुभूति में कम रहते हैं इसलिए बार-बार वही फिर फिर न चाहते भी बॉडी-कॉन्सेस की पुरानी स्मृति इमर्ज होती रहती है। तो अभी जो भी कहते हैं क्रक्रमैं आत्मा अशरीरी हूँञ्जञ्ज तो यह कहने से ही अशरीरीपन का अनुभव होना चाहिए। क्रक्रमैं आत्मा हूँञ्जञ्ज तो इस स्वरूप का अनुभव होना चाहिए। आत्मा समझने से परमात्मा की याद तो स्वत: ही आयेगी क्योंकि आत्मा का कोई से कनेक् शन नहीं है सिवाए परमात्मा के सिवाए। अब सोचो कि मैं आत्मा शांत स्वरूप आत्मा हूँ तो वो तुरन्त साथ साथ अनुभव होना चाहिए सिर्फ नॉलेज नहीं लेकिन अनुभव होना चाहिए। तो इस अटेन्शन में जब हम रहेंगे तभी हमारा अन्तकाल सुहाना होगा। बहुत करके भक्ति जो करते हैं वो भी यही कोशिश करते हैं कि मेरा अन्त बहुत श्रेष्ठ अच्छा हो जाये। तो हमारा भी अन्तिम काल ऐसा श्रेष्ठ हो, उसके लिए यह प्रैक्टिस चाहिए, भले काम में बिजी हो लेकिन बीच बीच में और ही प्रैक्टिस यह करो कि जिस समय बहुत बिजी हो, उस समय ट्रायल करो मैं एक सेकण्ड में अशरीरी बन सकता हूँ? अगर यह प्रैक्टिस होगी तो जो बाबा चाहता है कि मेरे एक एक बच्चे के चेहरे से, चाल से यह पता पड़े कि यह किसका बच्चा है? यह कोई विशेष आत्मा है, साधारण आत्मा नहीं है, यह महसूस हो सामने वाले को, तब तो बाबा प्रत्यक्ष होंगे, यही देख करके कहेंगे कि वाह! यह कौन है? किसके हैं? तो हमको अभ्यास करना चाहिए कि मैं सारे दिन में आत्म अभिमानी प्रैक्टिकल कितना टाइम रह सकता हूँ? ठीक है, यह चेक करो और अपने में चेंज लाओ।

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