मुख पृष्ठदादी जीदादी प्रकाशमणि जीअपना काम है सबको आत्मिक दान देना

अपना काम है सबको आत्मिक दान देना

मुझे देना सीखना है, मैं यह न सोचूँ कि यह मुझे दे। मैं दाता हूँ। जितना मैं दूंगी उतना मेरा महत्त्व है। एक-एक को रूहानियत देना, शीतलता देना, यह देना ही मेरी महानता है।

बाबा कहते बच्चे, अपने स्वभाव को शीतल बनाओ। बहुत-बहुत नम्रचित्त और मीठे बनो। जब कोई फोर्स से कुछ कहता है तो उस समय उसकी मान लो। आप शीतल बन जाओ। अगर उस बात को लेकर दुश्मनी हो जाती तो नुकसान होता है इसलिए बाद में आपस में मिलकर मीठी धारणा की रूह रिहान करो, डिबेट नहीं करो। आपकी नम्रता का प्रभाव दूसरे पर ज़रूर पड़ेगा। एक की चर्चा दूसरे से नहीं करो। निर्माण बनना माना समा लेना। जब कोई बात आपस में नहीं बनती तो उसको छोड़कर स्व चिन्तन में रहो। झगड़े में पड़कर ज्ञान को नहीं छोड़ो। हमें कुमार-कुमारियों का बहुत फिकरात रहता। हमारे ईश्वरीय विश्व विद्यालय का फाउन्डेशन है ईश्वरीय मर्यादा। दुनिया में मर्यादा नहीं, हमारी है टॉप मर्यादा। अगर हम किसी पर फेथ रखते हैं तो फेथ पर भी माया पानी डाल देती है। ऐसे अनेक अनुभव देखे हैं। इसलिए हम कन्ट्रोल करते- कुमार-कुमारियां मर्यादा में रहो। एक की गलती से सारे ब्राह्मणों को चोट लग जाती। एक के कारण हमें सबको बांधना पड़ता। किसी के कैरेक्टर पर दाग लगे ये मेरे से सुना नहीं जाता। शॉक लगता। कोई मेरे कैरेक्टर पर आँच डाले यह मेरे जीवन के लिए बहुत बड़ा दाग है। परन्तु किसी का क्वेश्चन क्यों उठा- क्योंकि हल्के होकर चले। ईश्वरीय मर्यादा हमारे जीवन का ऑर्डर है। बाकी कोई ऑर्डर नहीं। इसमें जितना अपनी रूहानियत में मस्त रहो, मेरा एक बाबा- उसी मस्ती में रहो, यह कंगन बहुत स्ट्रिक बंधा हुआ चाहिए। मैं जब यह बात बोलती तो समझते यह मार्ग तो बड़ा कठिन है। फिर बुद्धि जाती गन्धर्वी विवाह में। लेकिन जिन्होंने किया वह भी आँसू बहा रहे हैं। रो रहे हैं। इसलिए कभी भी यह संकल्प नहीं आवे। ऐसे नहीं कम्पेनियन चाहिए। मरना तो पूरा मरना। जीने का नहीं सोचो। हमें बाबा की गोदी में जीना है। दुनिया में हम मर गये। खाने का, पहनने का, नींद का सब ऐश चला गया। हम सब त्याग चुके। त्याग माना त्याग। अभी हमें रूहानियत की आत्मिक शक्ति का दान देना है। जितना दाता बनो उतना पुण्यात्मा बनेंगे। मुझे नयनों से भी पुण्य करना है। अपनी रूहानियत की शक्ति का भी पुण्य देना है। मुझे देना सीखना है, मैं यह न सोचूँ कि यह मुझे दे। मैं दाता हूँ। जितना मैं दूंगी उतना मेरा महत्त्व है। एक-एक को रूहानियत देना, शीतलता देना, यह देना ही मेरी महानता है। ऐसे नहीं कि मैं इसे इतना स्नेह देती फिर भी यह मेरी ग्लानि करता। मुझे कोशिश करनी है एक भी कांटा न बने, अपना काम है सबको आत्मिक दान देना। दान देने में विघ्न तो अनेक आयेंगे क्योंकि दान लेने वाला कोई कैसा है, कोई कैसा। मैं हमेशा समझती- हर एक मेरे मास्टर हैं, मैं हर एक से सीखती हूँ। अपने दिल में किसी के प्रति नफरत नहीं रखो। झगड़े का कारण है एक-दो से नफरत। जड़ होती नफरत, बन जाता परचिन्तन, हो जाता दुश्मन। पहले होगी ईष्र्या, वह पैदा करेगी नफरत, फिर परचिन्तन चलेगा, जिसका परचिन्तन करते वह दुश्मन बन जाता। एक बोल जीवन भर के लिए दुश्मन बना देता। एक ऐसा शब्द भी बोला जो किसी के हार्ट पर लग गया तो वह जि़न्दगी भर दुश्मन बना देता। मैं ऐसा क्यों करूँ?

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