जो रंग चढ़े, फिर वो न छूटे

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एक बहुत ही पवित्र अर्थ को लिये हुए है ‘होली’ का त्योहार। इसे जानें, समझें और ‘होली’ बनकर मनायें। हुल्लड़बाजी को होली का नाम न दें।

प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णमासी को ‘होली’ का त्योहार मनाया जाता है। जब पूर्ण चन्द्र आकाश में जगमगा कर पूरी सृष्टि को रोशन कर रहा होता है। अर्थात् जब ज्ञान की पराकाष्ठा हो, सोलह कला से सम्पन्न चंद्र की तरह मानव स्वयं को सत्य ज्ञान और गुणों से सम्पन्न करने के सर्वोच्च पायदान पर हो। अंश भी न बचे, जो वंश बने… दो दिन के होली त्योहार में प्रथम दिन क्रहोलिका दहनञ्ज किया जाता है। जिसमें लोग अपने घर का कूड़ा-कचरा, गोबर के कंडे आदि व्यर्थ चीज़ों को डालकर जलाते हैं जो बुराइयों और विकारों के प्रतीक हैं। कहीं-कहीं ‘होलिका’ शब्द का अर्थ – ‘भुना हुआ अन्न’ भी माना जाता है। होलिका के अवसर पर लोग अग्नि में गेहूँ और जौ की बालियों को भूनते हैं। जिसके पश्चात् वो भुना हुआ बीज आगे उत्पत्ति नहीं कर सकता। उसी प्रकार जब व्यक्ति में ज्ञान की पराकाष्ठा हो जाती है, जब उसे सत्य-असत्य, पाप-पुण्य की समझ मिल जाती है तो सर्वप्रथम वो ईश्वरीय ज्ञान और योग की अग्नि में अपने मन के सभी विकारों, वासनाओं, अवगुणों, बुराइयों का दहन करता है अर्थात् उसे इस हद तक नष्ट कर देता है कि वो दुबारा उसके भीतर न पनप सके। नये जीवन का हो आरंभ… कई लोग होलिका दहन को संवत जलाना भी कहते हैं अर्थात् पुराने युग की समाप्ति और नये युग का आरंभ अर्थात् पुराने तमोप्रधान विकारी जीवन की समाप्ति और नये सतोप्रधान निर्विकारी सुंदर जीवन का आरंभ। अर्थात् होली का त्योहार कलियुग के अन्त और सतयुग के आदि के संगम की याद दिलाता है क्योंकि तब ही परमपिता परमात्मा शिव ने अवतरित होकर ज्ञान होली खेली और आत्माओं ने उनके साथ मंगल मिलन मनाया। इसलिए कुछ लकडिय़ां और उपले जलाकर हम होली न मान लें बल्कि योगाग्नि में अपने पुराने व बुरे संस्कारों को खत्म करें और अब से श्रेष्ठ कर्म करना शुरू करें। ईश्वरीय सत्य प्रेम का रंग लगायें जब हम ज्ञान और गुणों से सम्पन्न होते हैं तो एकअलौकिक आनंद की अनुभूति होनी शुरु हो जाती है, ईश्वर से सर्व सम्बन्ध का अनुभव होने लगता है और उनके सच्चे और असीम प्रेम का रंग आत्मा पर ऐसा चढ़ता है जो कभी छूटता नहीं। जिसके लिए भक्ति में गायन है कि क्रऐसी रंगो चुनरिया कि फिर रंग न छूटे, धोबिया धोये चाहे सारी उमरियाञ्ज। ऐसा मानव स्वयं तो उस रंग में रंग ही जाता है किंतु वो जिससे भी मिलता है उसे भी वो उस रंग में रंग देता है। वो सारे गिले-शिकवे, नफरत और बुरी स्मृतियों को भूल सबसे मंगल मिलन मनाता सबके जीवन में सच्चा प्रेम, गुण और सुख लाने का माध्यम बनता है। इसी की याद में इस त्योहार पर एक-दूसरे से मिलकर उन्हें गले लगाते हुए रंग-बिरंगे रंग लगाने की प्रथा चली आ रही है। लेकिन ये केमिकल वाले रंग तो हमारा नुकसान भी कर सकते हैं, हमें गंदा ही करते हैं जिसे फिर रगड़कर छुड़ाना भी पड़ता है जो बहुत ही तकलीफदेह होता है। और रंग लगाने के बहाने लोग गलत कृत्य करने से भी बाज नहीं आते। फिर ऐसा रंग लगाने का क्या औचित्य! रंग तो वो लगे कि सारा जीवन ही रंग जाये अर्थात् सारे दु:खों से दूर ईश्वरीय प्रेम में आनंदमय हो जाये। मीठे मन, वचन और कर्म की दें मिठास जब मानव ईश्वरीय प्रेम में रंग जाता है, हर पल आनंद की स्थिति में होता है तो उसके मन, वाणी और कर्म का सारा कड़वापन समाप्त हो जाता है, जीवन में मिठास घुल जाती है। वो फिर जिससे भी मिलता है या जो भी उसके पास आता है उसे उसके मीठे बोल से, उसके मीठे व्यवहार से, मीठे कर्म से सुख-शांति की प्राप्ति होती है और वो भी अपने जीवन की सारी कड़वी यादों और दु:खों को भूल आनंद की अनुभूति करता है। इसी की याद में इस त्योहार पर सभी तरह-तरह के मीठे पकवान, स्वादिष्ट मिठाइयां और सूखे मेवे खाते और एक-दूसरे को खिलाते हैं। साथ ही इस दिन वैष्णव लोग झूले में श्री कृष्ण की झाँकी सजाते हैं और उसके दर्शन करते हैं। वास्तव में इसका अर्थ है कि जो मनुष्य स्वयं को ज्ञान के रंग में रंगता है और सच्चा वैष्णव(सम्पूर्ण अहिंसक) बनता है, उसकी आँख तो इस कलियुगी दुनिया से हट जाती है और वैकुण्ठ पर ही लगी रहती है। वह स्वयं भी ज्ञान-आनंद के झूले में झूलता है, उसे फिर कोई भी विषय-विकार अपनी ओर नहीं खींचते। हो-ली के रूप में मनायें होली… परमात्मा कहते हैं, अपने अंदर के सारे विषय-विकार, घृणा-द्वेष मिटा दो। अब तक आपने जो बुरा किया या आपके साथ जो बुरा हुआ, उन सबको ‘हो-ली’ अर्थात् समाप्त हो चुकी, ऐसा समझकर ईश्वरीय ज्ञान-योग-प्रेम के रंग में स्वयं को होली(पवित्र) बनाकर फिर होली मनाओ।

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