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भोपाल: दादी प्रकाशमणि जी कि स्मृति दिवस

*विश्व में शांति स्थापना का कार्य सही मायने में ब्रह्माकुमारी बहनों द्वारा ही हो रहा है*

दुख और अशांति का कारण है आपसी मतभेद और धर्म की लड़ाई- ब्रह्माकुमारी नीता दीदी जी*

मनुष्यों के बीच रहते मनुष्य मात्र की सेवा करना सबसे बड़ा तपस्या का प्रताप है*

भोपाल ,मध्य प्रदेश। प्रतिवर्ष अगस्त की 25 तारीख को ब्रह्माकुमारीज़ की द्वितीय मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि जी कि स्मृति दिवस को *विश्व बंधुत्व दिवस* के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देश विदेश के ब्रह्माकुमारीज से जुड़े सभी भाई-बहने अपनी प्यारी मीठी दादी को याद कर उनके प्रति अपने श्रद्धासुमन रूपी पुष्प अर्पित करते हैं, मौन में रहकर उनके कर्तव्यों एवं की गई सेवाओं का स्मरण हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत में दादी प्रकाशमणि जी का जीवन परिचय देती 10 मिनट की डॉक्यूमेंट्री सभी को दिखाई गई, इसके पश्चात ब्रह्माकुमारी पूनम दीदी द्वारा दादी जी के संक्षिप्त परिचय के साथ कार्यक्रम की भूमिका सर्व के समक्ष रखी गई। उन्होंने बताया की दादी प्रकाशमणि जी ने न केवल भारतवर्ष में अपितु पूरे विश्व की हर आत्मा को एक धागे में पिरोने का भागीरथी प्रयास किया इसीलिए उनकी अव्यक्ति तिथि को विश्व बंधुत्व दिवस के रूप में मनाया जाता है। गायत्री शक्तिपीठ से पधारे श्री अशोक सक्सेना जी ने अपना वक्तव्य गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करते हुए कहा कि दादी प्रकाशमणि जी का जीवन इतना श्रेष्ठ था कि उसकी महिमा किया जाना संभव नहीं है, उनके विषय में जो कुछ भी कहा जाए वह सूरज को दिया दिखाने समान होगा। आगे उन्होंने कहा कि आज के दिन दादी जी के जीवन से प्रेरणा लेकर हम अपने अंदर बैठे हुए दुशासन दुर्योधन रूपी विकारों को बाहर निकाले, मानवीय गरिमा के अनुकूल अपना जीवन जिए और भारत को देवभूमि स्वर्ग बनाएं। 

आचार्य डॉ श्री नीलिंप त्रिपाठी जी ने बताया कि बिना ज्ञान के मुक्ति संभव नहीं है और ज्ञान से ही पवित्रता, सरलता, निश्चलता आती है और इससे ही जीवन में रस आता है। मनुष्य का मन ही बंधन और मुक्ति का कारक है। उन्होंने आगे बताया कि यह नेत्र खुद नहीं देख रहे, पैर खुद नहीं चल रहे अंदर से कोई उन्हें देखने और चलने का आर्डर करता है तो जब तक खटका ऑन है तब तक यह जीवन है इसलिए जब तक जीवन है तब तक आनंद से रहिए, प्रसन्न रहिए और प्रसन्नता बाटिए।

श्री विनोद गौतम जी और भिक्षुणी संघमित्रा जी ने भी इस दिवस के अनुरूप दादी प्रकाशमणि जी के समक्ष के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए एवं विश्व में बंधुत्व भाव का वास हो ऐसी शुभकामना करते हुए अपनी वाणी को विराम दिया। 

उनके पश्चात महामंडलेश्वर श्री अनिलआनंद जी ने कहा की धरती पर मां साक्षात ईश्वर का दूसरा रूप होती है, जिसकी सेवा करना अर्थात ईश्वर की प्राप्ति करना। आपने दादी प्रकाशमणि जी एवं ब्रह्माकुमारीज़ की महिमा करते हुए कहा कि यहां रहने वाले बहनों और भाईयो द्वारा मनुष्य और प्रकृति की सेवा जा रही है। तपस्या के लिए घर बार छोड़कर जंगल में जाना दूसरी बात है परंतु मनुष्यों के बीच रहते मनुष्य मात्र की सेवा करना सबसे बड़ा तपस्या का प्रताप है। ब्रह्माकुमारीज के सेवा केंद्र मंदिर समान हैं जहां ब्रह्मचारिणी एवं पवित्र दीदियां निवास करती हैं जिन्होंने अपना जीवन इतना सरल एवं सहज बनाया है कि उनको देखकर ही अलौकिक आनंद एवं वात्सल्य की अनुभूति होती है। आगे उन्होंने कहा कि आजकल का युवा इतना बुद्धिजीवी हो गया है की साइंटिफिक प्रूफ के बगैर वह धर्म को भी स्वीकारना नहीं चाहता। जहां ब्रह्माकुमारीज़ के सेवा केंद्रों में इसी ज्ञान को बहुत लॉजिक एवं मेडिटेशन के द्वारा सिखलाया जाता है और जो भी यह ज्ञान लेता है वह प्रकृति और मनुष्य मात्र की सेवा अर्थ ही लगता है। अंत में उन्होंने अपनी वाणी को विराम देते हुए कहा कि अगर विश्व में शांति स्थापना करने का कार्य सही मायने में कहीं हो रहा है तो वह ब्रह्माकुमारी बहनों द्वारा ही हो रहा है।

भोपाल दक्षिण पश्चिम क्षेत्र के विधायक श्री भगवान दास सबनानी जी ने आदरणीय नीता दीदी जी को अपनी बड़ी बहन मानते हुए कहा कि वह बुलाएं और मैं ना आऊं ऐसा नहीं हो सकता। आगे उन्होंने कहा की दादी प्रकाशमणि जी के जीवन से प्रेरणा लेकर हम अपने जीवन में बहुत सकारात्मक बदलाव, सुधार ला सकते हैं एवं दूसरों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन सकते हैं।

कार्यक्रम को आगे बढ़ते हुए ब्रह्माकुमारी साक्षी दीदी द्वारा सभी को राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास कराया गया जिससे पूरे सभागार में अलौकिक शांति का वातावरण बन गया एवं सभी ने अखंड शांति का अनुभव किया।

सेवाकेंद्र के वरिष्ठ भ्राता ब्रह्माकुमार राम भाई जी ने दादी प्रकाशमणि जी के जीवन के पन्नों को पलटाते हुए कुछ स्मृतियां अनुभवों के रूप में सभा के समक्ष रखें। अंत में सेवाकेंद्र की प्रभारी राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी नीता दीदी जी ने सभी अतिथियों एवं श्रोतागण को धन्यवाद दिया और सर्व के समक्ष अपने आशीर्वचन रखते हुए कहा कि आज दुख और अशांति का कारण है आपसी मतभेद और धर्म की लड़ाई। अगर हम यह समझ जाएं कि हम एक ही पिता की संतान आपस में भाई-भाई हैं तो सच्ची सुख, शांति,प्यार और सहयोग की भावना स्थापित हो सकती है और यही शिक्षा इस ईश्वरीय घर में दी जाती है।

कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों एवं श्रोतागण ने अपने श्रद्धासुमन दादी प्रकाशमणि जी के प्रति अर्पित किए, तत्पश्चात ब्रह्मा भोजन ग्रहण कर विदाई ली।

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