स्वतंत्रता के इतिहास का अध्याय बड़ा ही कठिन रहा है। इस दौर को शब्दों में बयाँ करना एक आम व्यक्ति के वश की बात नहीं है, क्योंकि सभी उस समय की परिस्थिति और मनोस्थिति से वाकिफ नहीं है। स्वतन्त्रता संग्राम के वीरों का इतिहास अपने आप में एक चिरंतन छवि को लिए हुए है। हमें और देशवासियों को उन सपूतों पर गर्व है जिन्होंने भारत को परतंत्रता से मुक्त किया।
ऐसे भारत माँ के सपूतों के शौर्यबल, बुद्धिबल के लिए आदर से ससम्मान हम सभी देशवासिायों का सर झुक जाता है। उनके त्याग और बलिदान के कारण ही आज हम गर्व से छाती चौड़ी करके चलते हैं। जिनकी याद मात्र से ही देशभक्ति का जोश दिल में उभर उठता है और हम सभी का हौसला बढ़ता है। आज़ादी की 79 वीं वर्षगाँठ हम सभी मना रहे हैं। ऐसे समय में हम सभी को सम्पूर्ण आज़ादी की सोच को उत्पन्न करने की ज़रूरत है, जो हमारी कल्पना बन कर ही रही हुई है और वह यह है – ”जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिडिय़ाँ करती थीं बसेरा वो भारत देश था मेरा” इसी को साकार करने के लिए हम सभी चरित्र और पवित्रता के बल को बढ़ाना होगा।

आज भी हम जब बापू गांधी जी को याद करते हैं तो उनके तीन बंदर जो बुरा न सुनो, बुरा न देखो, बुरा न बोलो की अद्भूत सोच को नमन करते हैं। परन्तु इनके साथ-साथ अगर बुरा ना सोचो भी जोड़ दिया जाए तो देश को आगे ले जाने में वा तरक्की करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। क्योंकि मनुष्य की सोच ही उसे अर्श पर बिठाती या फर्श पर गिराती है।
वास्तव में सम्पूर्ण स्वतन्त्रता तो इस वर्तमान परदिृश्य में किसी को भी प्राप्त हो नहीं सकती। जरा-मृत्यु, रोग-शोक, विवाद-विक्षप्ती, अन्याय-आतंक, असमर्थता-अशान्ति आदि-आदि से किसी न किसी क्लेश के परतन्त्र होकर हरेक मनुष्य पीडि़त है। सच्ची और सम्पूर्ण स्वतन्त्रता वह है जिसमें मनुष्य को किसी भी प्रकार का कष्ट, क्लेश कठिनाई या दु:ख और अशान्ति न हो। ऐसी सच्ची और सम्पूर्ण स्वतन्त्रता का दूसरा नाम ”मुक्ति और जीवनमुक्ति” है। ‘मुक्ति’ का अर्थ है देह-बन्धन से, भव-बन्धन से, कर्म और उसके फल से, जन्म और मृत्यु से सम्पूर्ण मुक्ति। जब मनुष्यात्मा इन सभी बन्धनों को काटकर ब्रह्म्मलोक, परलोक अथवा परमधाम में विश्रामी होती है, तब उसकी दु:ख से न्यारी अवस्था को ‘मुक्ति’ कहते हैं। वहाँ चूूंकि आत्मा को न काया प्राप्त है न माया ही प्रभावित करती है, इसलिए वहाँ वह सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त है। इसलिए ‘परमधाम’ को मुक्तिधाम या निर्वानधाम भी कहा जाता है।
जीवनमुक्तिधाम इससे भिन्न है। ”जीवनमुक्त” वह अवस्था है जिसमें मनुष्य को तन तो प्राप्त है परन्तु किसी भी प्रकार का दु:ख नहीं है और किसी भी परिस्थितियों का उनपर प्रभाव नहीं है। आत्मा की ऐसी अवस्था स्वर्ग अथवा वैकुण्ठ में होती है। वहाँ न जन्म दु:ख से होता है, न देहावासन की पीड़ा होती है, न तन का रोग सताता है, ना मनुष्य को शत्रु का भय दु:खित करता है, न किसी पदार्थों की कमी होती है, न ही मनुष्यों का मन किसी बुराई के बन्धन में होता है। मनुष्यात्मा को यह अवस्था जिस स्वर्गलोक अथवा वैकुण्ठ में प्राप्त होती है, वह लोक इस पृथ्वी से ऊपर कहीं नहीं है, बल्कि इस महान भारत भूमि पर ही जब सतयुग में नर-नारी अपने दिव्य गुणों से युक्त जीवन के कारण श्री नारायण और श्री लक्ष्मी के समान या देवताओं के समान होते है तब यही देश ”स्वर्ग” होता है। ऐसी सच्ची और सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जिसे मुक्ति और जीवनमुक्ति कहा जाता है। ऐसी स्वतन्त्रता सदा मुक्त, सर्व शक्तिमान, सर्व हितकारी शिव परमात्मा ही दिला सकते है।
गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर आप देखेंगे कि देशवासियों के चारित्रिक पतन से ही देश का पतन हुआ है। जब तक पतन के इस चरित्रहीनता रूपी मुख्य मूल कारण का निवारण नहीं करते, तब तक हमारे सभी उपाय धरे के धरे रह जाएंगे, हमारी कोई भी योजना देश का उत्थान करने में सफल कभी नहीं होगी। चरित्रहीनता क्या है? आज के मनुष्यों में व्याप्त काम, क्रोध, लोभ, मोह और देह अहंकार, इन पांच विकारों रूपी माया का ही दूसरा नाम है। संसार की हरेक समस्या, चाहे व्यक्तिगत हो,चाहे सामाजिक, राष्ट्रीय हो या अन्तरर्राष्ट्रीय, उसका मूल कारण पाँच विकार ही हैं। जब तक विकार रहेंगे, समस्याएं रहेंगी और जब तक हम समस्याओं के अधीन है तब तक पराधीन ही हैं। जब हम ”स्व” अर्थात् अपनी इंद्रियों पर ‘राज्य’ कर सकेंगे, तभी देश में भी सच्चा स्वराज्य स्थापित हो सकेंगा। कृषि, उद्योग एवं अन्य सभी क्षेत्रों में भी सही ढंग से उन्नति तभी हो सकेंगी जब पहले मनुष्यों के चरित्र का उत्थान होगा। चरित्र ही समृद्ध राष्ट्र की नींव है और पवित्रता ही सुख-शांन्ति की जननी है। चरित्र निर्माण के बिना राष्ट्र निर्माण की बात सोचना रेत की नींव पर किला खड़ा करने की तरह व्यर्थ है। इसलिए हम जिस रामराज्य की कल्पना करते हैं उसको साकार करना चाहते हैं तो पहले स्वयं पर राज्य करने में सक्षम होने की तथा आत्मनिर्भर होने की ज़रूरत है, तभी हम स्वतन्त्रता के साथ न्याय कर पाएंगे।
-बी. के. दिलीप भाई शांतिवन।




