मुख पृष्ठलेखभारत की सतयुग से कलियुग तक की दिव्य यात्रा…

भारत की सतयुग से कलियुग तक की दिव्य यात्रा…

भारत की आध्यात्मिक परम्परा केवल इतिहास नहीं, एक गहन चेतना यात्रा है, आत्मा की यात्रा। इस यात्रा में आत्मा सतोप्रधान से तमोप्रधान बनते हुए चार युगों का अनुभव करती है। यही उत्थान से पतन तक की वह कहानी है जिसे सृष्टि चक्र कहा जाता है।

सतयुग – पूर्णता का स्वर्णिम युग सृष्टि का आरम्भ सतयुग से होता है। यहाँ हम सभी आत्माएं सतोप्रधान पूर्णत: पवित्र, शांत और दिव्य गुणों से भरपूर थीं। इसलिए इस युग को स्वर्ण युग कहा जाता है। इस समय एक धर्म, एक राज, एक भाषा और एक संस्कृति थी। किसी प्रकार का दु:ख, भय, क्रोध, विवाद या असुरक्षा नहीं थी। आत्माएं अपने दिव्य स्वरूप में रहते हुए 8+12= 20 जन्म तक पूर्णता का अनुभव करती हैं। प्रकृति भी पवित्र और मनुष्य भी पवित्र -इसीलिए इसे देवताओं की दुनिया कहा गया है।

2. त्रेतायुग – दिव्यता का क्रमिक क्षरण जब आत्मा की पवित्रता में थोड़ा-सा ह्रास आता है तो सतयुग से त्रेता युग प्रारम्भ होता है। यहाँ आत्माएं सेमी सतोप्रधान कहलाती हैं। दिव्यता तो रहती है पर पूर्णता का प्रतिशत थोड़ा कम हो जाता है। इस युग में भी हम 12 जन्म लेते हैं। त्रेता को चाँदी युग माना गया है – जहाँ सुख, शांति और समृद्धि तो है पर स्वर्णिम पूर्णता का चमक थोड़ा मंद पड़ चुका होता है।

3. द्वापर युग – अध्यात्म से धर्म की ओर परिवर्तन यही वह समय है जब आत्मा की शक्ति में गिरावट और देह अभिमान की शुरुआत होती है। अब ‘आत्मा’ की जगह ‘धर्म’ प्रमुख हो जाता है और नयी-नयी मत और मान्यताएं उदय होने लगती हैं। द्वापर के साथ ही भक्ति युग आरम्भ होता है। अब मनुष्य पवित्रता खोते हुए यह अनुभव करने लगता है कि जीवन में कोई परम शक्ति है जिसे पाने के लिए पूजा-पाठ आवश्यक है। द्वापर और कलियुग मिलाकर हम आत्माएं 63 जन्म लेती हैं।

4. कलियुग – तमोप्रधान अवस्था का चरम कलियुग वह समय है जब आत्मा का तमोप्रधान स्वरूप चरम पर पहुंच जाता है – अशांति, भय, दु:ख, संघर्ष, असुरक्षा, आपसी ईष्र्या, क्रोध और विकारों का विस्तार बढ़ता जाता है। प्रकृति में भी असंतुलन आता है और मनुष्य की चेतना भी भारी और कमज़ोर हो जाती है। इसीलिए संसार के सभी धर्मग्रंथ बताते हैं कि कलियुग के अंत में परम परिवर्तन आवश्यक हो जाता है।

5. संगमयुग – परमात्मा का दिव्य अवतरण कलियुग के अंत और सतयुग के आरम्भ के बीच जो लगभग 100 वर्षों का छोटा-सा काल है, वही पुरूषोत्तम संगम युग है। यही युग वह पवित्र समय है जब परमात्मा स्वयं अवतरित होते हैं- पतित आत्माओं को पावन बनाने, उन्हें सतोप्रधान स्वरूप में वापस ले जाने और नयी सृष्टि – सतयुग की स्थापना करने।

इसी काल में राजयोग की शिक्षा के माध्यम से मनुष्य आत्मा को उसकी वास्तविक पहचान, शक्ति और दिव्यता से पुन: जोड़ दिया। भारत की यात्रा केवल चार युगों की कहानी नहीं बल्कि आत्मा के उत्थान-पतन और पुन: स्थापना का चक्र है। संगमयुग वह दिव्य समय है, जब परमात्मा मनुष्य को फिर से देवत्व का अधिकारी बनाते हैं ताकि सतयुग का स्वर्णिम राज्य पुन: स्थापित हो सके।

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