मुख पृष्ठब्र. कु. सूर्यअमरत्व की ओर ले जाने वाला महापर्व शिवरात्रि

अमरत्व की ओर ले जाने वाला महापर्व शिवरात्रि

अंधेरे में मनुष्य सही दिशा में नहीं चल सकता। अगर चलने की कोशिश भी करेगा तो भटकेगा और ठोकर भी अवश्य खायेगा। तो रात्रि का सम्बन्ध यहाँ रोज़ होने वाली रात्रि से नहीं है परंतु अज्ञान की रात्रि से है। हम कहते हैं- हे प्रभु! आओ हमें सत्य राह दिखाओ, सद्बुद्धि दो जिससे हम जीवन में ठोकरें खाने से बच जायें। यही तो हम कामना करते हैं परमात्मा से। अब वो आकर क्या करता है जो हमें जाने-अनजाने में चाहे शास्त्रों से, चाहे यहाँ पंडितों से जो सुना है, भाव भले सही हो लेकिन उससे मिल भी नहीं सके और अंधेरे से मुक्त भी नहीं हो सके और न ही कुछ प्राप्ति हुई। तो सही अर्थों में जानें इस महान पर्व के पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्य को।

भगवान को याद करना, उसको बुलाना, उसकी ओर निहारना, ये बहुत ही सहज रूप से चला आता है। जब किसी मनुष्य पर कोई मुसीबत आती है, जब उसे कोई सहारा नज़र नहीं आता, जब उसके जीवन में दु:ख बहुत बढ़ जाते हैं, निराशाओं की काली रातें उसको कुछ भी मार्ग देखने नहीं देती, जब सफलता उससे दूर जाती है, जब परिवारों में अनहोनी घटनाएं घटने लगती हैं तब लोग उसे प्यासी नज़रों से निहारते हैं, याद करते हैं, बुलाते हैं, हे भगवान! आओ मदद करो। देखो इसमें बुलाने में कितना अपनापन है। मदद भी उससे ही मांगी जाती है जो मदद कर सकता हो।

भारत में श्रीमद्भगवद् गीता में भी और रामचरित्र मानस में भी ये लिख दिया है कि जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, तब-तब भगवान आते हैं और अधर्म का विनाश करते हैं, दु:खों की समाप्ति करते हैं, असुरों का संहार करते हैं। भिन्न-भिन्न बातें हैं। धर्म की पुनस्र्थापना करते हैं, भक्तों की, पुन: आत्माओं की, अच्छे लोगों की रक्षा करते हैं। तो वो एक मान्यता चली आ रही है। लोगों को ये पूर्ण विश्वास रहता है कि वो आयेगा ज़रूर। वो आता है, वो मदद अवश्य करता है।

दूसरी बात आप देख लीजिए भारत में हमारे यहाँ दो-तीन बातें प्रसिद्ध रूप से प्रचलित हैं, गायन है उनका, हे प्रभु! मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। ये लोग शास्त्रों अनुसार भक्ति में गायन करते रहते हैं। किसी भी विशेष कार्य से पहले ये मंत्र है कि ”तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय”। तो कैसा अंधकार है? क्या है ये अंधेरा?

तो देखिए लोग शास्त्र पढऩे से पहले भी कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। शास्त्र पढऩे के बाद, भक्ति करने के बाद पुन: यही गायन करते हैं, इसका अर्थ है कि अभी प्रकाश में गये नहीं हैं। अंधकार ही अंधकार है। ये कैसा अंधकार है? दो तरह का अंधकार है मनुष्य के अन्दर। ये बाहरी अंधकार की बात नहीं कि रात हो गई है, दिन छिप गया है, अंधेरा हो गया है हमें प्रकाश जलाना है, लाइट जलानी है, अपने घर को रोशन करना है, ये तो कॉमन बातें हैं। लेकिन एक है मनुष्य के अन्दर अज्ञान का अंधकार, और दूसरा है विषय-विकारों का घोर अंधेरा। अज्ञान, कैसा अज्ञान? मनुष्य ये नहीं जानता कि मैं कौन हूँ, मेरी शक्तियाँ क्या हैं, मेरे मूल संस्कार क्या हैं, मेरी प्युरिटी क्या है, मैं सृष्टि के आदि में किस स्वरूप में थी, भगवान कौन है, उससे मेरा क्या नाता है, मुक्ति और जीवन मुक्ति क्या है, राजयोग का पथ क्या है, भगवान के मिलने का मार्ग कौन सा है और उससे मिल करके क्या मिलता है। क्यों मिले हम उसे, क्यों हम उसे याद कर रहे हैं, सृष्टि का आदि-मध्य-अन्त क्या है, किसने ये संसार रचा है, क्यों रचा है, कब रचा था, उसके पीछे रचने वाले का उद्देश्य क्या था, ये माया है, मुक्त अवस्था किसे कहते हैं, स्वर्ग किसे कहते हैं, इसके बारे में मनुष्य को ज्ञान नहीं है। इसको कहते हैं सम्पूर्ण अज्ञान।

इस अज्ञान के कारण ही पाप कर्मों के कारण, क्योंकि कर्मों का भी गुह्य ज्ञान मनुष्य को नहीं है। पाप को लोग पुण्य समझ रहे हैं। पुण्य से दूर होते जा रहे हैं, कर्मों की गुह्य गति का भी किसी को भी पता नहीं है, ये अज्ञान है, ये अंधकार है। इसके लिए ही प्रार्थना की जाती है कि ”हे प्रभु! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो”। ये नहीं कहते कि शास्त्र पढऩे से, उपनिषद पढऩे से, वेद पढऩे से हम अंधकार से प्रकाश की ओर चले जायेंगे। ये नहीं कहते हे प्रभु! हमें ले चलो। तो प्रभु को आना पड़ता होगा ना!

इसी की यादगार में तो शिवरात्रि मनाई जाती है। बस यही रहस्य शिवरात्रि के सम्बन्ध में हम सभी के सामने स्पष्ट करना चाहते हैं, प्रत्यक्ष करना चाहते हैं। ताकि सभी पुन: अंधकार से प्रकाश की ओर चलें। केवल गाने से तो काम नहीं चलेगा, केवल पढऩे-लिखने से तो अंधकार दूर नहीं हो सकता, तो भगवान को आना पड़ता है, अंधकार में। ये रात्रि कोई ये रोज़ होने वाली रात्रि या दिन की बात नहीं है वो तो रोज़ हो रही है। रोज़ सूर्य उदय होता है, प्रकाश फैलता है, दिन निकल आता है, सूरज अस्त होता है, अंधकार छाने लगता है, रात्रि हो जाती है। हम सभी विश्राम में चले जाते हैं। ये क्रम तो सतत् चलता आता है। लेकिन संसार में अज्ञान का अंधकार छा गया है।

आज चारों ओर देख लीजिए, किसी को भी अध्यात्म का, स्वयं का, अपने परमपिता का कोई भी ज्ञान नहीं रहा है। इसलिए भौतिकता की ओर लोग बढ़े जा रहे हैं। भिन्न-भिन्न तरह की विद्याएं, भिन्न-भिन्न तरह की एजुकेशन, भिन्न-भिन्न तरह की डिग्रीयां चारों ओर दी जा रही हैं। एजुकेशन बढ़ती जा रही है लेकिन फिर भी अंधकार भी उतनी ही तेजी से बढ़ता जा रहा है। तो क्या इस भौतिक ज्ञान ने, क्या इस शैक्षणिक ज्ञान ने मनुष्य के अंधकार को दूर नहीं किया! आज तो मनुष्य सोचता है वो पहले की भेंट में ज्य़ादा बुद्धिमान है, आप इस बात से सहमत होंगे। आज कोई भी अपने को कम बुद्धिमान नहीं मान रहा है। जिसके पास जितनी ज्य़ादा डिग्रीयां हैं, ज्य़ादा एजुकेशन है वो अपने को उतना ही ज्य़ादा बुद्धिमान मान रहा है, परंतु क्या इन सबसे मनुष्य रियल में ज्ञानवान, बुद्धिवान, बना है? क्या उसको सद्विवेक प्राप्त हुआ है? क्या उसको सद्बुद्धि मिली है? क्या उसके कर्म सुधरे हैं? तो वास्तव में ये रात्रि अज्ञान की रात्रि है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments