श्रीमद्भगवद् गीता से लेकर महाभारत शिवपुराण, रामायण, यजुर्वेद, मनोस्मृति सभी में कहीं न कहीं परमात्मा के अवतरण की बात कही गई है। किसी भी धर्म ग्रन्थ में परमात्मा के जन्म लेने की बात नहीं है। हर जगह प्रकट होने, अवतरण, परकाया प्रवेश की बात को ही इंगित किया गया है। क्योंकि परमात्मा का अपना कोई शरीर नहीं होता है। वह परकाया प्रवेश कर नई सतयुगी सृष्टि की स्थापना का दिव्य कार्य कराते हैं। यहाँ तक कि शिव पुराण में स्पष्ट लिखा है कि ब्रह्मा के ललाट में प्रकट होऊंगा।
भारतीय आध्यात्मिक साहित्य पुराण, उपनिषद और गीता अनेक स्थानों पर यह संकेत देता है कि परमात्मा निराकार, अजन्मा और अविनाशी है। वे सृष्टि के चक्र में किसी मानव शरीर का जन्म नहीं लेते, बल्कि आवश्यकता पडऩे पर परकाया प्रवेश अर्थात् किसी मनुष्य देह को माध्यम बनाकर अवतरित होते हैं। उनका आगमन देहधारी जन्म नहीं, बल्कि प्रकाश का अवतरण है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध वचन – ”यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…” इस सत्य को गहराई से दर्शाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर बार-बार जन्म लेते हैं, बल्कि यह कि जब धर्म की हानि होती है तब ईश्वर प्रकाश मानव माध्यम में उतरकर धर्म की स्थापना करते हैं। गीता की भाषा में इसे अवतार कहा गया है, परंतु उसका मूल स्वरूप ज्ञान प्रकाश ही है।
परमात्मा ने श्रीमद्भगवद् गीता के 9वें अध्याय के 11वें श्लोक में कहा है कि अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं, तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतममहेश्वरम।। अर्थात् मनुष्य तन का आश्रय लेने वाले मूढ़मति लोग मुझे नहीं जानते हैं। यद्यपि मैं महेश्वर(परमात्मा) हूँ, तो भी व्यक्त भाव वाले मुझे नहीं पहचान सकते। मूढ़मति से तात्पर्य है कि जो परमात्मा के बताए सत्य ज्ञान को स्वीकार नहीं करते।
इस प्रकार शास्त्र और पुराण संकेत देते हैं कि परमात्मा का अवतरण निराकार ज्योति स्वरूप, परम प्रकाश और ज्ञान के अविर्भाव के रूप में होता है। उनका कार्य है – परिवर्तन, पवित्रीकरण और नई दिव्य दुनिया की स्थापना।
मैं साकार लोक में सत् धर्म की स्थापना करने आता हूँ… यदि भक्ति से भगवान मिलते तो फिर परमात्मा को यह बात क्यों कहनी पड़ती कि वत्स तू मन को मुझमें लगा…
मूढ़मति लोग मुझे नहीं जानते… +

- रामायण में लिखा है कि बिनु पद चलइ, सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।। आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बक्ता बड़ जोगी(शिव के लिए)।। वह निराकार परमात्मा(ब्रह्मलोक निवासी) बिना पैर के चलता है, बिना कान के सुनता है, बिना हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, फिर भी हज़ारों भुजा वाला है। बिना मुँह के सारे रसों का आनन्द लेता है और बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है। वही हमारा परमात्मा राम है।
- मनोस्मृति में भी यही लिखा है कि सृष्टि के आरम्भ में एक अंड प्रकट हुआ, जो हज़ारों सूर्य के समान तेजस्वी और प्रकाशमान था।
- महाभारत में लिखा है कि सबसे पहले जब यह सृष्टि तमोगुण और अंधकार से अच्छादित थी तब एक अंडाकार ज्योति प्रकट हुई।और वह ज्योतिर्लिंग ही नये युग की स्थापना के निमित्त बना। उसने कुछ शब्द कहे और प्रजापिता ब्रह्मा को अलौकिक रीति से जन्म दिया। सभी वेद और शास्त्रों में कहीं न कहीं परमात्मा के अवतरण की बात कही गर्ई है।
परमपिता परमात्मा निराकार, ज्योति बिंदु स्वरूप और सर्वश्रेष्ठ चेतन सत्ता हैं। वे जन्म-मरण के बंधन में नहीं आते और किसी भौतिक शरीर में निवास नहीं करते। उनके वास्तविक निवास स्थान को परमधाम, शांतिधाम या निर्वाणधाम कहा गया है। यह स्थान प्रकाश और शांति की पराकाष्ठा है। जहाँ समय, गति और परिवर्तन का प्रभाव नहीं। सभी आत्माएं भी मूल रूप से वहीं निवास करती हैं और सृष्टि चक्र के अंत में वहीं वापसी करती हैं। यही परमात्मा का अनादि, अविनाशी घर है।
कहाँ है परमपिता परमात्मा का निवास स्थान
सृष्टि को समझाने के लिए तीन लोकों का वर्णन आता है – परम लोक, सूक्ष्म लोक और साकार लोक।

परम लोक(परमधाम)- यह परमात्मा और आत्माओं का मूल वास, स्थान है। यहाँ केवल लाल सुवर्ण प्रकाश, पूर्ण शांति और निश्छलता है। न कोई शब्द, न शरीर, न गति – केवल ऊर्जा का शांत अस्तित्व। परमात्मा यहीं से कल्प-कल्प में सृष्टि चक्र को दिशा देते हैं।
सूक्ष्म लोक(सूक्ष्मधाम)- यह मध्य लोक है, जहाँ देह नहीं होती, परंतु विचार रूप शरीर होता है। इसे देवी-देवताओं का सब्टल प्लेन(सूक्ष्म तल) कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर की स्थितियां भी इसी लोक में मानी जाती हैं। यहाँ दृश्य रूप होते हैं, परंतु भौतिकता नहीं होती।
साकार लोक(भौतिक जगत)- यह पृथ्वी वह आधारित जगत है जिसमें मनुष्य शरीर धारण करके कर्म करते हैं। यही कर्मभूमि है और इसी पर जन्म-मरण का चक्र चलता है। परमात्मा निराकार होते हुए भी सृष्टि चक्र के संधिकाल में मनुष्यों को ज्ञान देने आते हैं, परंतु उनका मूल निवास परम लोक ही है – शांति, प्रकाश और शक्ति का स्रोत।
शिव पुराण में कोटि रूद्र संहिता के 42वें अध्याय में लिखा है कि मैं ब्रह्मा जी के ललाट से प्रकट होऊंगा। समस्त संसार को दु:खों से मुक्तकरने और नवयुग की आधारशीला रखने के लिए परमात्मा शिव ब्रह्मा जी के ललाट में प्रकट हुए। और उनका नाम रूद्र हुआ। यहाँ ललाट से तात्पर्य ज्ञान से है। परमपिता शिव परमात्मा ज्ञान का सागर है तो हम आत्माएं उनकी संतान ज्ञान स्वरूप हैं। ज्ञान को शक्तिभी कहा जाता है। जब परमात्मा ब्रह्मा जी के तन का आधार लेकर सच्चा गीता ज्ञान देते हैं। उस ज्ञान को धारण करने वालों में दिव्य परिवर्तन आता है और दैवी साम्राज्य की स्थापना होती है।



