मुख पृष्ठलेखसत्यम-शिवम्-सुन्दरम का मर्म

सत्यम-शिवम्-सुन्दरम का मर्म

हमेशा ये शब्द पूरे संसार में लोग अपने परमात्मा को उसके भावों को बताने के लिए एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं कि वो ही सत्य है, वो ही शिवम है, वो ही सुन्दर है। लेकिन आज हम इसके भावार्थ को समझते हैं…

सत्यम् का भाव- जो सत्य है वो शांत है। और सत्य चाहे वो व्यक्ति है, वस्तु है, चाहे संसार है, चाहे समाज है और चाहे परमात्मा है, अगर वो सत्य है तो शांत होगा और शाश्वत भी होगा। लेकिन कहा जाता है कि जो इन आँखों से दिखाई देता है चाहे व्यक्ति है, चाहे समाज है वो नश्वर है। ये नश्वरता सत्य है, ये भी हमको जानना आवश्यक है। सत्य का अर्थ हुआ कि ”है और हमेशा है” उसके जानने के बाद क्या-क्या सत्य है, हमारा मन शांत हो जाता है। जब हम असत्य हैं, परेशान हैं, अशांत हैं, तो इसका अर्थ है हम सत्य नहीं, हम शांत नहीं। इसलिए सत्य की पहचान है प्रेम, शांति, और आनंद।

शिवम् का भाव- कहा जाता है जो हमारे साथ होता है वो कल्याणकारी ही है। लेकिन ये बात हमारे अन्दर बैठे कैसे? इसके लिए बहुत प्रयास की आवश्यकता है। इसलिए शिव का शाब्दिक अर्थ और भावार्थ कल्याणकारी के साथ जोड़ा जाता है। परमात्मा हमें सिखाते और कहते भी कि जो हमारे कर्म, जो हमारी सोच रही है उसी का परिणाम हमारे साथ चलता है। लेकिन वो कल्याणकारी ही है, उसमें कुछ राज़ है, कुछ रहस्य है वे जानने के बाद मन अशांत नहीं होगा। आराम से परिस्थितियों से बाहर निकल आता है। यही कल्याणकारी भाव हमेशा रहे, सदा रहे इसलिए सदा शिव भी कहते हैं परमात्मा को। जैसे वो सदा कल्याणकारी है ऐसे हम भी सदा कल्याणकारी रहें। कल्याणकारी सोच के साथ जीयें और भावों पर अमल करें।

सुन्दरम् का भाव- आपने छोटे बच्चों को देखा होगा वो सत्य है ना इसलिए सुन्दर लगते हैं। उनके अन्दर किसी के प्रति कोई भी दुर्भावना नहीं होती। उनको वैसे भी लोग परमात्मा का रूप कहते हैं, ईश्वर का रूप कहते हैं। इसका अर्थ क्या हुआ कि अगर हम निरन्तर सत्यता के साथ जीयें, कल्याणकारी भाव रखें, सबके बारे में शुभ सोचें, बोलें, भेदभाव से मुक्त रहें तो हम भी दिव्यता से सम्पन्न दिखेंगे। एक अलौकिक आभा हमारे ऊपर भी दिखाई देगी। क्योंकि हम सभी आत्माएं परमपिता परमात्मा की संतान हैं जैसे परमात्मा सत्य है, सुन्दर है, कल्याणकारी है वैसे हम भी होंगे। इस आध्यात्मिक जीवन यात्रा में इसको अपनाने मात्र से समाज में अमूल-चूल परिवर्तन आयेगा और लेागों के अन्दर भाव बदलेंगे। अत: जीवन का सच्चा उद्देश्य है सत्य को जानना, शिव को पहचानना और सुन्दरता को अपनाना। यही आध्यात्मिक यात्रा है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है। जब हर आत्मा इस सत्य को स्वीकारेगी, तब ही पृथ्वी पर स्वर्णिम युग अर्थात् नई सृष्टि की स्थापना होगी। सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्- यही परमात्मा की सच्ची पहचान है और यही जीवन का परम उद्देश्य।

संसार विविधताओं का बहुरंगी रूप है। इसमें धर्म, भाषा, संस्कृति को देखना और उसका चिंतन करना एक सुन्दरता को इंगित करता है। जीवन एक सीधी रेखा नहीं है। उसमें विविधता है, उसमें एक रिदम है इसीलिए संसार सुन्दर है।

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