बाबा एक तो ज्ञानसूर्य है, दूसरा ज्ञान का सागर है। बाबा ज्ञान सूर्य है तो प्रकाश भी देता और कीचड़ा भी भस्म करता है। मुझे क्या करना है, वो समझ देता है – यह हुआ प्रकाश। जैसे सन-बाथ(सूर्य-स्नान) सब बिमारियों को खत्म करता है। तो हम सन-बाथ कैसे करेंगे? सनबाथ लेना है तो कपड़े उतारेंगे ना, तब तो सनबाथ लेना है तो अशरीरी होना है, जिससे अन्दर से सारे जम्र्स खत्म हो जायें। सन-बाथ लेते हैं तो सारा शरीर लाल-लाल हो जाता है क्योंकि डायरेक्ट सूरज की किरणें शरीर पर पड़ती हैं। ऐसे यहाँ भी बाबा के सामने एकदम अशरीरी होकर बैठना चाहिए, तो पता चल जाता है कि अन्दर जो बिमारी थी वो निकल गई इसलिए ज्ञान सूर्य बाबा से खूब अच्छी तरह से सकाश लो, न सिर्फ रोशनी, पर उसकी शक्ति डायरेक्ट अन्दर जाती है तो पुराना सब ऑटोमेटिक खत्म होता है। लेकिन यह ढीले-ढीले पुरूषार्थ से नहीं होगा।
कई कहते हैं हम तो बहुत अच्छा पुरूषार्थ करते हैं। यह भी जैसे अपने आपसे ठगी करते हैं, बाबा से भी ठगी करते हैं। पुरूषार्थ में दिखाते कुछ और हैं, होता कुछ और है इसलिए कम-से- कम पुरूषार्थ में ठगी मत करो। जैसा बाबा मेरा सत्य है, सच है, वैसा मैं हूँ? यह अपने आपको अच्छी तरह देखो। सेवा तो हुई पड़ी है, हो जाएगी, कोई बड़ी बात नहीं है। परन्तु अपने को सच्चा बनाना- ये बड़ी बात है। इसमें सूक्ष्म पुरूषार्थ की जरूरत है। आत्मा के चित्त की स्मृति को समर्थ बनाने की जरूरत है। लक्ष्य और लक्ष्य-दाता की याद कभी भूले नहीं। क्या बनना है, बनाने वाला कौन है? यह पक्का याद रखना है तभी तो लक्ष्य हमारे स्वरूप में आ जायेगा।
ज्ञान और योग की ताकत से हम कमल फूल समान न्यारे रह सकते हैं। स्व का दर्शन, परदर्शन और पर-चिंतन से छुड़ाता है। स्व-दर्शन के बिगर पर-दर्शन, पर-दोष से छुटकारा हो नहीं सकता है। इसके लिए स्व पर और पढ़ाई पर अच्छी तरह से ध्यान देना है। बाबा कहते हैं अच्छे बच्चे जो होते हैं- वो सारा दिन बाबा की बातों का सिमरण करते हैं कि बाबा ने क्या कहा? बाबा जो कहता है वही मन में, पुरूषार्थ में चलता है और कुछ नहीं चलता है।
मनमत क्या होती है – यह हमको अनुभव ही नहीं है। मेरा विचार ऐसा है… यह संकल्प भी कभी नहीं आया होगा। जो श्रीमत है, उस पर चलने के लिए सखा रूप से नेचुरल रहेहैं। सखा को समानता में रहना शोभता है। मीठा बाबा कहता है – पुरूषार्थ करते रियलाइज़ेशन से अन्दर ही अन्दर अपने अभिमान को खत्म करो। पहले तो अन्दर से यह इच्छा हो कि अभिमान को खत्म करना है। सच्ची दिल से पुरूषार्थ क्या होता है? यह गहराई से बुद्धि में स्पष्टीकरण हो। बाकि किसकी गलती है या नहीं है उसमें हमारा क्या जाता है, बाबा जाने वो जाने… हमारे से कोई गलती न हो। दूसरे को शिक्षा देना छोड़ दो। जो ह्रश्वयारे मीठे बाबा की शिक्षाएं हैं वो अपने जीवन में हो। औरों के लिए क्या, सबके लिए शुभ चिंतक रहना, किसी के लिए कभी निराश नहीं होना, हमेशा शुभ-भावना से सहयोग देना। यह बहुत सूक्ष्म ध्यान रखना माना अपने को शुद्ध आत्मा, पुण्य आत्मा, महान आत्मा, धर्म आत्मा बना देना, इसके लिए दिल से सच्चा पुरूषार्थ करते रहो, बस। इसमें विघ्न आयेंगे तो निराश नहीं होना, ढीले नहीं पडऩा। जो ऐसा अपने ऊपर ध्यान रखता है वह व्यर्थ ख्यालातों से मुक्त हो मनमनाभव सहज हो जाता है।




