प्रश्न : मेरा नाम तरुणा है। मेरे जीवन में मैंने बहुत असफलताएं देखी हैं। छोटेपन में मेरी ममी और फिर दादी जी एक्सपायर हो गईं। मेरा पढऩे का मन बहुत था लेकिन आर्थिक समस्या के कारण मैं पढ़ नहीं पाई। अभी भी मैं पढऩा चाहती हूँ, कुछ बनना चाहती हूँ। लेकिन पिता जी मेरी शादी कर देना चाहते हैं। तो ऐसे समय पर मैं क्या करूँ?
उत्तर : पिता भी अपनी जगह सही हैं। वो भी सोचते हैं कि वो अपनी जि़म्मेदारी पूर्ण कर दें। शादी करके वो मुक्त हो जाएं। दो बातें हैं कि या तो इसमें इतनी पॉवर हो कि वो कहे कि मुझे तो तीन साल पढऩा है। अन्यथा शादी के बाद भी वो अपनी पढ़ाई चालू रख सकती हैं। उनसे बात कर लें पहले ही। दोनों ऑह्रश्वशन हैं इनके पास। इसे इसमें घबराने की कोई बात नहीं। लेकिन रोज़ सवेरे उठकर ये आधा घंटा मेडिटेशन ज़रूर करें। ताकि इनकी जो मनोरथ है वो पूर्ण हो। कई बार बच्चों के साथ ऐसा होता है कि वो योग्य हैं, वो पढऩा चाहते हैं और उनको पढऩे नहीं दिया जा रहा है तो भी वो डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। और उनका भविष्य का जीवन खुशियों से भरा नहीं होता। इसीलिए मैं पैरेंट्स को ये कहना चाहता हूँ कि समाज क्या कहेगा ये सोचने की बजाए अगर बच्ची की इच्छा है, उसकी खुशी है पढऩे में तो उसे ज़रूर पढ़ाना चाहिए।
प्रश्न : मेरा योग नहीं लगता है और मेरी बुद्धि में हमेशा एक भारीपन सा रहता है। मुझे कुछ सूझता भी नहीं है कि मैं क्या करूं। मेरी ये जो भी समस्या है, कैसे मैं इससे मुक्त होऊं?
उत्तर : जिसने अपनी बुद्धि में बहुत गंदगी भर ली है। उसकी बुद्धि हमेशा बहुत भारी रहती है। गंदगी माना निगेटिव थिंकिंग, वेस्ट थिंकिंग, दूसरों के प्रति घृणा दृष्टि, दूसरों की गंदगी अपनी बुद्धि में रख लेना। व्यर्थ जिसने भर लिया उसका मन भारी रहेगा। उसको एक जो खुशी होती है ना जैसे पक्षियों की खुशी गायन है कि खुले आकाश में विचरण करते हैं, ऐसी होगी नहीं। और योग का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इनको हमेशा ऐसी चीज़ों को अवॉइड करना चाहिए। अब ये संकल्प कर लें कि अगर मुझे इन चीज़ों से बचना है, जीवन को योग युक्त बनाना है और भारीपन समाप्त करना है तो एक-एक चीज़ पर दृष्टि डालें। मैं कितना परचिंतन करता हूँ, अब से नहीं। मेरा जीवन दूसरों के चिंतन में नष्ट न हो जाए। तो अन्दर का भारीपन एकदम हल्का होने लगेगा। मुझे दूसरों को देखकर जिसे परदर्शन कहते हैं अपने भविष्य को बिगाडऩा नहीं है। मुझे तो अब ईश्वरीय ज्ञान मिला है, अब अपने को देखने का मौका है। युगों से दूसरों को देखते आये, अब अपने को देखूं। ऐसे ही दूसरों के अवगुण चित्त में रख लिए हों उसको समाप्त करें, कुछ पास्ट में बुरे कर्म कर दिए हों वो शिव बाबा को समर्पित करें। लिख दें कागज पर। बाबा के आगे रख दें कि ये आपको अर्पित हैं, मुझे इनसे मुक्त कर दो और हल्का फील करें अपने को। भले ही वो कागज पीछे जला दें। इस तरह से इन्हें अपने ब्रेन को खाली करना होगा। यानी व्यर्थ से खाली। तब इनके मन में हल्कापन आयेगा। तभी इनकी पॉवर ऑफ विज़ुअलाइज़ेशन बढ़ेगी और योग के फील्ड में ये सफल होंगी।
प्रश्न : हम जितनी मेहनत करते हैं उतना फल नहीं मिल पाता। हमेशा हम पीछे रह जाते हैं, क्या करें?
उत्तर : ऐसा कुछ विद्यार्थियों के साथ, कुछ बिज़नेसमैन के साथ होता रहता है कि मेहनत बहुत हो रही है और सफलता नहीं मिल रही है। इसके पीछे उन्हें अपनी ह्रश्वयुरिटी ऑफ माइंड पर बहुत ज्य़ादा ध्यान देना होगा। विचार उनके शुद्ध हों और कर्म उनके श्रेष्ठ हों। चलो पीछे तो जो कुछ हो गया हो उसको तो हम फुलस्टॉप लगाएंगे। लेकिन अब से एक सुन्दर कर्म और सुखदायी कर्म ये कहूँगा मैं ऐसे लोगों को कि सबकी दुआएं लेना प्रारम्भ करें। ऐसा व्यवहार रखें, ऐसे बोल बोलें, ऐसे कर्म करें कि उनके मात-पिता की, उनके बुज़ुर्गों की, उनके और साथी हैं गुड ब्लेसिंग्स उनको मिलती रहे, उनकी उनको बहुत ज़रूरत है। इन्हें थोड़ा राजयोग अभ्यास कर लेना चाहिए। एक घंटा रोज़ सवेरे उठकर सात बार याद करना चाहिए। जिन्हें सफलता को प्राप्त करना है वो सवेरे उठकर सात बार याद करें- मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ। सफलता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है। गुड फीलिंग के साथ। सफलता मिलेगी और एक बहुत सुन्दर विज़न भी बनाएं अपनी सफलता का। 21दिन तक ये अभ्यास लगातार करें और ये जो संकल्प हैं ये तो रोज़ ही करने चाहिए। नहीं तो मनुष्य को उठते ही निगेटिव संकल्प आएंगे कि अरे मुझे सफलता नहीं मिलती। मेरा शायद भाग्य ही खराब है। मैं तो बहुत मेहनत करती हूँ। तो इन संकल्पों को घटाने के लिए भी ये संकल्प आवश्यक हैं सवेरे-सवेरे। मैं तो भगवान की संतान हूँ। मेरा तो पिता ही भाग्यविधाता है। तो वो मेरा भाग्य श्रेष्ठ क्यों नहीं बनाएगा। मेरा बहुत अच्छा भाग्य है, मुझे सफलता मिलेगी। तो हम बहुत सुन्दर वायब्रेशन क्रिएट करने लगें रोज़ सवेरे तो ये हमारी सफलता को प्रभावित करेगा।




