मुख पृष्ठदादी जीदादी हृदयमोहिनी जीड्रामा के राज़ को यथार्थ समझने से हलचल में नहीं आयेंगे

ड्रामा के राज़ को यथार्थ समझने से हलचल में नहीं आयेंगे

तीन बार ओमशान्ति कहने से सारा ज्ञान बुद्धि में आ जाता है। बाप भी याद आ गया, दादा भी और तीसरा ड्रामा भी। इस ड्रामा के ज्ञान के बिना भी हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं, अचल, अडोल नहीं रह सकते हैं। कभी कोई भी ऐसा विघ्न आता है, पता नहीं मेरा आगे क्या पार्ट है? मैं चल सकूँगी या नहीं चल सकूँगी…। अभी तो मैजारिटी को निश्चय हो गया है कि हम ही थे, हम ही हैं और हम ही होंगे, यह पक्का है ना! जब संगठन में रहते हैं तो कई छोटी-मोटी बातें तो आती रहेंगी, कोई भी बात आवे, माया का काम है हिलाना। लेकिन मम्मा कहती थी, माया का काम देख करके आप अपना काम क्यों भूल जाते हो? हमारा काम क्या है? हिलना या माया को हिलाना? अभी हम सारे ड्रामा को जानते हैं, कभी भी कोई दिलशिकस्त हो तो ड्रामा को याद करे मैं थी, मैं हूँ और मैं ही बनूँगी, इसलिए बाबा ड्रामा को भी याद दिलाता है। कोई भी हलचल आवे तो हलचल में नहीं आना लेकिन ड्रामा के राज़ को समझ करके अचल हो जाना।

हम देवता हैं, यह पक्का है ना आपको? यह भूलना नहीं कि मैं देवता की आत्मा थी, अब चक्कर लगाके फिर वही बन रहे हैं, मनुष्य से देवता। तो इस नशे में रहने से मैं आत्मा हूँ, मैं फरिश्ता हूँ और फिर देवता हूँ। जो बाबा सिखाते हैं, बीच-बीच में उसका अभ्यास करते रहो तो कभी कोई भी खिटखिट हमारे सामने आएगी तो यह अभ्यास हमको हिलाएगा नहीं। अभी संस्कार का टक्कर जब होता है तो अवस्था बदल जाती है ना। देवता बनना है तो अपने संस्कारों के ऊपर ध्यान दो। तो यह सब बातें जो हैं वो हमारी परिवर्तन होनी चाहिए। तो संस्कार परिवर्तन के ऊपर आप सबका अटेन्शन है? बाबा ने कहा है फरिश्ते जैसे संस्कार, देवता जैसे संस्कार हमको धारण करने हैं, तो हमारी अवस्था सदा दिलखुश रहे और खुशी ही सबको बांटते रहें। टक्कर को भी खुशी में बदल दो, जिससे टक्कर हो उसे भी योग की किरणें दे करके बदलना है।

दादी जी के जीवन की विशेषता एक लाइन में सुनायें तो मैंने देखा कि बाबा का कहना और दादी का करना क्योंकि दादी ने बचपन से बाबा के मुख से जो निकला वो प्रैक्टिकल किया है। ड्रामा अनुसार चांस भी मिला है। समय प्रति समय जो बाबा के डायरेक्शन निकले, उस अनुसार दादी ने वह सेवा की है, यह दादी की स्पेशल विशेषता रही है। दूसरा- हर आत्मा के प्रति बहुत कल्याण की भावना रही। चाहे ब्राह्माण हो, चाहे बाहर वाला हो लेकिन हर आत्मा के लिए कल्याण की भावना रही, इसका भी कल्याण हो, सबका कल्याण हो। बाबा कहते कल्याणकारी बनो उसी अनुसार कर्म भी हो, संकल्प भी हो और प्रैक्टिकल भी हो। दादी जो भी संकल्प करती, उसको करके ही छोड़ती। तो यह दादी की विशेषता हमको करना है, बाबा ने जो आज की मुरली में कहा वो सारे दिन में करना ही है, इसको कहते हैं आगे बढऩा और आगे बढ़ाना।

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