हम सभी महर्षि पतंजलि के योगासन, योगा पद्धति को सुनते आये हैं। जिसमें उन्होंने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि इन आठ तरह के प्रकारों की बात की। और ये आठों तरीके जो दुनिया में अपनाए गए, उसमें से सभी ने उन दो चीज़ों को पकड़ा जो उनके कम्फर्ट में थी – एक था यवासन, दूसरा था प्राणायाम। बाकी जो 6 चीज़ें थी उनको छोड़ दिया। अब अगर कोई व्यक्ति पूरी तरह से सारी चीज़ें फॉलो करे तब तो प्राप्ति हो ना!
तो यम का मतलब ये होता है, दुनिया में यम के लिए कहा जाता है कि अमृतवेले में, या सुबह-सुबह अपने आप को उठाना और नियम प्रमाण सारे कर्म करना। फिर उसके बाद आसन करना, फिर प्राणायाम करना, फिर प्रत्याहार माना इन्द्रियों पर संयम रखना, तो ध्यान लगेगा, तो धारणा होगी फिर हम समाधि वाली स्थिति में आयेंगे। ये है क्रम वार तरीका, अपने आपको उस योग पद्धति में ढालने का, जो महर्षि पतंजलि ने बताया। अब आज की दिनचर्या में ये दोनों चीज़ें नदारद हैं। न कोई सुबह जल्दी उठता है और ना ही कोई नियम प्रमाण सारे कर्म करता है। प्रत्याहार की तो बात ही भूल जायें, क्योंकि इन्द्रियों पर संयम तो ऐसे लगता है कि जैसे कोई पहाड़ तोडऩे जैसा है। और ध्यान, धारणा और समाधि ये हमारे लिए नदारद है। तो जब ये सारी चीज़ें नहीं होगी तो हमारे को लाभ पूरी तरह से योग का कैसे होगा!
इसीलिए कोई भी गुरु ने जो कुछ सिखाया हमें वो कभी गलत नहीं सिखाया। लेकिन उसका तरीका अपनाने का हमारा गलत रहा। इसी बात को ब्रह्माकुमारीज़ जब बताती है तो किसी से किसी को अलग करके नहीं बताती, उस बात को सही तरीका देने की, सही भाव देने की कोशिश करती है। कहती है कि सबसे पहले आप ब्रह्ममुहूर्त में उठो, उसके बाद परमात्मा को याद करने की कोशिश करें नियम प्रमाण, जो भी नियम बताए जाते हैं। फिर थोड़ा-सा अपने आपको स्ट्रेच करो, आसन करो, प्राणायाम करो ताकि शरीर स्वस्थ रहे। फिर प्रत्याहार करो, जिसमें भोजन से लेकर संयम की बात की जाती है, फिर ध्यान लगेगा, परमात्मा को याद करने में आसानी होगी। फिर हमारे अन्दर जितने गुण, शक्तियां हैं उनकी धारणा होगी। फिर हम अच्छे बन जायेंगे।
आप देखो, क्रराजयोग बनाम अष्टांग योगञ्ज ये क्या हैं? ये एक-दूसरे के पूरक ही तो हैं। लेकिन अन्तर केवल ये है कि इसमें सबसे पहले मन को जीतना सिखाते हैं, मन पर नियंत्रण सिखाते हैं, मन को दिशा देते हैं कि कैसे करना है, कैसे नहीं करना है। मन में वो सारी चीज़ें डालते हैं जो हमारे लिए रुकावट हैं, जो मनुष्य करने में असक्षम है। देखो, हमारे पास समय बहुत है, लेकिन जब हम उठेंगे ही आठ बजे तो हमारे लिए सारी चीज़ें बेकार हो जाती हैं, व्यर्थ हो जाती हैं। इसलिए परमात्मा ने टाइम हमारा बचाया और कहा कि सुबह-सुबह उठेंगे तो फ्रेश मूड रहेगा। फ्रेश मन से आप सबकुछ कर सकते हैं और आपको अच्छा भी लगेगा। इसीलिए राजयोग कम्पलीट योग पद्धति है जिसमें सारे योग समाहित हैं। जिसमें हमको एक-एक कर्म का राजा बनाया जाता है। एक-एक इंद्रिय का राजा बनाया जाता है। एक-एक स्थिति का राजा बनाया जाता है। ये नहीं कि राजयोग केवल योग है। लेकिन आपको हर कर्म का, हर स्थिति का, हर नियंत्रण का, हर चारों तरफ होने वाली घटनाओं का राजा, राजा मतलब साक्षीदृष्टा भाव से हर कर्म करता है फिर उसको भूलता है। ऐसे ही हम मन को समझ गये, चित्त को समझ गये, बुद्धि को समझ गये, रिलेशन को समझ गये, साथ-साथ हमारे शरीर में क्या घटना घट रही है, कैसी स्थिति बन रही है, वो सब समझ गये तो योग लगाना आसान हो गया ना!

इसलिए योग, राजयोग में पूरा इन्द्रिय संयम से लेकर परमात्मा के साथ जुड़ाव की स्थिति है। जब ये सब होगा तब जाके हमारे अन्दर पॉवर आयेगी। जैसे दुनिया में कहा जाता है ना कि कोई गुरु भी किसी को मंत्र देता था ना तो कहता था कि थोड़े-थोड़े दिन में मुझे सुनाओ कि आपने ये जो कर्म किया है ठीक किया है, कि नहीं किया। वैसे ही जब ये सारी चीज़ें परमात्मा को बार-बार हम बताते हैं रोज़, क्लास होती है रोज़, बताया जाता है कि हम कहाँ सही हैं, कहाँ गलत हैं, तो हम और इम्प्रूव करते हैं। अब एक बार हमको किसी ने बता दिया लेकिन अगर उसमें हम रोज़ चेंज नहीं कर रहे हैं, रोज़ अपने आपको अपग्रेड नहीं कर रहे हैं तो बोरियत होती है ना, इसीलिए थोड़े दिन बाद वो सारी चीज़ें छोड़ देते हैं। इसीलिए रोज़ दिनचर्या में, प्रतिदिन हमको ये सारी चीज़ों को ढालना पड़ता है। इससे जो स्थिति बनती है उस स्थिति में हमको हमारी उन्नति फील होती है। इसीलिए राजयोग कम्पलीट योग है। इस योग को करने के बाद कुछ भी बचता नहीं है। सब हमारा एक-दूसरे के साथ समाहित हो जाता है। लगता है कि हम कम्पलीट कर्म कर रहे हैं। तो करें राजयोग, रहें निरोग।





