मुख पृष्ठदादी जीदादी प्रकाशमणि जीलाइट बन लाइट की दुनिया में रहने का अभ्यास करो तो मैंपन...

लाइट बन लाइट की दुनिया में रहने का अभ्यास करो तो मैंपन स्वत: समाप्त हो जाएगा

बाबा कहते मैं आया हूँ तुम बच्चों को अपने समान विदेही बनाने। दूसरा – बच्चे मैंपन को त्यागो। जहाँ मैं है उसे छोड़ बाबा-बाबा करो। हम निमित्त हैं। तीसरा – अपने कैरेक्टर्स पर ध्यान दो क्योंकि तुम्हें देवता बन स्वर्ग का मालिक बनना है। तो हर एक चेक करें कि हमारे मन में कहाँ तक शुद्ध संकल्प चलते हैं? कहाँ तक हम मन का मालिक राजा बन, मन वज़ीर को बाकायदे शुद्ध संकल्पों में, मनन चिंतन में रखते हैं? या मैं-मैं के देह अभिमान में व्यर्थ संकल्प चलते हैं? स्व के बदले पर को(दूसरे को) देखते, सोचते, संकल्प करते या ज्ञान सागर बाप के ज्ञान के खज़ाने का मनन करते हैं? मन के संकल्प सर्व प्राप्तियों में मगन रहते हैं? सर्व प्राप्तियों के खज़ानों को पाकर अपार खुशियों में रहते हैं?

मन के संकल्प पॉजि़टिव चलते या निगेटिव चलते? हर प्रकार के निगेटिव थॉट्स को परिवर्तन कर पॉजि़टिव सोचो। जितना-जितना पॉजि़टिव सोचेंगे उतना मन की शुद्धि होती जाएगी, एकाग्रता बढ़ती जाएगी। पॉजि़टिव में भी स्व का ङ्क्षचतन विशेष करना है। पर को देखने के बदली स्व को देखो। आप यह कभी नहीं सोचो कि मैं सेवाधारी हूँ, परन्तु आप ईश्वरीय सेवाधारी हैं। तो हमारा हर संकल्प, हर बोल, हर कदम सेवा में है या ईश्वरीय सेवा में है? यदि मैं सेवा में हूँ तो भी कहीं देह अभिमान या मैंपन आ जाता है। लेेकिन मैं हूँ ही ईश्वरीय सेवा पर तो मेरा जो भी खाता है वह बाबा की दरबार में जमा है। तो हर एक अपना ईश्वरीय खाता चेक करो।

बाप को प्रत्यक्ष करने के लिए हमें स्वयं में क्या धारणा करनी है? कई बार बाबा ने मुरली में कहा है तुम्हारा संकल्प, बोल, तुम्हारा चेहरा ही बाप का साक्षात्कार कराएगा। यह बहुत बड़ी जि़म्मेदारी बाबा ने हम सबको दी है कि तुम्हें बाप को प्रत्यक्ष करना है, उसके लिए खुद को देखो कि मैं बाप समान सम्पन्न बना हूँ? बाप समान सम्पन्न बनना माना ही सर्व विघ्नों से ऊपर निर्विघ्न अवस्था बनाना। सम्पन्न बनने का अर्थ है कि सर्व कमियों-कमज़ोरियों को समाप्त करना है। जैसे पढ़ाई में परीक्षा के दिन होते तो होशियार स्टूडेंट का लक्ष्य होता है कि मुझे फस्र्ट डिवीजन में पास होना है, पास विद ऑनर बनना है। जब हम पास विद ऑनर्स हों तब तो धर्मराज की सजाओं से मुक्त हों। धर्मराज बाबा हमारा स्वागत करे। बाबा हमें अपनी भुजाओं में वेलकम करे। बाबा कहे ओ मेरे समान बच्चे! आओ।

हर एक अपने आपको इतनी ऊंची दृष्टि से देखो कि बरोबर हम ऊपर में बाबा के साथ फरिश्तों की दुनिया में उड़ रहे हैं। नीचे में आकर, व्यक्तियों को देख व्यक्तित्व में अपना समय, शक्ति खर्च नहीं करो। यह बहुत बड़ी सूक्ष्म स्थिति बनाने की चैलेंज बाबा ने हमें दी है। कोई भी बात व्यक्त में आकर करेंगे तो जैसे पत्थर तोड़ेंगे लेकिन ऊपर से उड़ जाओ तो सभी बातें सहज ही क्रॉस हो जायेंगी माना निवारण हो जायेंगी। जितना भी टाइम साइलेन्स में बैठो उतना समय गहरा अनुभव करो कि हम इस देह से परे उड़ गये हैं। उडऩा माना विदेही बन फरिश्तों की दुनिया में पहुँच जाना। जितना लाइट बन लाइट की दुनिया में, फरिश्ते स्थिति में रहने का अभ्यास करेंगे उतना ऑटोमेटिक मैंपन निकल जायेगा। और जितना यह अभ्यास करेंगे उतना जो भी कोई कमज़ोरी होगी, अपवित्रता के संस्कार आदि जो भी कुछ हैं वह सब खत्म हो जायेंगे।

अभी सबको यही शुभ संकल्प करना है कि 1. मुझे बाबा के समान सम्पन्न फरिश्ता बनना है। 2. हमें इस विश्व की स्टेज पर अपने चलन, चेहरे, संकल्प, बोल से बाबा को प्रत्यक्ष करना है। हमारे वायब्रेशन ऐसे हों जो सभी कहें कि आप धन्य हैं। आप लोगों को भगवान ने ही पढ़ाया है और पढ़ा भी रहा है। यह संस्था देहधारियों की नहीं है, यह संस्था गुरु-चेलों की नहीं है परन्तु सभी ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियां परमात्मा से पढ़ाई पढ़के परमात्म प्यार में लवलीन होने वाले हैं। हमें यह बहुत नशा है कि हम इस संगम पर कितने लक्की हैं, कितने महान भाग्यवान हैं जो वरदाता बाप ने हमें सर्व वरदानों से भरपूर किया है। लोग कृपा मांगते, हमें तो पल-पल कदम-कदम पर बाबा वरदानों से भरपूर कर रहा है। तो क्या यह दिल में नहीं आता कि हम ऐसा भरपूर बन, परम आनंद का अनुभव करें। हम प्रभु को अर्पण हैं। कोई पूछे तो हम छाती पर हाथ रखकर कहते हैं कि हमने परमात्मा को पाया है। अब उसकी विदाई कर दो। अन्त में उसे मुँह झुका के ही जाना है। अभी तुम्हें जितना सामना करना है, कर ले, मैं तुम्हें पांव में झुकाने वाला हूँ। ऐसी नज़रें तेज़ हों, इन नयनों में बाबा की इतनी शक्ति भरकर रखो जो मज़ाल है यह नयन कहाँ नीचे देखें। कोई कभी कहता ज़रा दृष्टि चंचल होती है, तो हम कहती हूँ याद करो भगवानुवाच – हे मेरे नज़रों से निहाल होने वाले बच्चे। तो बोलो, हे पाण्डव इतनी शक्ति से भरपूर हो? हम निहाल हो गये। बाबा की नज़रों में हम हैं, हमारी नज़रों में तुम हो।चाहे कहाँ भी रहें, किधर भी रहें, कुछ भी मिले, कुछ भी खायें। ऐसी अपनी निहाल स्थिति हो।

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