मुख पृष्ठदादी जीदादी प्रकाशमणि जीहरेक सूक्ष्म कमज़ोरी के संकल्प को बाबा के सामने दान कर दो

हरेक सूक्ष्म कमज़ोरी के संकल्प को बाबा के सामने दान कर दो

बाबा हम बच्चों को कहता बच्चे तुम मेरे होलिएस्ट, हाइएस्ट और रिचेस्ट बच्चे हो। साथ-साथ हमको ऊंची चोटी पर ले जाने के लिए रोज़ बुद्धि की यह ड्रिल कराता कि बच्चे एक सेकण्ड में इस साकारी दुनिया से पार आकारी और निराकारी दुनिया में चले जाओ। ड्रिल करो – अभी-अभी साकारी, अभी-अभी आकारी और अभी-अभी निराकारी।

सेकण्ड में उड़ती कला का अनुभव करने के लिए बुद्धि इतनी हल्की हो जो किसी भी घड़ी इस देह से न्यारी बन जावे। बार-बार यह बात बाबा सुनाता है कि तुम अपने बुद्धि पर बोझ अनुभव नहीं करो। कार्य व्यवहार करो परन्तु अपने को मैं करता हूँ या मेरा यह काम है, यह मैं और मेरे का बोझ अपने सिर पर नहीं रखो। जिम्मेवार बाबा है, हम निमित्त उनकी श्रीमत पर चलते चलें।

समय तीव्र गति से चलता रहता, तो हमें भी ऐसा ही तीव्रगति से अपने को बाबा के इशारों अनुसार पुरुषार्थ करना है और पुरुषार्थ का लक्ष्य है सिर्फ स्वयं ही अटेन्शन रखो। अटेन्शन है तो बुद्धि सहज अनुभव करेगी, अटेन्शन होगा तो सम्पन्नता तक पहुंचने में मेहनत या बोझ अनुभव नहीं होगा। इसके लिए समय प्रति समय जो सम्पन्न बनने के लिए बाबा ने ईशारे दिए हैं वह याद रखो, उन पर मनन चिंतन करो।

सबसे पहले हर एक अपने आपसे पूछो कि स्वयं में फेथ है कि मैं पुरुषार्थ कर लास्ट सो फास्ट आऊंगा? मैं ही सम्पन्न बना था और बनूँगा? मेरे संस्कार कहा अथवा पुराने कोई भी बंधन हैं, मैं उन सब संस्कारों को, बन्धनों को पुरुषार्थ कर परिवर्तन कर सकता हूँ?

सूक्ष्म में भी यह संकल्प तो नहीं आता कि ऐसी स्थिति तो मेरे लिए बड़ी मुश्किल है! आज से हरेक इस सूक्ष्म कमज़ोरी के संकल्प को बाबा के सामने दान कर दो। जबकि बाबा कहता है तुम बच्चों से मेरा वायदा है कि तुम एक कदम आगे बढ़ो तो मैं दस कदम क्या 100 कदम आगे आऊंगा। ”हिम्मते बच्चे मददे बाबा।” तुम निश्चयबुद्धि बनो तो विजय अवश्य समाई हुई है।

सबसे पहला चाहिए स्वयं ही स्वयं पर सम्पूर्ण फेथ। फुल फेथ रखो तो बाबा की मदद ऑटोमेटिक मिलेगी। यह भी एक बहुत बड़ा वरदान मिल जाता। तो पहले स्वयं पर फेथ जो फिर बाबा के ऊपर फेथ हो। साथ-साथ यह भी फेथ चाहिए कि हम कल्प पहले वाले वही बाबा के बच्चे हैं जो कल्प पहले भी विजयी बने हैं, जिसका यादगार वैजयन्ती माला है।

बाबा ने हमें तीव्र पुरुषार्थ कराने लिए समय दिया है, जैसे यूनिवर्सिटी में भी टाइम होता कि यह कोर्स इतने समय में पूरा करना है फिर पेपर होगा। तो हमें भी बाबा सम्पन्न बनने के लिए टाइम देता है। फिर बीच-बीच में पेपर भी लेता है। उस पेपर में पास होने के लिए अमृतवेले जब उठते हैं तो अपनी सम्पन्नता की स्टेज को याद करो।

हमारे सामने सम्पन्नता की स्टेज है – ब्रह्मा बाबा। साकार में भी ब्रह्मा बाबा सम्पूर्ण बन प्रैक्टिकल में फरिश्ता स्थिति का हम सबको अनुभव कराते रहे और अभी उसी सम्पन्न फरिश्ता रूप से अव्यक्त वतन में भी हम बच्चों से रूहरिहान करते अथवा बाप-दादा मिलकर इस साकार दुनिया में भी आते। तो सम्पन्नता का एग्जांपल साकार है, साकार सो आकार बाबा, निराकार बाबा।

हमें भी ब्राह्मण सो फरिश्ता सो देवता बनना है। तो हमारी सम्पूर्णता के समीपता की स्थिति है कि पहले हम अपने को फरिश्ता बनावें। फरिश्ता अर्थात् जो इस देह और देह के बन्धन हैं, उन बन्धनों से मुक्त। जो भी पुराने संस्कार-स्वभाव हैं, दृष्टि वृत्ति है, वह सब हमारी परिवर्तन हो जाए। तो इन सबमें कितने परसेन्ट परिवर्तन हुआ है? मास्टर बन खुद ही खुद चेक करें क्योंकि यह पुराने स्वभाव-संस्कार ही हमारे बंधन हैं और इन्हों को परिवर्तन करना उसको ही कहेंगे बन्धनमुक्त अर्थात् जीवनमुक्त बनना।

सबसे पहले खुद से पूछना है कि इस जीवन में मैं आत्मा सभी सूक्ष्म व स्थूल बन्धनों से स्वतंत्र हूँ? मुक्त हूँ या मेरे संस्कार-स्वभाव जंजीर की तरह बन्धन में रखते हैं? ज़रा भी कोई बन्धन होगा तो कभी भी अतीन्द्रिय सुख का अनुभव नहीं होगा।

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