हमने नये वर्ष 2026 में प्रवेश किया। बहुत सारे हमने छोटे-छोटे लक्ष्य भी बनाए होंगे और उनको पूरा करने का जिम्मा भी लिया होगा। लेकिन कभी-कभी कोई न कोई ऐसी बात, कोई ऐसी परिस्थिति, कोई घटना, कोई जि़म्मेवारी बीच में आई और हमने उन आयामों को थोड़ा-सा विचार करके इधर कर दिया और फिर से पुराने ढर्रे पर आ गये। कहा जाता है कि किसी कार्य को जब हम तीन मास लगातार करते हैं तो हमारी जीवनशैली बन जाती है, हमारा लाइफ स्टाइल बन जाती है।
लेकिन अगर हम सभी अपने आप को अपने कुछ विचारों के पैमानों पर तोलेंगे, रख कर देखेंगे तो पाएंगे कि बहुत कुछ है जो हर बार पाँच दिन से ज्य़ादा नहीं चला, सात दिन से ज्य़ादा नहीं चला। तो इसमें हमको करना क्या चाहिए? क्योंकि कोई जरूरी नहीं है कि जो आपने शुरू किया वो पूरा ही हो जाए। क्योंकि उसमें दृढ़ता की शक्ति की आवश्यकता होती है, और दृढ़ता की परख केवल एक बात पर निर्भर है कि हमारा लक्ष्य कितना हमारे लिए हमेशा उजागर रहता है, जागरूक रहता है हमारे सामने। क्योंकि बाहर की दुनिया को हम माया कहते हैं और आस-पास बुद्धि में बहुत कुछ ऐसी बातें, नकारात्मक, व्यर्थ चल जाते हैं जो बाहर के समाचारों को देखकर चलते हैं। अब इसमें केवल एक बात आड़े आती है वो ये है कि अगर परमात्मा ने हमें सबकुछ बताया हुआ है कि आने वाले समय में समय बदलेगा, परिस्थिति बदलेगी, लोग बदलेंगे, कुछ ऐसी स्थिति आयेगी जिसमें हम ये वाले अभ्यास भी नहीं कर पाएंगे। तो क्यों न उस समय का हम लाभ उठाएं जो परमात्मा ने हमें दिया है। अभी इस समय जो बाबा ने हमें ये जो सबकुछ दिया तो बार-बार बोला कि अभी ये सारा कर ले नहीं तो फिर समय नहीं मिलेगा।
अब वही समय है एक तरह से कि बीच-बीच में सोशल मीडिया भी हमारे सामने आ जाती है, न्यूज़ भी आता है, भयावह समाचार भी आता है उससे मन और हिलता है। तो हमारा फोकस अभ्यास से हटकर उन चीज़ों पर चला जाता है जो स्थूल चीज़ें हैं, जिन्हें हम जुटाने की चीज़ें कहते हैं। आपको पता होना चाहिए जब वो चीज़ हमारे पास होगी तो वो यूज़ करेंगे कैसे? क्योंकि और भी संसाधन नहीं होंगे। और यूज़ करने वाले अगर थोड़े लोग हैं और चारों तरफ हाहाकार है तो आपको कैसा लगेगा! हम मानसिक रूप से विकसित हो जायेंगे। इसलिए समय की मांग ये है कि भले बीच-बीच में लक्ष्य टूटा हो, या कुछ छूट गया हो, तो इन तीन मास का जो हमारा लेखा-जोखा है उसको पुन: मूल्यांकन करके हमको उसके ऊपर आगे बढऩा चाहिए। और ये देखना चाहिए कि कौन-सा पुरुषार्थ हमें नीचे ले आता है, किस बात से मैं परेशान हो जाता हूँ अभी भी।
ऐसे कुछ उदाहरण के रूप में हम इसे ले सकते हैं कि अभी भी छोटी-छोटी बातों में मन दु:खी होना, खराब होना या व्यर्थ चलना, नकारात्मक चलना, बहुत सारी बातों को लेकर केवल स्थूल के आधार से। तो अगर स्थूल चीज़ों में, ग्रॉस चीज़ों में हमारा ध्यान रहता है तो हमेशा हम भारीपन और हलचल वाली स्थिति में दिखाई देते हैं। लेकिन अगर थोड़ा-सा इससे ऊपर उठकर देखेंगे तो आप पाएंगे कि ये चीज़ें केवल और केवल हमारे को मोह के साथ जोड़ती हैं, अटैचमेंट के साथ जोड़ती हैं। बाबा हमेशा कहते हैं कि हम सब मेहमान हैं और हमको सबकुछ छोड़कर एक दिन जाना है। सबकुछ माना सबकुछ। तो इंतजाम का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसमें थोड़ी भी हमारी बुद्धि जुड़ी हुई है तो यहाँ से छूटना तो हमें बहुत आसान नहीं लगेगा।
इसलिए समय की मांग ये है कि पुन: मूल्याकंन करके फिर से उन लक्ष्यों को अपने सामने लायें और पुरुषार्थ की तीव्रता लाकरके अपने उन लक्ष्यों को पुन: प्राप्त करें। दृढ़ता से उठें, जागरूकता को सामने रखें कि परमात्मा ने हमें यही कहा है कि आने वाले समय हमको फरिश्ता बनना है। तो उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए मुझे फिर से उठना होगा, समझना होगा खुद को और सबके सामने अपने आपको प्रूफ भी करना होगा। तो नये आयाम तय करें पुन: उन बातों को दरकिनार करें जो हमारे लिए बाधा हैं और फिर से तीन महीने का एक लक्ष्य बनाकर अपने जीवन को एक नई दिशा देकर ज्ञान-योग की ऊंचाई हासिल कर लें।




