हम जो कुछ देखते हैं, पढ़ते हैं, सुनते हैं, कोई सूचना के माध्यम से हमारे अन्दर रहती है। लेकिन अगर वो सूचना को थोड़ा व्यावहारिक रूप से प्रयोग में लाते हैं तो उसको हम ज्ञान या समझ कहते हैं। उदाहरण के लिए, जैसे आग जलाती है, पानी ठंडा होता है, ये लिखित है सूचनाएं। लेकिन जैसे ही आग में आपका हाथ जाता है तो गर्मी की वजह से लगता है कि हाँ, सच में आग जलाती है। वैसे ही पानी ज़रा ठंडा लगा, पीने से शीतलता आई तो हांजी पानी ठंडा होता है, ऐसा हम विश्वास कराते हैं। इसी विश्वास को समझ हम कहते हैं या उसका अनुभव होना अब हम बिना सोचे भी ये कह सकते हैं कि आग और पानी इस-इस नेचर के हैं।
ऐसे ही हम सभी को परमात्मा ने एक सूचनात्मक ज्ञान दिया, समझ दी, समझाया कि दो आइडेंटिटी या दो तस्वीरें हम लोग हैं एक आत्मा और एक शरीर। लेकिन ये सूचना ही रहे या केवल इसको हमने जानने तक सीमित रखा तो इस बात का अनुभव नहीं हुआ कि आत्मा अलग है और शरीर अलग है।
अब इसको हम सामान्य भाषा में समझते हैं। शारीरिक अनुभव क्या होगा? जैसे हम किसी को देखते हैं तो जो कुछ भी उसमें अपने शरीर माना अपने बाहरी आवरण से प्राप्त किया, अचीव किया है, और उसके द्वारा वो जाना जा रहा है, पहचाना जा रहा है। उसके द्वारा वो खुश होता है, नाराज़ होता है, तो ये इसकी बाहरी अनुभूति उसको शरीर के साथ जोड़ती है।

इसकी दूसरी तरफ जायें तो हम देखेंगे कि आत्मा शुरू से ज़ीरो रही है, बिन्दु रही है। उसको इस दुनिया में कुछ चाहिए नहीं वैसे। क्योंकि वो ज़ीरो माना सम्पूर्ण है। जो चीज़ सम्पूर्ण है उसको बाहरी अचीवमेंट से, बाहरी दिखावे से, बाहरी बातों से लेना-देना नहीं है। लेकिन लम्बे समय से इस बात का अनुभव हमें नहीं है। तो आज जो कुछ भी हम बाहर की चीज़ें देखतेे हैं या प्राप्त करते हैं या अटेन करते हैं तो उसके साथ खुद को जोड़ लेते हैं। तो जब उसकी तारीफ या बुराई होती है तो हमें बुरा या अच्छा लगता है। अब जब हम इसका अनुभव करेंगे तो उसके ऑरिज़नल फॉर्म के आधार से अनुभव करते हैं। मतलब मुझे अच्छा या बुरा नहीं लगेगा। मुझे कोई कुछ बोले ना बोले, मिले ना मिले, कोई मेरी तारीफ करे ना करे लेकिन फिर भी मैं उसी अवस्था में रहूँगा, उसको ही अनुभूति कहते हैं उसके ऑरिज़नल स्वरूप की। उदाहरण के लिए, एक साल का या दो साल का छोटा बच्चा उसको चाहे अच्छा बोलो, बुरा बोलो वो हँसता है, भूल जाता है क्योंकि वो उसकी ऑरिज़नल स्टेज है। इसलिए वो हमेशा प्यारा लगता है, खींचता है, आकर्षित करता है और उसकी बात भी हम मानते हैं। वो जो हमको इशारा करता है, हम करते हैं। वैसे ही तोतली भाषा में बात भी करते हैं क्योंकि उसको शरीर याद ही नहीं है। माना दूसरी आइडेंटिटी याद ही नहीं है कि मेरी कोई और भी पहचान है। लेकिन हम सबको ज्ञान मिलने के बाद भी वो केवल सूचना तक रह गई, जानकारी तक रह गई। उसको अनुभव बच्चे की तरह ना करके हम निमित्त भाव, निर्माण भाव नहीं ला पाते हैं। इसलिए लोगों को हम सभी से कुछ नहीं मिल रहा है। छोटी-छोटी बातों का तो हमें बुरा लग जाता है। अब यही चीज़ हम सभी को अनुभव में लानी है कि जो हम हैं, जो हम नहीं हैं उसको व्यावहारिक तरीके से अनुभव में लाना है। यही अनुभव की कमी सफलता नहीं दिला रही है। उसी को परमात्मा कहते हैं आत्मिक भाव, वृत्ति वाला भाव, शुद्ध भाव, क्योंकि बच्चे का शुद्धभाव होता है। उसको किसी भी राज्य से, धर्म से, जाति से कोई लेना-देना नहीं है। बस यही अनुभूति हम सबकी होगी तो हमसे प्राप्तियां शुरु होंगी।
दूसरा उदाहरण हम ऐसे लेते हैं, जैसे हम मंदिर जाते हैं, हर देवी-देवता हमें अपना नज़र आता है ना! क्योंकि उसके अन्दर कोई वर्गीकरण नहीं है, भेदभाव नहीं है। लेकिन इसका अभ्यास कभी तो किया होगा और वो अभ्यास अनुभव में है। वो ही अनुभव आपसे वैसा चित्र बनवाता है और एक चित्रकार वैसी ही पेंटिंग बनाता है, और वो ही अनुभव आप मंदिरों में करते हैं। इसको कहा जाता है- निमित्त भाव। अब आप सोचो कि अगर कोई देवता कहे कि कि आप यहाँ के हैं, आप वहाँ के हैं, आप इस जाति के हैं, इस धर्म के हैं तो आपको अच्छा लगेगा! नहीं लगेगा ना! ये सिद्ध करता है कि ये इनका आत्मिक भाव है, शुद्ध भाव है, वृत्ति में शुद्ध भाव है। यही अनुभूति हम सबसे चैतन्य में लोग चाहते हैं और परमात्मा हमको यही अनुभूति में रहने के लिए कहते हैं। तो आप अनुभवी बनो, ना कि जानकार बनो। यही जीवन का हमारा लक्ष्य हो।




