बाबा ने हम सबको ब्राह्मण जीवन के नियम संयम बताए हैं। अगर हम चलते-फिरते, खाते-पीते हैं तो यह शोभता नहीं है। खुशी में शान्ति से बैठकर याद में खाओ-पीओ तो थोड़े में ही ताकत मिल जाती है। तो बड़े प्यार से, बड़ी एकाग्रता से ब्रह्माभोजन करना है क्योंकि ब्रह्माभोजन बहुत पॉवरफुल है, इसके लिए कहते हैं कि देवताएं भी तरसते हैं। सतयुग में देवताओं को यह ब्रह्माभोजन थोड़े ही मिलेगा। ऐसा भण्डारा और ऐसे भोजन बनाने वाले भी नहीं होंगे। भोग भी नहीं लगेगा। इसलिए अभी भोग लगाने वाले को भी एक्यूरेट लगाना है। बनाने वाले को भी एक्यूरेट बनाना है और खाने वाले को भी उसी महत्व से खाना है कि हम ब्रह्माभोजन खा रहे हैं।
जो स्वदर्शन चक्रधारी ब्राह्मण हैं उन्हें स्मृति रहती हम सो, सो हम… हम सो थे वो अभी हम बन रहे हैं। इस शरीर में होते हुए चेक करो कि ज्ञान में आने से पहले मेरा संकल्प कैसा था? अब कैसा है? वन्डरफुल। रहम, सच्चाई, प्रेम संकल्प में आ गया है। अगर मेरे संकल्प में रहम नहीं है तो वो कोमल दिल है या कठोर दिल है। हमारे दिल में रहम, सच्चाई और प्रेम हो तो संकल्प दृष्टि और कर्म भी ऐसे ही होंगे। उसमें अगर कोई साधारणता है तो चलने-फिरने, सोचने में भी साधारणता होगी। भले बुद्धि बहुत अच्छी है पर रहमदिल नहीं हैं, किसके दिल को जल्दी समझ करके बाबा से उनको मदद दिलावे वो अन्दर से बुद्धि काम नहीं करती है।
निश्चय और भावना दोनों जब कम्बाइंड हैं तो विश्वास जल्दी बैठ जाता है। कहेगा सुना था कुछ और, देखा कुछ और। कइयों का यहाँ आ करके, देखने से, अनुभव करने से विश्वास बैठ जाता है क्योंकि रहम, स्नेह, सच्चाई का अनुभव किया, जो दुनिया में कहीं से भी किसको यह अनुभव हो नहीं सकता। कुछ न कुछ स्वार्थ भाव होगा। वो भले बाप-बेटा हो, उसकी मर्जी से नहीं चला तो कहेगा तू मेरा बेटा नहीं है या तो बाप, बाप नहीं है। यहाँ तो बाप-बेटे का सम्बन्ध जुटता है, पर भाई-भाई, बहन-भाई का सम्बन्ध भी जुटता है। किसी बाहर वालों को कहो कि तुम मेरा भाई हो तो उनको इतनी खुशी होती है, बात मत पूछो। पूरा ज्ञान सुनने से पहले उनको इसी एक शब्द से विश्वास होने लगता है। तो हमारा बहन-भाई का जो रिश्ता है वो बड़ा सुखदाई है। भाई-भाई की दृष्टि से सृष्टि महासुखकारी बन जाती है।
भाई-भाई की दृष्टि का कोर्स बड़ा है, इसमें जो पास हुआ उसका बेड़ा पार। जैसे मम्मा समान सदैव रूहानियत में रहने से बाबा अपनी शक्ति भर देता है तब तो आत्मा में शिव की शक्ति भरेगी और शिवशक्ति के रूप में गायन होगा। शिव मेरा साथी तो क्या बल्कि शिव की शक्ति मेरे पास है। तो साक्षी हो करके पार्ट प्ले करना, यह हीरो पार्टधारी की निशानी है। हीरो जो होता है, वो हर पार्ट के बीच में हाजि़र होता है फिर भी उसका सबसे न्यारा पार्ट होता है इसलिए सबको अच्छा लगता है।
हमें पास विद ऑनर होना है तो ऐसा श्रेष्ठ पार्ट बजाना है। ऐसे नहीं पास होने जितनी माक्र्स मिली तो खुश हो जाये। शान उसी में है जो हीरो पार्ट बजाये। कोई भी बात हुई साक्षी हो करके पार्ट प्ले किया, बाबा साथी है, मेरे को साक्षी बना करके अच्छा पार्ट प्ले करना सिखाया है। हम हर पार्टधारी के पार्ट में साक्षी हैं। तो साक्षीपन की स्टेज पर रहते अपना पार्ट बजाना और शिव बाप को साथी बना देना तब कहेंगे शिव और शक्ति दोनों कम्बाइंड हैं।




