ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय के इतिहास में कुछ ऐसी महान आत्माएं हैं, जिनका जीवन मौन रहकर भी गहरी प्रेरणा देता है। दादी ईशु ऐसी ही एक तपस्विनी, राजयोगिनी और अत्यंत विश्वसनीय आत्मा थीं। उनका सम्पूर्ण जीवन ईश्वरीय यज्ञ की सेवा, निष्ठा, ईमानदारी और गोपनीयता का अद्वितीय उदाहरण रहा है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना, उनके गुणों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है।
दादी ईशु ने मात्र 9वर्ष की आयु में ईश्वरीय यज्ञ में प्रवेश किया। यह उनकी विशेषता थी कि स्वयं परमात्मा शिव ने प्रजापिता ब्रह्मा के माध्यम से उनकी पालना की, उन्हें पढ़ाया-लिखाया और आध्यात्मिक जीवन के संस्कार दिए। इतनी छोटी उम्र में ही उन्होंने यज्ञ के प्रति जो समर्पण और लगन दिखाई, वह अत्यंत प्रेरणादायक है।
दादी ईशु की एक विशेष सेवा थी, वो थी बाबा के महावाक्यों को शॉर्टहैंड में लिखना। जब ब्रह्मा बाबा के माध्यम से शिव बाबा मुरली उच्चारण करते थे तो वे उन्हें तुरंत शॉर्टहैंड में लिखती थीं। बाद में उन्हीं लिखित महावाक्यों को सुंदर और स्पष्ट अक्षरों में तैयार किया जाता था, जो सभी सेवाकेन्द्रों तक पहुँचाया जाता था। इस प्रकार वे परमात्मा के ज्ञान को सहेजने और फैलाने की महत्त्वपूर्ण कड़ी बनीं।
वे केवल एक लेखक ही नहीं, बल्कि ब्रह्मा बाबा की पर्सनल सेक्रेटरी भी रहीं। यज्ञ में होने वाला सारा पत्र-व्यवहार उनके माध्यम से ही संचालित होता था। सेवाकेन्द्रों में आने वाले पत्रों को पढ़कर बाबा को सुनाना, उनके समाचार देना और फिर बाबा के निर्देशानुसार उत्तर लिखना – यह सम्पूर्ण जि़म्मेदारी दादी ईशु अत्यंत कुशलता से निभाती थीं।
समय के साथ, जब वे बड़ी हुईं, तो उन्होंने यज्ञ के सबसे महत्त्वपूर्ण विभाग – फाइनेंस और अकाउंट्स की जि़म्मेदारी संभाली। यज्ञ का पूरा हिसाब-किताब वे अत्यंत एक्यूरेसी और ईमानदारी से रखती थीं। उनका कार्य इतना व्यवस्थित और सटीक होता था कि वह आज भी एक आदर्श के रूप में माना जाता है। इस दृष्टि से वे यज्ञ खजांची के रूप में भी जानी जाती थीं।
दादी ईशु का स्वभाव अत्यंत शांत, गंभीर और रहस्यमयी था। वे कम बोलती थीं, लेकिन उनकी समझ और अवलोकन शक्ति अत्यंत गहरी थी। एक बार किसी आत्मा को देखने के बाद वे उसके संस्कारों और विशेषताओं को याद रखती थीं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी – गोपनीयता, वफादारी और ईमानदारी। वे हर कार्य को पूर्ण निष्ठा और विश्वास के साथ करती थीं। बाबा जो कहते थे वे उसी को पूरी सच्चाई और समर्पण से निभाती थीं।
दादी ईशु ने जगदंबा सरस्वती, ब्रह्मा बाबा और बाद में दादी प्रकाशमणि जी के साथ भी यज्ञ की सेवा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने हर समय, हर परिस्थिति में अपनी जि़म्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाया। सन् 2021 में उन्होंने अपने पुराने शरीर का त्याग कर अव्यक्त स्वरूप धारण किया। किंतु उनके द्वारा सिखाए गए संस्कार जैसे कि एक्यूरेट काउंटिंग,गोपनीयता, वफादारी और ईमानदारी आज भी यज्ञ में जीवंत है और सभी के लिए मार्गदर्शक हैं।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची सेवा केवल बड़े कार्यों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी जि़म्मेदारियों को भी पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से निभाने में है।
ऐसी महान तपस्विनी, शांति की प्रतिमूर्ति, राजयोगिनी दादी ईशु को उनकी पुण्यतिथि पर हम हृदय से भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनका जीवन सदैव हमें सच्चाई, निष्ठा और समर्पण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा।
दादी ईशु के साथ निजी अनुभव
मुझे दादी ईशु के साथ निकट से रहने और उनसे सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। जब यज्ञ का प्रथम प्रोजेक्ट ज्ञान सरोवर एकेडमी प्रारंभ हुआ, तब उसके समस्त फाइनेंस और अकाउंट्स की जि़म्मेदारी मुझे मिली। इस कारण प्रतिदिन दादी ईशु के साथ बैठने, उठने और उनके कार्य करने की शैली को नज़दीक से देखने का अवसर मिला।
मैंने उनके जीवन से सीखा कि यज्ञ का कार्य केवल एक जि़म्मेदारी नहीं, बल्कि एक पवित्र ट्रस्ट है जिसे पूरी ईमानदारी, वफादारी और सजगता के साथ निभाना चाहिए। वे अत्यंत शांति, एकाग्रता और सटीकता के साथ हर कार्य को सपन्न करती थीं।
उनके सानिध्य में रहकर मुझे यह भी अनुभव हुआ कि यज्ञ में किसी भी प्रकार का नुकसान न हो, इसके लिए हर कदम सोच-समझकर और जि़म्मेदारी से उठाना आवश्यक है। आज भी मैं उनके द्वारा सिखाए गए सिद्धांतों – ईमानदारी, गोपनीयता और वफादारी को अपने जीवन में धारण करने का प्रयास करता हूँ।
राजयोगी ब्र.कु. गंगाधर



